असम और मेघालय में बदलाव के असली चेहरे से की मुलाकात

चार दिन में मेघालय के लोगों ने मुझे सिखाया बदलाव की नींव रखना

By Soledad Herrero, Chief of Field Services, UNICEF India
UNICEF India's Chief of Field Services leans in warmly to look at a newborn wrapped in a striped cloth, held by a young mother, as a Buddy Mother looks on. The interaction takes place against a grey wall with a blue border, reflecting a grassroots community health visit in rural Meghalaya.
UNICEF Soledad Herrero, Chief of Field Services, UNICEF India, meets Hima Rasmut and her seven-week-old newborn, accompanied by Buddy Mother Truephina Rasmut, during a community visit in Shkentalang village, West Jaintia Hills, Meghalaya.
18 जून 2026

असम से लेकर मेघालय तक दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले लोग अब सवाल पूछना सीख गये हैं। वह धीरे से लेकिन पूछते हैं, क्या यह बदलाव हम तक भी पहुंचेगा, क्या यह टिकेगा?

मैंने एक पूरा हफ्ता पूर्वोत्तर में यहां के स्थानीय लोगों के बीच बिताया और देखा कि यहां क्या बदलाव हो रहे हैं। हालांकि, जो जवाब मुझे मिले, उनकी मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी।

पहले 1,000 दिन

यूनिसेफ में हम पहले 1000 दिनों पर बहुत ज़ोर देते हैं। बच्चे के विकास के लिए यह सबसे जरूरी है, लेकिन अक्सर इसी को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। यही 1000 दिन उचित पोषण और देखभाल से बच्चे के दिमाग की बुनावट तय करते हैं, इम्यून सिस्टम बनाते और उसका भावनात्मक जुड़ाव आने वाली पूरी ज़िंदगी की नींव रखता है।

जब मैं उस पहली सुबह असम के मोरीगाँव में पहाड़ीदुबा और थेंगभोंगा के आँगनवाड़ी केंद्रों में बैठी, तो मैंने देखा कि 1,000 दिनों पर काम करना असल में कैसा दिखता है। बच्चों की बढ़ती लंबाई इंच-दर-इंच नापी जाती है, माओं को खानपान की सलाह दी जाती है। 

स्थानीय खाने की विविधता और उसके फायदे बताए जाते हैं। यहां सब एक-दूसरे को अपने अनुभवो की कहानियां सुनाते हैं और वॉश की आदतें पर्चों से नहीं, बल्कि दिखाकर सिखाई जा रही थीं। यहां एक ही जगह पर पूरे समुदाय का प्यार, उत्साह और साथ दिखाई देता है।

हिमा और उसकी बहन

मेघालय के वेस्ट जैंतिया हिल्स के शकेंतालांग गाँव में मैंने एक टीकाकरण पर हो रही एक सामुदायिक बैठक में हिस्सा लिया। यह कोई सरकारी कार्यक्रम नहीं था, बल्कि समुदाय के लोगों ने आपसी सहमति से यह बैठक आयोजित की थी। 

यह समुदाय का अपना एक बेहतरीन और सच्चा प्रयास था। एक ऐसी जगह जहाँ बातचीत के ज़रिए आपसी भरोसा पनप रहा था। इस बैठक में बातचीत का मुद्दा महिलाएं और उनका स्वास्थ्य था, लेकिन पुरुष भी इसमें बराबर के हिस्सेदार थे।

और वहीं उस बैठक में मेरी मुलाकात हिमा रस्मुत से हुई।

24 वर्षीय हिमा के चार बच्चे हैं, सबसे छोटे वाला सिर्फ सात हफ्ते का है। कुछ समय पहले ही उनके पति का निधन हो गया था। और उस दिन तक हीमा के पहले बच्चे को छोड़कर बाकी तीनों को एक भी टीका नहीं लगा था।

UNICEF India's Chief of Field Services sits among a group of women and children gathered in a community hall in rural Meghalaya, listening attentively as part of a women-led discussion on immunization, with red chairs and other community members visible in the background.
UNICEF Soledad Herrero, Chief of Field Services, UNICEF India, joins a community gathering of mothers in West Jaintia Hills, Meghalaya, as part of immunization-focused conversations led by local Buddy Mothers.

इसकी वजह उनके पहले बच्चे से शुरू हुई थी। जन्म के वक्त हिमा के पहले बच्चे को बीसीजी (BCG) का पहला टीका लगा था, जिसकी वजह से बच्चे को कुछ दिनों बाद एक रिएक्शन हुआ। जिसे अगर डॉक्टरी नज़रिए से देखा जाये तो ये बिल्कुल सामान्य था, लेकिन पहली बार माँ बनी हिमा के लिए अपने बच्चे का दर्द बर्दाश्त से बाहर था। 

ऐसे में हिमा तक कोई जागरूकता अभियान नहीं पहुंचा, उसे किसी ने नहीं बताया यह नॉर्मल रिएक्शन है, किसी ने नहीं कहा कि बच्चा ठीक हो जाएगा। उसी खामोशी के बीच हिमा के मन में डर ने जन्म ले लिया। जिसके बाद हिमा ने अपने किसी बच्चे को इंजेक्शन नहीं लगवाया।

यह कहानी अकेली हिमा की ही नहीं है। बल्कि पूरे मेघालय में 4,548 बच्चे "ज़ीरो-डोज़" की श्रेणी में हैं, यानी इन बच्चों को अभी तक एक भी टीका नहीं लगा है। मेघालय के सात प्राथमिकता वाले ज़िलों में यूनिसेफ और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन मिलकर GAVI HSS-3 कार्यक्रम चला रहे हैं।

हिमा तक आखिरकार मदद और जागरूकता पहुंची, लेकिन वो कोई स्वास्थ्यकर्मी नहीं थी। बल्कि, वो एक 'बडी मदर' थी।

ट्रूफिना रस्मुत यूनिसेफ और एनएचएम (NHM) मेघालय तथा राज्य स्वास्थ्य प्रणाली संसाधन केंद्र के मानव-केंद्रित डिज़ाइन (HCD) कार्यक्रम के तहत बड़ी मदर बनी हैं। 'बेइलांगकी' कार्यक्रम अब 285 गाँवों में 276 समूह बना चुका है। यह कार्यक्रम महिलाओं को सिर्फ संदेश ही नहीं देता, बल्कि यह बातचीत के जरिए उनकी सोच को बदलता है।

मैं चुपचाप उनकी कहानियाँ सुनने के लिए उनके बीच बैठ गई, और मैं भी उस जादू का हिस्सा बनी जो औरतों की आपसी बातचीत में होता है।

"टीके दवाओं से बेहतर काम करते हैं। तुम इंजेक्शन लगवाकर उन बीमारियों से अपने बच्चों को बचा रही हो, जो होती तो हैं, लेकिन दिखती नहीं देती। फिर उसने धीरे से, लेकिन बेबाकी से, वो बात भी कही जो सिर्फ एक बहन ही दूसरी बहन से कह सकती है, "तुम्हारे पति अब नहीं रहे। अब ये बच्चे तुम्हारी ज़िम्मेदारी हैं। इन्हें टीका लगवाओ, ताकि ये ज़िंदगीभर बीमारियों से दूर और सेहतमंद रह सकें। तुम्हें इनकी ज़रूरत है और इन्हें तुम्हारी।"

ट्रूफिना ने हिमा से कहा

और बस इस छोटी सी लेकिन असरदार बातचीत का हिमा पर जादू हो गया। हिमा ने वादा किया कि वो अपने बच्चे को टीका लगवाने लाएगी।

दो छोटे बच्चों की माँ होने के नाते उस पल का हिस्सा बनना मेरे लिए बड़ी बात थी। खासकर तब जब एक माँ ने अपने डर पर काबू पाकर ऐसा फैसला लिया, जो उसके बच्चों की जिंदगी को बदल देगा। यही वो पल था जब एक औरत ने दूसरी को समझा और समझाया था।

मुझे यकीन है कि अब हिमा धीरे-धीरे स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में और जानेंगी, और अपने बच्चों के लिए बेहतर आदतें अपनाने के लिए तैयार भी होंगी। यही तो है असली बदलाव, जब एक अच्छी सोच दूसरी को जन्म देती है।

ऐसी कहानी सिर्फ अकेली हिमा की नहीं है, बल्कि मावक्रिआह ईस्ट गाँव में 38 ऐसे बच्चों की पहचान हुई जिन्हें टीका नहीं लगा था। बड़ी मदर्स की अगुवाई में हुई बातचीत से हर एक बच्चा वापस टीकाकरण केंद्र तक पहुँचा। 

यह अब यूनिसेफ की एक फ़ीचर्ड केस स्टडी (featured case study) है, क्योंकि इससे हमें पता चलता है कि यह तरीका अगर बड़े पैमाने पर लागू किया जाए तो कितना कामयाब रहेगा।

जब प्रशासन का सहयोग मिला

भरोसे की बातचीत अकेले नहीं होती, यह सिस्टम के भीतर होती है। कैसे शासन चलता है, पैसा कहाँ से आता है और किसकी क्या ज़िम्मेदारी होगी।

मैंने कई देशों में देखा है कि राज्य स्तर पर तय होने वाले नियमों और ज़िला स्तर पर तय होने वाले नियमों में एक बड़ी खाई होती है। लेकिन वेस्ट जैंतिया हिल्स में इसके बिल्कुल उलट हो रहा था। जोवाई में ज़िला कलेक्टर के दफ्तर में राज्य की मातृ, नवजात और बाल स्वास्थ्य (MNCH) रोडमैप ज़मीनी स्तर पर उतारने के बारे में विस्तृत चर्चा हो रही थी। स्वास्थ्य कार्यक्रमों की अगुवाई के साथ ग्रामीण विकास, सामाजिक कल्याण, शिक्षा और आपदा प्रबंधन सब एक साथ हो रहा था।

एक माँ जो आँगनवाड़ी जाती है, स्वास्थ्य केंद्र जाती है या रेफरल गाड़ी लेती है। वो इन्हें अलग-अलग विभागों का काम नहीं समझती। उसके लिए यह एक ही सफर है। यह व्यवस्था वाकई असरदार है। यह उस माँओं के सफर को ध्यान में रखकर बनाई गई है, ना कि विभागों की सीमाओं का ध्यान रखा गया है।
 

Five people stand together for a group photo against a wooden-panelled wall. Among them are the Chief Minister of Meghalaya, Conrad K. Sangma, in a grey suit, and UNICEF India's Chief of Field Services, alongside three colleagues, following a meeting on child and maternal health priorities in the state.
UNICEF Soledad Herrero, Chief of Field Services at UNICEF India, met with Meghalaya's Chief Minister Conrad K. Sangma and UNICEF colleagues to discuss "Mission 003," aimed at eliminating maternal deaths and ensuring healthy growth for every child in their first 1,000 days.

मिशन 003

जब मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड के. संगमा से मेरी मुलाकात हुई, तो मेरे ज़हन में वो सब कुछ ताजा था जो मैंने इस सफर के दौरान अनुभव किया। आँगनवाड़ी कार्यकर्ताएँ, माँओं की वो सामुदायिक बैठक, हिमा और उनकी बडी मदर ट्रूफिना, ज़िला कलेक्टर का सबसे मुश्किल ब्लॉकों का ज़िक्र और मेज़ पर अपनी जगह माँगती युवा आवाज़ें।

तभी 'मिशन 003' का विचार आकार लेने लगा। इस कार्यक्रम का उद्देश्य मातृ मृत्यु, कुपोषण और कम टीकाकरण पर सरकार के सारे प्रयासों को एक छत के नीचे लाना था। इसके पीछे की सोच यही है कि पहले 1,000 दिनों में मातृ मृत्यु शून्य हो, कोई बच्चा बिना टीके के न रहे और हर बच्चा तीन फुट की सामान्य लंबाई तक पहुँचे। यह मिशन मज़बूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और कई विभागों के साझा कार्यों पर टिका होगा।

यह हिमा की सबसे छोटी बेटी जैसे बच्चों से किया गया एक वादा भी है। यूनिसेफ इस मिशन के पीछे पूरी तरह खड़ा है, और असम, मेघालय और पूरे पूर्वोत्तर की सरकारों की प्रतिबद्धता के साथ भी। 

क्योंकि, आने वाली पीढ़ियों को जीने और आगे बढ़ने के बेहतर मौके और आखिरी छोर तक पहुंचने वाला बदलाव भी तभी टिकेगा, जब बदलाव लोगों का अपना हो, सिस्टम मज़बूत हो और जिन समुदायों की वो सेवा करे उनका भरोसा भी कमाए।

 

ब्लॉग के बारे में

यूनिसेफ अपने हर काम में प्रत्येक बच्चे के अधिकारों और कल्याण को बढ़ावा देता है। अपने साझेदारों के साथ मिलकर, यूनिसेफ बच्चों के अधिकारों और सुरक्षित बचपन को व्यावहारिकता में बदलने के लिए 190 देशों और क्षेत्रों में काम कर रहा है।

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