पोषण: जीवित रहने से बढ़ने तक
हम यह सुनिश्चित करने के लिए काम करते हैं कि देश के सभी बच्चों को बेहतर पोषण मिले जिससे उनका क्षमतापूर्ण विकास और प्रगति हो सके ।
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अच्छा पोषण - बच्चे के अस्तित्व और विकास का आधार
हम ऐसे भविष्य को बढ़ावा देने के लिए काम करते हैं, जिसमें स्वस्थ आहार, अच्छे खान-पान के तरीकों, पोषण संबंधी सेवाएं हों। हम यह सुनिश्चित करते हैं कि देश के सभी बच्चों, किशोरों और महिलाओं को बेहतर पोषण मिले, जिससे उनका क्षमतापूर्ण विकास और प्रगति हो सके।
पोषण बच्चों को स्वस्थ, खुश, उत्पादक किशोरों और वयस्कों को विकसित होने में सक्षम बनाने का आधार है। स्वस्थ आहार सिर्फ जीवित रहने और बढ़ने के बीच की खाई को ही नहीं पाटता, बल्कि इसका प्रभाव बच्चे के जीवन में लंबे समय के लिए पड़ता है।
बच्चे के जीवित रहने, उसके स्वास्थ्य और विकास के लिए पर्याप्त और ठीक संतुलित आहार महत्वपूर्ण है। सुपोषित बच्चों की स्वस्थ, उत्पादक और सीखने के लिए तैयार रहने की संभावना अधिक होती है।
अल्पपोषण का विपरीत प्रभाव होता है, इससे विकास रूक जाता है। बच्चे की बीमारियों और संक्रमणों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाती है।
चुनौतियां
भारत में लाखों बच्चों और युवाओं के लिए पौष्टिक और स्वस्थ भोजन करना कई बार बड़ी चुनौती बन जाता है। बच्चे या तो बहुत कम खाते हैं, या फिर ज़रूरत से ज़्यादा खाते हैं।
कुछ मामलों में बच्चे पर्याप्त खाना तो खा लेते हैं, लेकिन उनका भोजन पौष्टिक और विविध नहीं होता, जिससे शरीर को ज़रूरी सूक्ष्म पोषक तत्व (माइक्रोन्यूट्रिएंट्स) नहीं मिल पाते। इन सभी स्थितियों में बच्चों का विकास और उनकी सेहत प्रभावित होती है, जो बड़े होकर उनके जीवन पर असर डालती है।
पोषण के क्षेत्र में काफी प्रयास और सुधार होने के बावजूद, बहुत से बच्चे अभी भी कुपोषण से जूझ रहे हैं, जो उनके विकास को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है।
कुपोषण के अलग-अलग रूप अलग-अलग तरह की विकास संबंधी समस्याएँ पैदा करते हैं, जैसे बच्चे अपनी उम्र के अनुसार छोटे रह जाते हैं (स्टंटिंग) या अपनी ऊँचाई के हिसाब से बहुत दुबले-पतले रह जाते हैं (वेस्टिंग)।
इससे उनके शरीर और दिमाग को स्थायी नुकसान पहुँचता है, जिसका असर उनकी सीखने की क्षमता पर और बड़े होकर काम करने और कमाने की क्षमता पर भी पड़ता है।
बच्चों को जीवित रहने और बेहतर विकास के लिए आवश्यक पोषण मिले यह सुनिश्चित करना एक जटिल प्रक्रिया है। और यह केवल अपर्याप्त भोजन खाने के कारण नहीं होता है।
कुपोषण का एक और रूप है जरूरी विटामिन और खनिजों की कमी, जिससे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी होती है, जैसे एनीमिया।
अधिक वजन और मोटापा भी कुपोषण का ही एक रूप है। यह इस बात से जुड़ा है कि बच्चे किस तरह का और कितना भोजन करते हैं। वैश्विक चुनौतियों और परिवारों की आय कम होने के कारण, कई लोग अब सस्ते, पैकेज्ड और बहुत ज्यादा प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की ओर बढ़ रहे हैं।
इन खाद्य पदार्थों में बच्चों को ज़रूरी पोषक तत्व नहीं मिलते और यही अधिक वजन और मोटापे का कारण बनता है। कम उम्र में मोटापा होने से आगे चलकर डायबिटीज़ और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। महिलाओं में मोटापा गर्भावस्था के दौरान समस्याएँ पैदा कर सकता है।
आज भारत में बच्चे पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित हैं, लेकिन बच्चों की पोषण स्थिति सुधारने से भविष्य और भी सुरक्षित और बेहतर बनाया जा सकता है। भारत में जो बच्चे कमज़ोरी, दुबलापन या मोटापे से जूझ रहे हैं, अगर उनकी स्थिति सुधारी जाए तो आँकड़े बताते हैं कि केवल दुबलापन (wasting) की समस्या को हल करके ही भारत लगभग 48 अरब अमेरिकी डॉलर की आजीवन उत्पादकता बचा सकता है।
इसका मतलब है कि भारत के हर बच्चे को पूरा और संतुलित पोषण देना देश के भविष्य को सुरक्षित बनाने में मदद करेगा।
सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं की वजह से पोषण का संबंध लैंगिक असमानता से भी है। कुपोषण गर्भ में ही शुरू हो जाता है और पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है।
लैंगिक परंपराओं के कारण महिलाएँ अक्सर सबसे कम और सबसे अंत में खाती हैं, खासकर तब जब परिवार आर्थिक दबाव और खाद्य संकट झेल रहा हो। सबसे वंचित लड़कियाँ और महिलाएँ सबसे ज्यादा उपेक्षित और कुपोषित रहती हैं।
जब कोई माँ गर्भावस्था में कुपोषित होती है, तो उसके बच्चे के भी कुपोषित पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे कई बच्चे जन्म के समय बहुत छोटे होते हैं, जिन्हें अतिरिक्त देखभाल की ज़रूरत होती है और जिनके जीवन पर खतरा बना रहता है।
मातृ पोषण: बच्चे के विकास की कुंजी
गर्भावस्था के दौरान सही और पर्याप्त भोजन तथा पोषण सुनिश्चित करना बच्चे के पोषण की सुरक्षा की पहली सीढ़ी है। ऐसा इसलिए क्योंकि बच्चे का शारीरिक और मानसिक विकास का बड़ा हिस्सा माँ के गर्भ में ही होता है।
अगर गर्भवती महिला को पर्याप्त पोषण नहीं मिलता, तो माँ से भ्रूण तक पोषक तत्वों का पहुँचना कम हो जाता है। इसके कारण जन्मे बच्चे आगे चलकर कुपोषण के शिकार हो सकते हैं।
एनीमिया या आयरन की कमी दुनिया के सबसे आम और व्यापक पोषण संबंधी विकारों में से एक है। यह खराब गुणवत्ता वाले भोजन में पर्याप्त आयरन न मिलने से होता है।
एनीमिया खून में ऑक्सीजन के संचार को प्रभावित करता है, जिससे माँ और बच्चे दोनों पर नकारात्मक असर पड़ता है। इससे गर्भावस्था और प्रसव के परिणाम खराब हो सकते हैं, बच्चों की सही वृद्धि रुक सकती है और उनकी सीखने की क्षमता पर भी असर पड़ सकता है (International Food Policy Research Institute, 2016) । अन्य पोषक तत्वों की कमी, संक्रमण या सूजन भी एनीमिया का कारण बन सकते हैं।
एनीमिया गर्भवती महिलाओं में खून बहने का खतरा बढ़ा सकता है, समय से पहले मृत्यु का कारण बन सकता है और शारीरिक क्षमता व उत्पादकता को कम कर सकता है। यह भारत की कमजोर और वंचित समुदायों के लिए एक गंभीर समस्या बनी हुई है।
एनीमिया को कम करने से न केवल मातृ और नवजात मृत्यु दर का खतरा घटता है, बल्कि यह माँ और बच्चे को जन्म से जुड़ी कई जटिलताओं से भी बचाता है। इससे गर्भावस्था और प्रसव का अनुभव सकारात्मक बनता है।
महिलाओं का पोषण बेहद अहम है। यह सिर्फ उनका अधिकार ही नहीं है, बल्कि उनके जीवन, स्वास्थ्य, और समाज व परिवार में उनकी सक्रिय भागीदारी के लिए भी जरूरी है।
खासतौर पर गर्भावस्था और स्तनपान जैसे पोषण की दृष्टि से संवेदनशील समय में महिलाओं का सही पोषण सभी प्रकार के कुपोषण को रोकने की कुंजी है। यह सबसे कमजोर माताओं और बच्चों के लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
समाधान
शिशु के जीवन के शुरुआती क्षण मायने रखते हैं: पोषण की शुरूआत जल्दी करें और इसे जारी रखें
यूनिसेफ बच्चों के पोषण के अधिकार को बरकरार रखने में भागीदार एजेंसियों के साथ राष्ट्रीय और राज्य सरकारों का समर्थन करता है। इसके लिए जल्दी शुरुआत करना महत्वपूर्ण है।
गर्भाधारण से बच्चे के दूसरे जन्मदिन तक पहले 1,000 दिनों में बच्चे का तेजी से शारीरिक और मानसिक विकास होता है। इन शुरूआती वर्षों में बच्चे पर किया गया निवेश उसके विकास और स्वस्थ भविष्य के लिए जरूरी शुरूआत है।
यूनिसेफ सबसे कमजोर आबादी में स्टंटिंग और वेस्टिंग को कम करने के सरकार के प्रयासों में मदद देता है। यह 1000 दिनों के आसपास - गर्भाधान से लेकर दो साल तक - प्रमाणित उच्च-प्रभाव वाले हस्तक्षेपों के कवरेज को सार्वभौमिक बना कर किशोरियों और महिलाओं के लिए किया जा रहा है।
विशेष ध्यान भौगोलिक पॉकेट और सामाजिक समूहों पर है जहां पोषण के संकेतक भारत के और राज्य के औसत से काफी नीचे हैं। बच्चों की आहार प्रथाओं में सुधार करना, विशेषकर 6 से 18 माह की आयु के बच्चों के लिए पूरक आहार भी महत्वपूर्ण हैं।
अल्पपोषण की रोकथाम और उपचार के लिए केवल पोषण पर ध्यान देने की ही आवश्यकता नहीं है। इसके लिए आईवाईसीएफ को बढ़ावा देकर सुरक्षित पानी मुहैया करना, स्वच्छता को बढ़ावा देना और बीमारियों की रोकथाम और उनका उपचार करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। IYCF से पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में होने वाली हर 5वीं मृत्यु को रोका जा सकता है।
आईवाईसीएफ में स्तनपान, पूरक आहार और उचित देखभाल भी शामिल हैं, जो शिशुकाल और शुरूआती बचपन में बौनेपन और कमजोरी को रोकने के लिए जरूरी हैं। इससे बच्चे को जन्म से किशोरावस्था तक समग्र विकास को बढ़ावा मिलेगा।
सामाजिक और व्यवहार परिवर्तन संबंधी पहलें, विशेष रूप से वंचित समुदायों में समुदाय-स्तरीय काउंसलिंग, संवाद, मीडिया का शामिल होना छोटे बच्चों के लिए स्थानीय रूप से उपलब्ध, पोषक तत्वों से प्रचूर सस्ते खाद्य पदार्थों के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए अनिवार्य है। चूंकि कुपोषित माताओं के बच्चों की कुपोषित होने की संभावना अधिक होती है, यूनिसेफ किशोरियों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए पूरक आहार योजनाओं को बढ़ावा देता है।
सुरक्षित पानी मुहैया करना, स्वच्छता को बढ़ावा देने जैसी पहल के जरिये बीमारियों की रोकथाम, स्वास्थ्य और पोषण में सुधार होगा। 2008 की डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर कुपोषण के आधे से ज्यादा मामलों में खराब पानी, पर्यावरणीय असंतुलन जिम्मेदार है।
बीमारियों की रोकथाम और पोषण संबंधी परिणामों में सुधार के लिए साबुन से हाथ धोना, साफ और सुरक्षित पानी मुहैया कराना, सुरक्षित मल निपटान जरूरी हैं। पोषण में यूनिसेफ का काम भी अहम है, यह एक्टिव रूप से पोषण के लिए कार्य करने वाले सेक्टरों के साथ जुड़कर सहयोग करता है। जो सकारात्मक पोषण परिणाम लाने में योगदान करते हैं।
यूनिसेफ भारत सरकार के प्रयासों का समर्थन करता है। सरकार ने अपने इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कार्यक्रम चलाये:
- न्यायसंगत नीतियों और कार्यक्रमों के लिए क्षमता का निर्माण करना।
- छोटे बच्चों, किशोरों और गर्भवती महिलाओं के लिए पौष्टिक भोजन और सेवाओं तक पहुंच आसान करना।
- स्वस्थ आहार के बारे में जागरूकता बढ़ाना।
- छोटे बच्चों के शुरूआती पोष्टिक आहार और परवरिश के तरीकों के लिए मांताओं को प्रोत्साहित करना।
यूनिसेफ वंचित बच्चों तक पहुंचने और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए देश के सबसे कमजोर स्थानों पर काम करता है। और सुनिश्चित करता है कि सभी कमजोर वर्गों तक बच्चों को उचित पोषण और उनके कल्याण के लिए अधिकारों की रक्षा हो सके। इसके साथ ही बच्चों की उनकी क्षमता के अनुसार सपने पुरे करने में मदद करते हैं। हम हर दिन, हर बच्चे, किशोर, महिला के लिए बेहतर राष्ट्र बनाने के लिए कार्यरत है और कभी हार नहीं मानते।