स्तनपान के बीच के अनमोल पल

स्तनपान के दौरान एक मां की उलझनें और खुशियां

By Vineeta Misra, Communication Officer
A close-up of a baby's bare foot resting on a soft lilac blanket, lit by warm sunlight that highlights the tiny toes and delicate skin. A white knitted bootie lies just behind the foot.
UNICEF A newborn's tiny foot rests on a soft blanket; a reminder of the fragile early days of life when timely care makes all the difference for every child's chance to survive and thrive.
19 अगस्त 2026

अपने बच्चे को दूध पिलाने के घंटों के बीच का जो थोड़ा सा समय मिलता है, वो एक नई मां के लिए ज़िंदगी के सबसे अनमोल पल होते हैं। यह बात मुझे 11 साल पहले समझ आई, जब मैंने अपनी बेटी को जन्म दिया।

मैं अपनी बेटी को संभालने के साथ-साथ अपने लिए उन कुछ मिनटों को चुराने की जद्दोजहद में रहती थी। जल्दी से नहा लेना, उसके कपड़े ठीक से रख देना, बच्ची के थोड़ी देर सोते ही उसके नन्हे पैरों के लिए एक छोटा सा मोज़ा बुन लेना। बच्ची को दूध पिलाने के बीच मिलने वाला थोड़ा सा टाइम मानो 100 काम एक साथ निपटा लेने का न्योता होता था।

हाँ, मातृत्व एक नया और अनोखा अनुभव है, और नई माँओं के लिए यह दूसरा जन्म लेने जैसा ही होता है।

लेकिन, आज मैं वो गहरी बातें साझा करना चाहती हूं, जिनका शायद कोई जिक्र नहीं करता। एक मां रातों-रात मां नहीं बन जाती। अगर साफ शब्दों में कहूँ तो, मां अपने बच्चे के लिए स्वयं भोजन बन जाती है।

मैं अक्सर सोचती थी कि मेरी बेटी की चमकती आँखें इतने प्यार और चाहत से मुझे क्यों देखती हैं। अब मुझे समझ आता है कि शायद वो मेरी बच्ची के मेरे लिए आभार जताने का तरीका था, क्योंकि मैं उसके पोषण का स्रोत थी।

लेकिन, बात सिर्फ उसे दूध पिलाने की नहीं थी। मैं उसके साथ खेलती, उससे दिनभर बातें करती, उसे गाने सुनानी, उसके साथ गुनगुनाती, उसकी हर छोटी सी हरकत जैसे हाथों-परों को हिलाना मेरा दिन बना देती थी। मुझे ऐसा महसूस होता जैसे हमारा धीरे धीरे मज़बूत और खूबसूरत रिश्ता बन रहा हो।

फिर भी, उन शुरुआती दिनों में मैं उसे बहुत कुछ नहीं दे पाई थी।

उसे वो पहला पोषक दूध नहीं मिल पाया, जबकि मैं जानती थी कि नवजात के लिए यह कितना ज़रूरी है। क्योंकि, जब तक मैं होश में आई, तब तक नर्सें उसे पहले से ही ऊपरी दूध पिला चुकी थीं। 

उसके बाद असली संघर्ष शुरू हुआ। शायद यह कहना ज़्यादा सही होगा कि सही तरीके से दूध पीने के लिए उस नन्हीं सी जान ने मुझसे ज़्यादा संघर्ष किया, क्योंकि मेरा दूध सही मात्रा में आने में भी वक्त लगा। मुझे बताया गया था कि यह डिमांड और सप्लाई का चक्र है, बच्चा जितना ज़्यादा दूध पिएगा, माँ में उतना ही ज़्यादा दूध बनेगा।

पर हर दो घंटे में दूध पिलाना मुझे जल्द ही थकाने लगा था। चूंकि, वो ठीक से पकड़ नहीं पाती थी, हर फीड करीब एक घंटे तक खिंच जाती। और मुश्किल से सांस लेने का वक्त मिलता कि फिर से दूध पिलाने का समय आ जाता।

मेरे दूध पिलाने के बीच के वो आराम के पल सिमटते जा रहे थे, और मेरे स्तन दुखने लगे थे।

चूंकि, मेरी बच्ची की पकड़ कमज़ोर थी, फीड्स के बीच का फासला और कम होता गया, और कई बार तो उसके साथ मेरा वो थोड़ा सा खेलने का वक्त भी छिन जाता था, क्योंकि इस सारी प्रक्रिया के दौरान मैं खुद बहुत थक चुकी थी।

स्तनपान के दौरान माँ को भी बहुत ज़्यादा भूख और प्यास लगती है और उसे सिर्फ मेज़ पर रखा हुआ पौष्टिक खाना ही नहीं चाहिए होता। बल्कि, साथ में अतिरिक्त आहार भी चाहिए होता है। उन शुरुआती दिनों में अक्सर उसे ऐसा पौष्टिक खाना बनाकर दिया जाये, और मां के हाथों में दिया जाए, जिसे वो आराम से बच्चे को दूध पिलाते हुए खा सके। 

क्योंकि, शुरूआती दिनों में शिशु को छोड़ना मां के लिए मुश्किल हो जाता है और बच्चा मां को एक पल के लिए भी हिलने नहीं देता। मेरे परिवार के लोगों ने बहुत मदद की, इसमें कोई शक नहीं। ऐसे समय में ही सहारे और देखभाल की ज़रूरत एक नई मां को बहुत ज़्यादा होती है।

एक नई माँ बहुत कुछ अपने अंदर लिए चलती है, अपने शरीर में, अपने मन में, और अपने दिल में। जब स्तनपान चुनौतियों से भरा हो, तो यह सब बहुत भारी महसूस हो सकता है।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ तो समझ आता है कि एक नई माँ, एक औरत की ज़िंदगी के सबसे नाज़ुक दौर से गुज़र रही होती है। परिवार, समुदाय और डॉक्टरों का सही साथ और सहयोग, न सिर्फ मां की बल्कि उसके बच्चे की ज़िंदगी में भी लंबे समय तक असर डालता है।

अस्पताल में मौजूद जानकार देखभालकर्ता इस पूरी प्रक्रिया पर नज़र रख सकते हैं। जागरूक अस्पताल स्टाफ तब आगे आ सकता है जब मां के लिए स्वयं स्तनपान करवाना मुश्किल हो जाए। ख्याल रखने वाले परिवार के सदस्य माँ की पोषण संबंधी ज़रूरतों का ध्यान रख सकते हैं और साथ देने वाला जीवनसाथी बारी बारी से बच्चे को डकार दिलाने और बाकी ज़िम्मेदारियां बांटने में मदद कर सकता है।

हर माँ को यह सहारा नहीं मिल पाता। हर परिवार यह नहीं समझ पाता कि उसके लिए पौष्टिक खाना, पूरा आराम और ठीक होने का वक्त मिलना कितना ज़रूरी है। यह बोझ सिर्फ माँ पर नहीं छोड़ा जा सकता। परिवार, मीडिया, कार्यस्थल, समुदाय, सबको मिलकर आगे आना होगा।

अपने बच्चे को दो साल तक दूध पिलाना, उसे बेहतर स्वस्थ शुरूआत देना है। पर जो माँएं किसी स्वास्थ्य या अन्य किसी वजहों से पूरी तरह ऐसा नहीं कर पातीं, उनके लिए भी बच्चे तक पोषण पहुंचाने के रास्ते मौजूद हैं। यहां ज़रूरी है कि हमें नई मां के लिए धारणा नहीं बनानी चाहिए, बल्कि उसका साथ देना चाहिए।

कार्यस्थलों पर भी ये सहयोग मिलना उतना ही ज़रूरी है। माँओं को ऐसी जगह और ऐसी व्यवस्था चाहिए जहां वो बिना किसी डर या असहजता के अपने बच्चे को दूध पिला सकें। मेरे कार्यस्थल पर एक बेबी रूम था, और इसने मुझे कहीं ज़्यादा सहज महसूस कराया और साथ दिए जाने का एहसास दिलाया। इतनी सी व्यवस्था ने भी सच में बड़ा फर्क डाला।

बच्चे को दूध पिलाना कोई ऐसी बात नहीं जिसे छुपाया जाए। यह बस एक बच्चे का खाना है, और एक माँ के लिए स्तनपान कराना ऐसी चीज है, जिसे प्यार, धैर्य, और अपने शरीर से सिर्फ वही कर सकती है।

एक माँ अपने बच्चे को सबसे शांत और खुशहाल जीवन देती है, और अपने बच्चे की देखभाल करते हुए, उसे खुद कभी बिना देखभाल के नहीं छोड़ा जाना चाहिए, क्योंकि आपके द्वारा की गई मां की यही देखभाल हर बच्चे के लिए मायने रखती है।

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