मैं डाक टिकट पर हूँ

सम्मान की एक मुहर: यूनिसेफ़ के साथ जुड़ी मेरी सबसे ख़ास याद

नीना गुप्ता
Former UNICEF Staff, Neena Gupta on postage stamp marking UNICEF's 40th Anniversary
UNICEF
08 दिसम्बर 2025

साल 1986—एक बहुत ही महत्वपूर्ण साल था, क्योंकि उसी साल यूनिसेफ़ ने अपने 40 वर्ष पूरे किए थे।
11 दिसंबर 1986 को यूनिसेफ़ के बच्चों के लिए काम के 40 साल पूरे होने पर भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने दो डाक टिकट जारी किए—50 पैसे और 5 रुपये के। इन टिकटों पर “टीकाकरण” और “विकास निगरानी (Growth Monitoring)” की थीम दर्शाई गई थी।

कुछ महीने पहले, हमारी सूचना शाखा से सुश्री राज़िया इस्माइल और सुश्री रेनू घोष इन थीम्स से मेल खाते कुछ अच्छे फ़ोटोग्राफ ढूंढ रही थीं। उन्होंने सोचा कि स्टाफ के बच्चों की तस्वीरों से बेहतर क्या हो सकता है! उसी समय, मेरा बेटा, अनिमेष, लगभग नौ महीने का था—(उसका जन्म 15 नवंबर 1985 को हुआ था)।

रेनू मेरे पास आईं और बोलीं कि क्या वह मेरे घर आकर मेरी और मेरे बेटे की कुछ तस्वीरें ले सकती हैं। उन्होंने यह नहीं बताया कि क्यों, और मैंने भी ज़्यादा पूछताछ नहीं की।

उस शनिवार वह फ़ोटोग्राफ़रों की एक टीम के साथ मेरे घर आईं। उन्होंने मेरी गोद में बैठे मेरे बेटे की तस्वीरें लीं, जिसमें एक नर्स नकली सिरिंज से टीका लगाती हुई दिखाई दे रही थी।

और वही तस्वीर 5 रुपये के डाक टिकट पर छप गई—यक़ीन कीजिए!
यह टिकट 11 दिसंबर 1986 को डाक विभाग द्वारा आधिकारिक रूप से जारी किया गया। इसकी खबर टीवी पर भी दिखाई गई, पर मुझे पता ही नहीं था, इसलिए मैं वह प्रसारण नहीं देख पाई। बाद में रिश्तेदारों ने बताया कि उन्होंने टीवी पर मुझे देखा—वाह!

अगली सुबह मैं अपने ऑफिस में बैठी थी, तभी उस समय के रीजनल डायरेक्टर, श्री डेविड हैक्सटन, पूरे 5 रुपये के टिकटों की एक शीट झंडे की तरह लहराते हुए सीढ़ियाँ चढ़कर आए।
उन्होंने मुझे गले लगाया और जो कहा, वह आज भी मेरे कानों में गूंजता है: “प्रिय, हर किसी को जीवन में स्मारक डाक टिकट पर जगह नहीं मिलती—तुम उनमें से चुनी हुई हो!”

इस अनोखे सम्मान की सबसे ख़ास बात यह है कि मैं इसके बारे में खुलकर और ख़ुशी से बात कर सकती हूँ—क्योंकि यह पूरी तरह किस्मत से मिला उपहार था। न मुझे इसके लिए मेहनत करनी पड़ी और न ही इसमें कोई अहंकार की बात है।
कोई मुझसे कभी इसका नकारात्मक पक्ष नहीं पूछता—लेकिन अगर आप मेरे बेटे से मेहनत करने को कहें, तो वह मज़ाक में कह देता है:

“मैं तो भारत के डाक टिकट पर आ चुका हूँ—अब और क्या हासिल करना है!”

आज भी वह पल मेरे दिल में बसा हुआ है, और मैं यूनिसेफ़ परिवार का हिस्सा होने पर इससे ज़्यादा कभी गर्व महसूस नहीं कर सकती।

— नीना गुप्ता

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