दुनिया भर में बचपन के टीकाकरण की रफ़्तार सुधार की ओर, संघर्ष और झिझक अब भी बड़ी चुनौती – यूनिसेफ और डब्ल्यूएचओ

पिछले एक साल में ज़ीरो डोज़ बच्चों की संख्या करीब 7 लाख 50 हज़ार घटी, टीकाकरण बीच में छोड़ने वाले बच्चों की तादाद अब भी ज़्यादा और स्थिर, बीमारियों के फैलने का खतरा बरकरार

21 जुलाई 2026
A health worker administers an injectable vaccine into the arm of two-month-old Pallavi Roy during a routine immunization outreach session. The baby lies cradled across her mother's lap, dressed in a white outfit, while the mother gently steadies her head and holds her arm still. The women's colourful sarees and glass bangles frame the scene from above.
UNICEF/UN0678837/Ghosh Two-month-old Pallavi Roy is receiving her scheduled doses of vaccines at the outreach session site for routine immunization at Rabindra Sishutirtha Primary School of Rakhalpur, one of the last inhabited islands of the Sundarbans in Patharpratima Block of Diamond Harbour Health District.

जिनेवा/न्यूयॉर्क – साल 2025 में दुनिया भर के 90 फीसदी यानी करीब 11 करोड़ 60 लाख शिशुओं को डिप्थीरिया, टिटनेस और काली खांसी यानी डीटीपी का कम से कम एक टीका लग सका, और 85 फीसदी यानी 11 करोड़ बच्चों ने तीनों खुराक पूरी कीं। यह आंकड़े आज जारी हुई सालाना डब्ल्यूएचओ यूनिसेफ नेशनल इम्यूनाइजेशन कवरेज रिपोर्ट (डब्ल्यूयूईएनआईसी) में सामने आए हैं।

पिछले साल के मुकाबले दोनों आंकड़ों में एक एक फीसदी का सुधार तो हुआ है, लेकिन वैश्विक कवरेज अब भी 2019 के स्तर से एक अंक पीछे है, और 2009 से यह आंकड़ा लगभग इसी दायरे में अटका हुआ है।

आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में करीब 1 करोड़ 35 लाख बच्चे ऐसे थे जिन्हें जन्म के पहले साल में एक भी टीका नहीं लगा, इन्हें ज़ीरो डोज़ बच्चे कहा जाता है। यह संख्या पिछले साल के मुकाबले करीब 7 लाख 50 हज़ार कम है, लेकिन यह सुधार उन बच्चों की बढ़ती तादाद से फीका पड़ जाता है जो टीकाकरण शुरू तो करते हैं पर पूरा नहीं करवा पाते। ऐसे ज़्यादातर बच्चे उन देशों में हैं जहां राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रमों को गावी, वैक्सीन एलायंस का सहयोग मिलता है।

दुनिया भर में करीब 73 लाख शिशुओं को डीटीपी का पहला टीका तो लगा, लेकिन खसरे का पहला टीका लगने से पहले ही वो टीकाकरण की कड़ी से छूट गए। इसी वजह से खसरे के टीकाकरण की रफ़्तार भी थमी रही, 84 फीसदी बच्चों को खसरे का पहला टीका और सिर्फ 77 फीसदी को दूसरा टीका लग सका।

दोनों ही आंकड़े 95 फीसदी के उस ज़रूरी स्तर से काफी नीचे हैं जो इस बेहद संक्रामक बीमारी के प्रकोप को रोकने के लिए ज़रूरी माना जाता है। नतीजा यह हुआ कि 2025 में 57 देशों में खसरे के बड़े और गंभीर प्रकोप दर्ज किए गए।

"कोविड 19 महामारी के दौरान बुरी तरह गिरे टीकाकरण के आंकड़ों को सरकारों और स्वास्थ्यकर्मियों ने मिलकर वापस पटरी पर लाने में मदद की है, लेकिन संघर्ष, विस्थापन और गरीबी की वजह से लाखों कमज़ोर बच्चे आज भी असुरक्षित हैं। हमें हर बच्चे तक पहुंचना होगा, और जहां भरोसा कमज़ोर पड़ रहा है वहां उसे फिर से मज़बूत बनाना होगा। किसी भी बच्चे को ऐसी बीमारी से पीड़ित नहीं होना चाहिए जिसे एक साधारण टीका रोक सकता है।"

कैथरीन रसेल,यूनिसेफ की कार्यकारी निदेशक

195 देशों के आंकड़े बताते हैं कि 100 देशों ने 2019 से लगातार डीटीपी के तीनों टीकों में 90 फीसदी से ज़्यादा कवरेज बनाए रखा है, लेकिन इस सूची में और देश जुड़ने की रफ़्तार बहुत धीमी है। 2019 में जो देश 90 फीसदी से नीचे थे, उनमें से 30 ने पिछले छह सालों में अपने आंकड़े सुधारे हैं, जबकि 65 देश या तो जहां के तहां अटके हैं या पीछे खिसक रहे हैं, इनमें 13 ऐसे देश हैं जो संघर्ष, अस्थिरता या कमज़ोर हालात से जूझ रहे हैं।

2019 के आंकड़ों की तुलना में अमेरिका और दक्षिण पूर्व एशिया क्षेत्र ने पूरी तरह रिकवरी की है और अपने प्रदर्शन में और सुधार भी किया है, दक्षिण पूर्व एशिया अब इस मामले में सबसे आगे है। अफ्रीका, पूर्वी भूमध्यसागरीय और यूरोप क्षेत्रों में पिछले साल कुछ सुधार तो देखा गया, लेकिन उनका कवरेज अब भी कोविड से पहले के स्तर से कम है।

इसके उलट, पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में गिरावट दर्ज हुई है, जिसकी वजह से यह क्षेत्र 2019 के अपने बेसलाइन से सबसे ज़्यादा पीछे रह गया है। इन वैश्विक और क्षेत्रीय औसतों के पीछे कई ऐसी चुनौतियां हैं जो देश दर देश टीकाकरण के आंकड़ों में उतार चढ़ाव और अस्थिरता की वजह बन रही हैं।

आधे से ज़्यादा ज़ीरो डोज़ बच्चे संघर्ष और अस्थिर हालात वाले क्षेत्रों में रहते हैं, जबकि दुनिया की कुल बाल आबादी में इन क्षेत्रों की हिस्सेदारी महज एक तिहाई है। ऐसे इलाकों में टीकाकरण कार्यक्रम अक्सर राजनीतिक उथल पुथल, असुरक्षा या लगातार धन की कमी से जूझते रहते हैं। जैसे सीरिया में महज एक साल के भीतर डीटीपी की पहली खुराक का कवरेज 6 फीसदी और खसरे के पहले टीके का कवरेज 12 फीसदी गिर गया।

वहीं दूसरी ओर सूडान ने पिछले साल दुनिया में सबसे बड़ा सुधार दर्ज किया, वहां डीटीपी की पहली खुराक का कवरेज 35 फीसदी और खसरे के पहले टीके का कवरेज 22 फीसदी बढ़ा। यह दिखाता है कि संघर्ष के बीच भी अगर सेवाओं तक पहुंच बेहतर हो, तो कितना बड़ा बदलाव मुमकिन है।

मध्यम और उच्च आय वाले देशों में भी, जहां टीके आसानी से उपलब्ध हैं, बदलती राजनीतिक प्रतिबद्धता, ढांचागत दिक्कतों या बढ़ती झिझक के चलते कवरेज घट रहा है। जैसे दक्षिण अफ्रीका में डीटीपी की पहली खुराक का कवरेज 2019 से अब तक 20 फीसदी गिर चुका है और 2025 में भी यह गिरावट जारी रही। वहीं बोस्निया और हर्जेगोविना में 2024 में क्षेत्र में खसरे के टीके का सबसे बड़ा सुधार देखने के बाद, पिछले साल इसमें 23 फीसदी की भारी गिरावट आई।

"हर बच्चा, चाहे वो अमीर घर में जन्मा हो या गरीब घर में, शांति में जन्मा हो या संघर्ष में, टीकों से मिलने वाली उस जीवनरक्षक सुरक्षा का हकदार है। बच्चों की सेहत और भलाई की रक्षा के लिए टीकाकरण सबसे किफायती, सबसे न्यायसंगत और सबसे भरोसेमंद उपायों में से एक है। हमारी सबसे बड़ी सुरक्षा तभी शुरू होती है जब हर कोई, चाहे वो कहीं भी रहता हो, उन जानलेवा बीमारियों से बचा रहे जिन्हें टीके रोक सकते हैं।"

डॉ टेड्रोस एडहानॉम गेब्रेयेसस, महानिदेशक, डब्ल्यूएचओ

पिछले 25 सालों में सरकारों और साझेदारों के लगातार निवेश, समुदायों की प्रतिबद्धता, मज़बूत कार्यक्रमों और लोगों के भरोसे ने ज़ीरो डोज़ बच्चों की सालाना संख्या में 40 फीसदी की कमी लाई है। जैसे गावी की मदद पाने वाले देशों में आज बच्चों को पहले से कहीं ज़्यादा बीमारियों से सुरक्षा मिल रही है, वहां डब्ल्यूएचओ की सिफारिश वाले पूरे टीकाकरण कोर्स का औसत कवरेज आज 74 फीसदी है।

गावी, वैक्सीन एलायंस की सीईओ डॉ सानिया निश्तार ने कहा कि, "निम्न आय वाले देशों में जिस ऐतिहासिक स्तर का टीकाकरण हम देख रहे हैं, वो दिखाता है कि जब सभी पक्ष एक साझा लक्ष्य के लिए मिलकर काम करते हैं तो क्या हासिल किया जा सकता है। गावी के नए पांच साल के दौर में हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी फंडिंग की कमी, भू-राजनीतिक अनिश्चितता और बढ़ते प्रकोपों के बीच इस रफ़्तार को बनाए रखना, साथ ही उन बच्चों तक पहुंचने की कोशिश और तेज़ करना जिन्हें अब भी टीका नहीं मिल पा रहा।"

हालांकि, जिन बुनियादों पर यह प्रगति टिकी थी, वो अब गंभीर दबाव में हैं। पिछले दो सालों में अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य फंडिंग में हुई कटौती का पूरा असर अभी इन आंकड़ों में नहीं दिख रहा, लेकिन जिन डेटा सिस्टम से इस असर को ट्रैक किया जाना है और पीछे खिसकने से बचा जाना है, वो खुद दबाव में नज़र आ रहे हैं।

आंकड़ों के मुताबिक, इस बार सिर्फ 18 राष्ट्रीय टीकाकरण सर्वेक्षण किए गए और जमा हुए, जबकि 2024 में यह संख्या 50 थी, और 2015 से 2019 के बीच औसतन हर साल 33 सर्वेक्षण होते थे। एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि टीकों से छूट रहे बच्चों को ढूंढने और उन तक पहुंचने के लिए ज़रूरी डेटा सिस्टम में निवेश कमज़ोर पड़ना, आने वाले समय में ऐसे प्रकोप और मौतें ला सकता है जिन्हें रोका जा सकता था।

डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ, गावी वैक्सीन एलायंस और दूसरे साझेदारों के साथ मिलकर ग्लोबल इम्यूनाइजेशन एजेंडा 2030 यानी आईए2030 के लक्ष्य को पूरा करने में जुटे हैं, ताकि टीके हर जगह, हर उम्र में, हर किसी तक पहुंच सकें। बावजूद इसके, दुनिया ज़ीरो डोज़ बच्चों की संख्या घटाने के वैश्विक लक्ष्य से अब भी काफी दूर है।

इस स्थिति में तुरंत सुधार लाने और इस बड़े अंतर को पाटने के लिए डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ ने सरकारों और संबंधित साझेदारों से यह अपील की है:

  • संघर्ष और अस्थिर इलाकों में टीकाकरण को मज़बूत बनाया जाए ताकि बच्चों तक पहुंचा जा सके और उन्हें कार्यक्रम से जुड़ा रखा जा सके।
  • स्वास्थ्य से जुड़ी झूठी और भ्रामक जानकारी का मुकाबला किया जाए और टीकाकरण की रफ़्तार बढ़ाने में पूरा सहयोग दिया जाए।
  • टीकाकरण कार्यक्रमों और गावी जैसी साझेदारियों के लिए घरेलू और वैश्विक फंडिंग बढ़ाई और बनाए रखी जाए
  • मज़बूत डेटा और बीमारी निगरानी प्रणालियों में निवेश किया जाए ताकि टीकाकरण कार्यक्रमों को असरदार तरीके से मज़बूत किया जा सके।

भारत के आंकड़े:

  • भारत ने टीकों तक पहुंच बढ़ाने में बड़ी प्रगति की है, यह इस बात से साफ है कि यहां ज़ीरो डोज़ बच्चों की संख्या 2024 के 9 लाख 9 हज़ार से घटकर 2025 में 6 लाख 79 हज़ार रह गई है।

  • 2001 में जब से डब्ल्यूयूईएनआईसी के आंकड़े जारी होने शुरू हुए हैं, पहली बार भारत का नाम खसरे के खिलाफ सबसे ज़्यादा बिना टीकाकरण वाले बच्चों की सूची में शामिल टॉप 10 देशों से बाहर हुआ है। यह भारत के ईपीआई कार्यक्रम की पिछले एक दशक की शानदार प्रगति को दर्शाता है, और देश की सार्वभौमिक टीकाकरण के प्रति प्रतिबद्धता का सबूत भी है।

  • ज़्यादा बच्चों तक पहुंचने के लिए भारत ने शहरी झुग्गी बस्तियों, प्रवासी आबादी, दुर्गम इलाकों और टीकाकरण को लेकर झिझक रखने वाले समुदायों के लिए खास तौर पर तैयार अभियान शुरू किए हैं। इन प्रयासों से आज 95 फीसदी बच्चे डीटीपी और खसरे के टीकों से पूरी तरह सुरक्षित हैं।

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डब्ल्यूयूईएनआईसी के अनुमान, जिनमें ऐतिहासिक आंकड़े भी शामिल हैं, हर साल नए देशों के डेटा मिलने पर अपडेट किए जाते हैं। इस विज्ञप्ति में दिए गए आंकड़ों की तुलना पिछले सालों में जारी रिपोर्टों से नहीं की जानी चाहिए।

देशों से मिले आंकड़ों के आधार पर तैयार डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ का यह राष्ट्रीय टीकाकरण कवरेज अनुमान (डब्ल्यूयूईएनआईसी) दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे व्यापक डेटासेट है, जो क्लीनिक, सामुदायिक केंद्रों, आउटरीच सेवाओं या स्वास्थ्यकर्मियों के दौरों के ज़रिए दिए जाने वाले 13 बीमारियों के टीकों के रुझान दर्शाता है। 2025 के लिए ये आंकड़े 185 देशों से मिले हैं।

डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ, गावी वैक्सीन एलायंस और अन्य साझेदारों के साथ मिलकर ग्लोबल इम्यूनाइजेशन एजेंडा 2030 (आईए2030) को लागू करने में जुटे हैं, यह एक ऐसी रणनीति है जिसके तहत सभी देश और वैश्विक साझेदार मिलकर टीकाकरण के ज़रिए बीमारियों की रोकथाम और हर जगह, हर उम्र में, हर किसी तक टीके पहुंचाने के लक्ष्य को पूरा करने का काम करते हैं।

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