भारत में स्वच्छता के लिए परिवर्तन की पहल
खुले में शौच को समाप्त करने और हर बच्चे के लिए सुरक्षित व स्वच्छ समुदाय निर्माण के लिए भारत सरकार और यूनिसेफ के साझे प्रयास
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स्वच्छता सेवाओं की निरंतरता सुनिश्चित करना
मानवमल के सिर्फ एक ग्राम में लाखों वायरस, बैक्टीरिया और परजीवी सिस्ट (कीटाणु) होते हैं। पूरे भारत में, किसी समय खुले में शौच के कारण हर रोज़ टन-प्रति-टन यह खतरनाक अपशिष्ट बच्चों, जल स्रोतों और भोजन के सीधे संपर्क में आता था।
इसके परिणाम बेहद विनाशकारी थे: एक अनुमान के मुताबिक, खराब स्वच्छता के कारण होने वाले डायरिया (दस्त) से हर साल पांच साल से कम उम्र के लगभग 100,000 बच्चों की मौत हो जाती थी।
इससे कहीं ज़्यादा बच्चे जीवित तो बच जाते थे, लेकिन बार-बार होने वाले पेट के संक्रमणों के कारण उनके शरीर में पोषक तत्वों को सोखने की क्षमता धीरे-धीरे खत्म हो जाती थी। जिससे वे कुपोषण (ठिंगनेपन) का शिकार हो जाते थे, कमजोर हो जाते थे और उन्हें पढ़ने-लिखने में कठिनाई होती थी।
एक शौचालय इसी त्रासदी को रोकता है। और यही कारण है कि स्वच्छता भारत में यूनिसेफ के कार्यों के केंद्र में है।
भारत की स्वच्छता क्रांति
साल 2014 में, भारत सरकार ने स्वच्छ भारत मिशन (SBM) की शुरुआत की। जो दुनिया के सबसे महत्वाकांक्षी सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में से एक है। इसका लक्ष्य खुले में शौच को पूरी तरह समाप्त करना था, ताकि हर गांव और शहर में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति सुरक्षित शौचालय का उपयोग करे।
इसके पहले चरण (2014-2019) के परिणाम असाधारण रहे। लगभग 11 करोड़ से अधिक परिवारों के करीब 50 करोड़ लोगों को घरेलू शौचालयों की सुविधा मिली और उन्होंने इसका उपयोग करना शुरू किया। 2 अक्टूबर 2019 को महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर भारत ने सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के गांवों द्वारा खुद को खुले में शौच मुक्त (ODF) घोषित करने के साथ ही इस मिशन के पहले चरण की पूर्णता दर्ज की।
लेकिन, शौचालय तक पहुंच तो केवल शुरुआत थी। खुले में शौच एक ऐसी आदत थी जो पीढ़ियों से चली आ रही थी, जिस पर शायद ही कभी खुलकर बात होती थी, और जो सामाजिक मानदंडों के साथ-साथ लैंगिक (जेंडर) और सामुदायिक जीवन से गहराई से जुड़ी थी। इसे बदलना केवल ईंट और गारे की इमारतों से कहीं बढ़कर था, और इसीलिए इसमें 'जन आंदोलन' यानी सामुदायिक भागीदारी को एक बड़ी भूमिका निभानी थी।
साल 2020 में शुरू हुआ दूसरा चरण (Phase 2), इस मिशन को और आगे ले जाता है। जिसे ODF+ (ओडीएफ प्लस) कहा जाता है।
ODF+ का अर्थ
ODF+ का मतलब है कि समुदाय केवल शौचालय होने तक ही सीमित नहीं हैं। इसका अर्थ है कि कचरे का शुरू से अंत तक सुरक्षित प्रबंधन किया जाता है: ठोस कचरे को इकट्ठा करके उसकी खाद बनाई जाती है; तरल और गंदे पानी (ग्रे-वाटर) का उपचार किया जाता है; और सार्वजनिक स्थानों को साफ रखा जाता है।
पुराने सिंगल-पिट (एक गड्ढे वाले) शौचालयों को सुरक्षित ट्विन-पिट (दो गड्ढे वाले) डिज़ाइनों में बदला जाता है। इसमें जैविक कचरे में मवेशियों का गोबर भी शामिल है आदि को ऊर्जा के लिए बायोगैस और जैविक उर्वरक में बदला जाता है। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पहले चरण को सफल बनाने वाले व्यवहार परिवर्तन और सामुदायिक निगरानी के प्रयासों को निरंतर जारी रखा जाता है।
सरकार ने ODF+ की चरणबद्ध श्रेणियां तय की हैं, जिनमें सबसे ऊंची श्रेणी 'ODF+ मॉडल' है। मई 2026 तक, देश के कुल लगभग 5,86,000 गांवों में से 5,04,000 गांव अब 'ODF प्लस मॉडल' बन चुके हैं।
नीति से लेकर धरातल तक यूनिसेफ की भूमिका
यूनिसेफ पिछले 75 वर्षों से भारत सरकार का भागीदार रहा है। आज, जल और स्वच्छता के मोर्चे पर, यह 15 राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम कर रहा है — ताकि राष्ट्रीय नीतियों को जिला, ब्लॉक और ग्राम स्तर पर वास्तविक और स्थायी बदलाव में बदला जा सके।
स्वच्छता को बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा से जोड़ना
असुरक्षित स्वच्छता के कारण पेट में बार-बार होने वाले संक्रमण से बच्चों की पोषक तत्वों को सोखने की क्षमता खत्म हो जाती है, चाहे वे कितना भी भोजन क्यों न करें। यह अदृश्य नुकसान उन परिवारों में भी कुपोषण और ठिंगनेपन (स्टंटिंग) को बढ़ावा देता है, जहाँ भोजन की कोई कमी नहीं है।
यूनिसेफ इस बात को ध्यान में रखकर योजनाओं का समर्थन करता है कि साफ शौचालय और साफ हाथ, पोषण के स्तर को सुधारने वाले सबसे प्रभावी तरीकों में से एक हैं। साबुन से हाथ धोने की आदत को भारत भर के स्कूलों और आंगनवाड़ियों में बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जा रहा है, जो बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता की रक्षा करता है, डायरिया की बीमारियों को कम करता है, और बच्चों को स्कूल में टिके रहने और बेहतर सीखने में मदद करता है।
हर स्तर पर कौशल निर्माण
वास्तविक बदलाव सामुदायिक स्तर पर ही होता है। यूनिसेफ ने राज्यों और जिलों के मास्टर प्रशिक्षकों (मास्टर ट्रेनर्स) को प्रशिक्षित किया है, और ग्राम स्तर के नेताओं — जिनमें निर्वाचित ग्राम पंचायत प्रतिनिधि शामिल हैं — को स्वच्छता सेवाओं को लागू करने और उनके रखरखाव के व्यावहारिक ज्ञान से लैस किया है। सरकार द्वारा संचालित एक समर्पित शिक्षण पोर्टल देश भर में इस क्षमता निर्माण की निगरानी करता है: watersanitationlearning.gov.in
जलवायु-अनुकूल (क्लाइमेट-प्रूफ) स्वच्छता
एक बाढ़ या चक्रवात सालों की स्वच्छता प्रगति को रातोंरात नष्ट कर सकता है। यूनिसेफ ने स्थानीय सरकारों के लिए व्यावहारिक दिशानिर्देशों और पुस्तिकाओं के साथ 51 ऐसे स्वच्छता बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) तैयार किए हैं जो जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीले हैं — ताकि शौचालय, जल निकासी प्रणाली और अपशिष्ट उपचार इकाइयां उन चरम मौसम स्थितियों को झेल सकें जिनका सामना समुदाय लगातार कर रहे हैं।
स्वच्छता कर्मियों के लिए गरिमा
जो लोग सेप्टिक टैंक या गड्ढे खाली करते हैं, नालियों की सफाई करते हैं, और सामुदायिक स्वच्छता प्रणालियों का रखरखाव करते हैं, वे बेहद खतरनाक परिस्थितियों में यह आवश्यक कार्य करते हैं। यूनिसेफ ने लगातार उनकी सुरक्षा और गरिमा की वकालत की है — सुरक्षा उपकरणों, स्वास्थ्य बीमा और पेंशन लाभों तक उनकी पहुंच का समर्थन किया है। इसी प्रयास के परिणामस्वरूप, स्वच्छता कर्मियों को सरकार के राष्ट्रीय 'स्वच्छता ही सेवा' अभियान में औपचारिक रूप से सम्मान दिया गया, और उनकी कार्यस्थल सुरक्षा के लिए एक राष्ट्रीय मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार की गई।
साक्ष्य जुटाना और ज्ञान साझा करना
यूनिसेफ यह समझने के लिए अनुसंधान और मूल्यांकन के लिए धन उपलब्ध कराता है कि कौन सी रणनीतियाँ काम कर रही हैं, कौन सी नहीं, और कौन से लोग अब भी पीछे छूटे हुए हैं — ताकि भारत के कार्यक्रमों और स्वच्छता पर वैश्विक विमर्श दोनों को बेहतर दिशा मिल सके। यह अन्य देशों के उपयोगी अनुभवों को भारत में लाने और भारत के इस ऐतिहासिक अनुभव को दुनिया के साथ साझा करने का काम करता है।
अभी तक के परिणाम
आंकड़े इस सफलता की कहानी बयां करते हैं। जिन जिलों में शौचालयों का निर्माण और उपयोग किया गया है, वहां शिशु मृत्यु दर में गिरावट आई है। खुले में शौच से मुक्त हुए समुदायों के परिवार बीमारियों में कमी, कम मेडिकल बिल और काम के दिनों का नुकसान न होने के कारण प्रति वर्ष अनुमानित 50,000 रुपये की बचत कर रहे हैं। महिलाओं और लड़कियों ने बेहतर सुरक्षा, डर से मुक्ति और खोई हुई गरिमा की बहाली की बात कही है। अब उन्हें अंधेरे में खेतों और सड़कों के किनारे जाने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता।
लेकिन, शायद सबसे बड़ा बदलाव वह है जिसे मापना कठिन है: यानी समुदायों की सोच में आया बदलाव कि अब वे किस बात को सामान्य मानते हैं और किसे स्वीकार करने से मना कर देते हैं। स्वच्छता को अब सरकार की ओर से मिलने वाले किसी लाभ के रूप में नहीं, बल्कि एक अधिकार के रूप में देखा जा रहा है। जिसकी सक्रिय रूप से मांग की जाती है और सामूहिक रूप से रक्षा की जाती है।
भारत की स्वच्छता की यात्रा अनवरत जारी है। पीढ़ियों तक व्यवहार परिवर्तन को बनाए रखना, शहरी गरीबों और सबसे दूरदराज के ग्रामीण परिवारों तक पहुंचना, सभी अपशिष्टों का सुरक्षित उपचार करना, स्वच्छता कार्यबल को पेशेवर बनाना और जलवायु परिवर्तन के प्रति प्रतिरोधी प्रणालियों का निर्माण करना ही इस दशक की मुख्य चुनौतियाँ हैं।
हमारा लक्ष्य सतत विकास लक्ष्य (SDG) 6.2 है: यानी 2030 तक भारत में हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित रूप से प्रबंधित स्वच्छता सुनिश्चित करना।
यूनिसेफ इस यात्रा के लिए प्रतिबद्ध है। भारत सरकार, नागरिक समाज के भागीदारों, अनुसंधान संस्थानों और इस बदलाव को खुद आगे बढ़ाने वाले समुदायों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर।