पिछले महीने यूनिसेफ इंडिया से जुड़ने के बाद भारत के हृदय में बसे मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल का यह मेरा पहला फील्ड मिशन था, और इसने मुझे ज़मीनी स्तर पर महिलाओं और बच्चों की भलाई के लिए हो रहे कामों की गहराई को दिखाया।
वरिष्ठ अधिकारियों से लेकर स्वास्थ्यकर्मियों तक, हर मुलाकात में महिलाओं और बच्चों की ज़िंदगी बदलने के लिए किए जा रहे ईमानदार और प्रयास साफ नज़र आए।
हमने कई तरह की ज़मीनी पहलें देखीं, जो एक ही साझा मकसद से जुड़ी थीं। सरकार और समुदाय मिलकर बच्चों को बेहतरीन शुरुआत देने और उनके जीवित रहने व फलने फूलने के बेहतर मौके देने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
माँ की गोद की ताकत
भोपाल से 85 किलोमीटर उत्तर पश्चिम में स्थित नरसिंहगढ़ से रेफर की गई एक बच्ची को साँस लेने में तकलीफ थी, और उसका इलाज सीपीएपी यानी कंटीन्यूअस पॉज़िटिव एयरवे प्रेशर तकनीक से किया गया।
चिकित्सा उपचार से परे एक बच्चे को अपनी माँ के स्पर्श को महसूस करना भी उतना ही ज़रूरी था। डॉक्टरों ने बताया कि एमएनसीयू में देखभाल मिलने के बाद से बच्ची की सेहत में काफी सुधार आया है। अपनी बेटी के पास लेटी समिता के चेहरे पर राहत भरी मुस्कान थी, वो खुश थीं कि पूरे इलाज के दौरान वो अपने बच्चे के पास रह सकीं।
इसी वार्ड में हमारी मुलाकात आरती से हुई, जो जुड़वां बच्चों की माँ हैं। जन्म के बाद उन्हें मैटरनल एंड नियोनेटल केयर यूनिट में भर्ती किया गया था, और अब वो धीरे-धीरे ठीक हो रही हैं।
"जुड़वां बच्चों का होना हमारे परिवार के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। इलाज के दौरान हर दिन अपने बच्चों के साथ रहकर उन्हें देखती हूं, तो मुझमें उनकी देखभाल करने का हौसला आता है। डॉक्टर और नर्स हमेशा हमारे साथ खड़े रहते हैं, जब भी ज़रूरत हो हमारा मार्गदर्शन करते हैं।"
एमएनसीयू यूनिट का असली मकसद यही है, यहां ज़ीरो सेपरेशन का मतलब है कि इलाज के दौरान माँ को बच्चे से अलग नहीं किया जाता, बल्कि वो देखभाल में बराबर की भागीदार होती है।
पीडियाट्रिक्स विभाग की प्रमुख डॉ मंजूषा गोयल ने इसे कुछ यूँ समझाया कि, "एमएनसीयू में माँएं मेहमान नहीं होतीं, वो केयरगिवर होती हैं। हमारा काम है उन्हें सहारा देना, उनका आत्मविश्वास बढ़ाना और उन्हें अपने बच्चों की देखभाल में एक सक्रिय भागीदार बनाना।"
कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेंगे
ज़मीनी स्तर पर दिख रही इस प्रगति को मज़बूत नेतृत्व का भी पूरा साथ मिल रहा है। यूनिसेफ टीम को मध्य प्रदेश के उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल से मिलने का मौका मिला।
हमने मातृ और शिशु स्वास्थ्य सुधारने की दिशा में राज्य के द्वारा किये जा रहे लगातार प्रयासों की चर्चा की। खास तौर पर शिशु और मातृ मृत्यु दर घटाने की रणनीतियों को और मज़बूत करने पर। उनका यह कहना कि "कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेंगे" एक ऐसा संदेश था, जिसने मध्य प्रदेश में महिलाओं और बच्चों की जान बचाने की दिशा में भरोसा और उम्मीद दोनों जगाई।
एम्स भोपाल का तकनीकी केंद्र
एम्स भोपाल के रीजनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर न्यूट्रिशन रिहैबिलिटेशन, रिसोर्स एंड ट्रेनिंग की विजिट में मैंने देखा कि गंभीर रूप से कुपोषित यानी सैम बच्चों के जटिल मामलों में किस तरह क्लीनिकल और थेरैप्यूटिक देखभाल दी जा रही है।
इन बच्चों को सैम एडवांस्ड ट्रीटमेंट एंड रिसर्च यानी स्मार्ट यूनिट के ज़रिए उचित देखभाल मिल रही है। यह केंद्र पूरे मध्य प्रदेश में न्यूट्रिशन रिहैबिलिटेशन सेंटरों को मार्गदर्शन और सहायता भी देता है।
एम्स के कम्युनिटी एंड फैमिली मेडिसिन विभाग में स्थापित यह स्टेट सेंटर ऑफ एक्सीलेंस राज्य की गंभीर कुपोषण के खिलाफ लड़ाई की रीढ़ है। यह खंडवा और नर्मदापुरम जैसे दो सघन ज़िलों में आंगनवाड़ी केंद्रों को गुणवत्तापूर्ण कम्युनिटी बेस्ड मैनेजमेंट ऑफ एक्यूट मालन्यूट्रिशन यानी सीएमएएम कार्यक्रम चलाने में सीधी मदद देता है।
एम्स मध्य प्रदेश भर में कम्युनिटी आधारित पोषण कार्यक्रमों को मज़बूत करने के लिए ज़रूरी तकनीकी विशेषज्ञता तैयार करने में मदद करता है। यह पहल दिखाती है कि जब नवाचार और साझा ज्ञान एक साथ आते हैं, तो बच्चों के लिए बेहतर और स्वस्थ नतीजे सामने आते हैं।
सुरक्षित और मज़बूत समुदायों का निर्माण
असली बदलाव सिर्फ अच्छी नीतियों से नहीं आता, इसके लिए ऐसे समुदाय चाहिए जो परवाह करें, ऐसा नेतृत्व चाहिए जो सुने, और ऐसी साझेदारियाँ चाहिए जो लोगों को साथ लेकर चले।
यह बात भोपाल की सेफ सिटी इनिशिएटिव के तहत काम कर रहे नगर निगम अधिकारियों, वार्ड पार्षदों और सिविल सोसाइटी संगठनों से बातचीत में साफ दिखी। यूनिसेफ की मदद से बनी यह साझेदारी साबित करती है कि बच्चों के लिए सुरक्षित और पोषक माहौल बनाना एक साझा ज़िम्मेदारी है, जो स्थानीय टीमवर्क से ही फल-फूल सकती है।
We met 13-year-old Astha there, a young girl whose life has been transformed through the collective efforts of government agencies and civil society organisations. A few years ago, she and her family lived on the roadside in difficult circumstances.
With timely interventions and sustained support, they were connected to essential services, and Astha was enrolled in school. Despite a late start in her education compared to most children her age, she proudly shared that she is now in Class IV, alongside younger classmates, and is learning with remarkable confidence and determination.
Listening to Astha reminded me that when children are given a genuine opportunity to learn, they discover in themselves the potential that once seemed unimaginable. A fresh chance, coupled with compassion and belief in their abilities, can transform not only a child's future, but an entire family’s story.
Madhya Pradesh Police officials shared how community policing has become a powerful tool for protecting women and children, not only by responding to violence but also by preventing it. The conversation highlighted how change becomes truly sustainable when communities themselves become part of the solution.
A Shared Vision for the Future
I returned from Madhya Pradesh with a deep sense of optimism. Places we visited and people we met included committed public servants, dedicated health professionals, engaged community leaders, children, women, passionate partners and communities who received services.
In their respective roles, they are united by a single, powerful mandate: every child has the right to the best start in life. UNICEF is proud to work alongside the Government of Madhya Pradesh on this vital journey.