पानी ढोने से नेतृत्व करने तक आदिवासी महिलाओं का सफर
राजस्थान में जल और जलवायु बदलाव की प्रेरक कहानी
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कई सालों तक उदयपुर की पहाड़ियों में रहने वाली आदिवासी महिलाओं की दिनचर्या एक जैसी थी। वे सबसे पहले उठती और सबसे आख़िर में सोती। परिवार की रोजमर्रा की जरुरतों को पूरा करने के लिए घर की औरतों को रोज़ाना दूर-दराज़ के इलाकों में में पानी लाने जाना पड़ता था। घर में पानी की कमी का बोझ उनके कंधों पर होता था।
लेकिन आज यहां की तस्वीर बदल चुकी है। वही महिलाएँ अब अपने हरे-भरे खेतों में मुस्कुराते हुए काम करती नज़र आती हैं। आदिवासी महिलाओं का सफर मील के फासले तय कर पानी ढोने की मजबूरी से शुरू होकर अब जलवायु नेतृत्व (Climate Leadership) तक पहुँच गया है, जहाँ वे पारंपरिक और नये ज्ञान के बल पर जलवायु परिवर्तन का नेतृत्व कर रही हैं।
राजस्थान एक सूखा और कम बारिश वाला राज्य है, जहाँ पानी की कमी हमेशा एक बड़ी चुनौती रही है। उदयपुर जिले के ब्रह्मानगर और पास के गांव आदोल में धरती का पानी (भूजल) लगातार घट रहा था, चरागाह कम होते जा रहे थे और बारिश भी कभी-कभार ही होती थी।
इसका सीधा असर लोगों की आजीविका पर पड़ने लगा। पानी की कमी, घटती खेती और बढ़ती महंगाई से परिवार जूझ रहे थे। सबसे ज्यादा असर महिलाओं और बच्चों पर पड़ा, क्योंकि पानी लाने में उनका बहुत समय और मेहनत लगती।
बदलाव तब शुरू हुआ जब सरकार की कई योजनाएँ एकसाथ मिलकर काम करने लगीं। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) को मनरेगा (MGNREGS) के साथ जोड़कर एक समग्र जलग्रहण (वाटरशेड) मॉडल अपनाया गया। इसका उद्देश्य पर्यावरण को फिर से मजबूत करना और समुदायों को पानी की कमी से निपटने के लिए तैयार करना था।
आदोल गांव में कुल 39 जलग्रहण कार्य किए गए। इनमें एनीकट, छोटे परकोलेशन टैंक, छत से वर्षा जल संग्रहण की व्यवस्था और खेतों में कंटूर ट्रेंच जैसी संरचनाएँ शामिल थीं। इसके बाद पौधे लगाने से चरागाह पुनर्जीवित हो गये।
सोलर पंप और ड्रिप सिंचाई जैसी तकनीकों से पानी का बेहतर उपयोग होने लगा और पशुओं के लिए चारा भी बढ़ा। इन जलवायु-अनुकूल किये गये उपायों से अरसे से सूखे पड़े पानी के स्रोत भरे, बंजर जमीन फिर से जीवित होने लगी और खेती में सुधार आया।
राज्य जलग्रहण विकास और मृदा संरक्षण विभाग के अनुसार, 2021–22 में इन कामों के शुरू होने के बाद इस इलाके में भूजल स्तर में औसतन करीब 19 मीटर की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
अब गांव के लोगों को पानी के लिए मानसून पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। पहले जमीन सूखी रहती थी और खेती नहीं हो पाती, लेकिन अब पानी की उपलब्धता के बाद लोगाें ने खेती करने का क्षेत्र बढ़ा लिया है।
गांव के हर घर में घरेलू उपयोग के लिए सालभर-हफ्तों के सात दिन पानी उपलब्ध रहता है। जो पानी यहां के लोगों को कभी-कभार ही नसीब होता था, अब वह यहां स्थायी सुविधा बन चुका है।
जब बंजर धरती पानी मिलने पर हरी-भरी हुई, तो प्रकृति को ही नहीं बल्कि यहां की महिलाओं को भी एक नया जीवन मिला। अपने खेतों में नई फसलें रोपनें के लिए गांव की महिलाओं ने खेतों का रुख किया।
लाली बताती हैं कि, “जब वाटरशेड का काम पूरा हुआ, तो हम सातों बहनें एकसाथ खेतों में काम करने आईं। हमने सोलर पंप से बंजर जमीन में पानी देकर फसलें उगाईं। अब हम कई तरह की सब्जियाँ उगाते हैं। इससे हमें आमदनी तो होती ही है, हम अपने बच्चों के लिए भी घर पर पौष्टिक खाना ले जा पाते हैं।”
मनरेगा की इस पहल ने खासकर महिलाओं के लिए आजीविका के नए अवसर पैदा किये। महिलाओं ने बंजर जमीन में खेती करके जमीन को फिर से उपजाऊ बनाया। इससे पशुपालन मजबूत हुआ और परिवारों के पोषण में सुधार आया। पानी यहां रोजी-रोटी के साथ-साथ रोजगार का साधन भी बन गया।
यूनिसेफ के सहयोग से राज्य सरकार इस सफल पहल को आगे बढ़ा रहा है। आमजन, समाज और निजी साझेदारों के साथ मिलकर राजस्थान में महिलाओं को सशक्त बनाने वाले और जलवायु-अनुकूल मॉडल को बढ़ावा दिया जा रहा है।
ब्रह्मानगर की यह कहानी संदेश देती है कि जब समुदाय, सरकार और साझेदार साथ मिलकर काम करते हैं, तो पानी केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि सम्मान और आजीविका का साधन बन जाता है।
आज ब्रह्मा नगर की महिलाएँ पानी के लिए तय की गई दूरी से नहीं पहचानी जातीं। बल्कि, उनकी पहचान उन हरे-भरे खेतों और लहलहाती फसलों से हैं, जिन्हें वे अपनी मेहनत से उगाती हैं और उस सुनहरे भविष्य से है जिसे वे अपने बच्चों के लिए संजो रही हैं।
जब महिलाएँ जलवायु-अनुकूल जल प्रबंधन समाधान के लिए काम करती हैं, तो हर बच्चे को उसका लाभ मिलता है।
यह कहानी वहीं से शुरू होती है जहाँ महिलाएँ बंजर जमीन को जीवनदान देती हैं और वहीं खत्म होती है जहाँ पानी सिर्फ खेतों और घरों तक नहीं, बल्कि हर बच्चे के भविष्य तक पहुँचता है।