झारखंड के अनुभवों से मिली सीख

जब प्रशासन व्यवस्था और समुदाय साथ मिलकर चलेंगे तो होगा बच्चों का कल्याण

सोलेदाद हेरेरो, चीफ फील्ड सर्विसेज, यूनिसेफ इंडिया | आस्था आलंग, कम्युनिकेशन स्पेशलिस्ट, यूनिसेफ
Smiles that reflect confidence, curiosity, and choice—girls at JBAV Ratu after conversations on STEM, Eco Clubs, menstrual health, and body confidence.
UNICEF Smiles that reflect confidence, curiosity, and choice—girls at JBAV Ratu after conversations on STEM, Eco Clubs, menstrual health, and body confidence.
24 फ़रवरी 2026

झारखंड से लौटते हुए मैं अपने साथ कई तरह के अनुभव और सीख साथ आई हूँ। इन तीन दिनों में हमने देखा कि जब समुदाय, सेवाएँ और युवाओं की भागीदारी एक साथ जुड़कर काम करते हैं, तो बच्चों के अधिकार सिर्फ़ नीतियों में नहीं, बल्कि ज़मीनी स्तर पर दिखाई देने लगते हैं। समुदाय की भागीदारी, सेवाओं की बेहतर व्यवस्था और युवाओं की सक्रिय भूमिका मिलकर बदलाव ला रही है।

किशोरों की आवाज़ें बनी बदलाव की ताकत

पहले दिन बाल संवाददाताओं, स्थानीय लोगों और सरकार के प्रतिनिधियों से बाल विवाह पर चर्चा हुई, लेकिन यह बातचीत सिर्फ़ बाल विवाह तक सीमित नहीं रही। हमारे साथ लड़कियों ने भी खुलकर इस चर्चा में हिस्सा लिया और बताया कि सामाजिक बंदिशों और सुरक्षा के नाम पर प्रतिबंध लगाकर उनकी आजादी छीन ली जाती है। यहां लड़कों ने भी अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि अच्छा प्रदर्शन करने का दबाव और हर समय-हर परिस्थिति में मजबूत दिखने की अपेक्षा अब उनके लिए बंदिश बन चुकी है।

कमरे में सादगी के साथ संवेदनशीलता भी थी। किशोरों ने साफ लफ्जों में कहा कि बाल विवाह खत्म करने के लिए सिर्फ़ जागरूकता अभियान काफी नहीं हैं। अब ज़रूरत है बदलाव की, अवसरों की, मज़बूत समर्थन तंत्र की, जवाबदेही की और उनके सपनों पर विश्वास करने की।

वर्षा ने कहा, “हम चाहते हैं कि अब हमें बचाने के प्रयास करने की बजाय, हमारी आवाज को सुना जाए।”

इससे यह बात तो साफ हुई कि अब बच्चों और युवाओं को मदद से ज्यादा अपने साथ खड़े होने वाले मजबूत सहारे की जरुरत है। जो उनकी बातों-उनके विचारों को सुनकर उन्हें अमल में लाने का प्रयास कर सके।

During a joint home visit in Bindhani village, Shashi, the Sahiya, and Fabiola, the Anganwadi Worker, engage with both parents on caring for their baby.
UNICEF During a joint home visit in Bindhani village, Shashi, the Sahiya, and Fabiola, the Anganwadi Worker, engage with both parents on caring for their baby.
सुरक्षित शुरुआत, बेहतर भविष्य

जहां किशोरों ने व्यापक सोच दिखाई, तो जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने दिखाया कि बदलाव को हकीकत में कैसे बदला जाता है।

बिंधनी गांव में हमने आशा दीदी शशि और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता फेबियोला के साथ नवजात बच्चों वाले परिवारों का दौरा किया। एक युवा मां अपने तीन महीने के बेटे को गोद में लिए बैठी थी, और शशि व फेबियोला उसे स्तनपान, शुरुआती खेल और स्वच्छता के बारे में समझा रही थीं। उनके पास एक ही फ्लिपबुक थी, लेकिन दोनों ने उसे पूरी समझ के साथ इस्तेमाल किया। उनका तरीका आदेश देने वाला नहीं, बल्कि समझाने और सक्षम बनाने वाला था।

वहाँ किसी तरह की उलझन नहीं थी। हमें वहां सिर्फ एक संदेश, एक बच्चा और एक माँ दिखाई दीं!

उसी दिन आंगनवाड़ी केंद्र में प्रारंभिक बाल विकास सत्र के दौरान हमने माता-पिता को अपने छोटे बच्चों के साथ खेलते और हँसते देखा। जीवन के पहले 1,000 दिन बेहद महत्वपूर्ण होते हैं—इसी दौरान बच्चे के मस्तिष्क का लगभग 90 प्रतिशत विकास होता है। ये छोटे-छोटे पल सुनहरा भविष्य गढ़ रहे थे।

पास ही जल सहिया समुदाय में पानी की गुणवत्ता की जांच करके सुरक्षित पानी व स्वच्छता के बारे में जागरूकता बढ़ा रही थी। जब नुसरत बेगम से पूछा गया कि वे घर और काम दोनों कैसे संभालती हैं, 

तो उन्होंने मुसकुराकर कहा, “मैं और मेरे पति काम बांट लेते हैं। सुबह मैं जितना कर सकती हूँ करती हूँ, मेरे जाने के बाद बाकी वे संभाल लेते हैं।”

तभी मुझे समझ आया, बदलाव तो शांति से हर घर के भीतर पनप रहा है!

मासिक धर्म पर हुए बदलावों को हमने अपनी आंखों से साकार होते हुए भी देखा। भाई अब दुकानों से बिना किसी झिझक के अपनी बहन के लिए पैड खरीदते हैं और दुकानदार अब सैनिटरी पैड को काले बैग में देने से मना करता है। सही दिशा में उठाए गये यही छोटे-छोटे कदम एक दिन समाज में बड़ा बदलाव लेकर आएंगें।

Young voices, informed choices—adolescents after a rights-based workshop on child marriage and empowerment
UNICEF Young voices, informed choices—adolescents after a rights-based workshop on child marriage and empowerment
एक स्कूल ऐसा जहाँ खुलते हैं भविष्य के रास्ते 

रातू स्थित झारखंड बालिका आवासीय विद्यालय में प्रवेश करते ही हमें सकारात्मक ऊर्जा महसूस हुई। यहाँ 400 से अधिक लड़कियाँ पढ़ती हैं, जिनमें से कई आदिवासी और अनुसूचित जाति परिवारों से हैं। उनके लिए शिक्षा केवल पढ़ाई नहीं, बल्कि भविष्य के रास्ते खोलने का एक अवसर है।

उन्होंने हमें एसटीईएम (STEM) प्रयोग दिखाए, ईको क्लब की गतिविधियाँ बताईं। एक लड़की ने कहा, “पहले विज्ञान समझना मुश्किल लगता था, पर अब विज्ञान के सारे प्रयोग अपने से लगते हैं।”

एक कोने में लड़कियों ने बॉडी कॉन्फिडेंस पर एक नाट्य प्रस्तुति दी। साहसिक, मज़ेदार और गहरी समझ से भरे नाटक में उन्होंने नए मासिक धर्म प्रबंधन लैब के बारे में गर्व से बताया।

ऐसे पल याद दिलाते हैं कि सिर्फ स्कूल तक पहुंचना ही जरुरी नहीं होता, बल्कि सीखने का माहौल भी उतना ही जरूरी है।

नीति से व्यवहार तक जुड़ा नेतृत्व

मुख्य सचिव श्री अविनाश कुमार और विभिन्न विभागों के अधिकारियों के साथ बातचीत में यह साफ दिखा कि झारखंड में पोषण, प्रारंभिक बाल विकास, लड़कियों की शिक्षा, किशोर स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दे अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

नीतियाँ समाज को दिशा दिखाती हैं, लेकिन असली बदलाव आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, शिक्षक, किशोर, माता-पिता और सामुदायिक नेता लाते हैं जो जमीन पर हकीकत में काम करते हैं।

बदलाव की कहानी

झारखंड की कहानी किसी नाटक की कहानी नहीं, बल्कि यह लगातार किए गये स्थिर प्रयासों, मिलकर काम करने वाली व्यवस्थाओं और धीरे-धीरे बदलती सोच की कहानी है। यह अधिकारों को व्यवहार में बदलते देखने की कहानी है।

यूनिसेफ यहाँ सरकार और समुदायों के साथ मिलकर काम व्यवस्थाओं को मजबूत करने, युवाओं की आवाज़ आगे लाने और साक्ष्यों को कार्रवाई में बदलने के लिए करता रहेगा।

हर बच्चे के लिए, हर जगह!

ब्लॉग के बारे में

यूनिसेफ अपने हर काम में प्रत्येक बच्चे के अधिकारों और कल्याण को बढ़ावा देता है। अपने साझेदारों के साथ मिलकर, यूनिसेफ बच्चों के अधिकारों और सुरक्षित बचपन को व्यावहारिकता में बदलने के लिए 190 देशों और क्षेत्रों में काम कर रहा है।

यूनिसेफ इंडिया के और इसके कामों के बारे में अधिक जानकारी के लिए https://www.unicef.org/india/hi पर विजिट करें।

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