आरंभिक बाल शिक्षा
स्कूल के लिए तैयारी और जीवनपर्यन्त शिक्षाके लिए आधारशिला तैयार करना
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किसी बच्चे के जीवन में उसके आरंभिक वर्ष (0 से 8 वर्ष) वृद्धि और विकास की सर्वाधिक अद्भुत अवधि होती है। हर तरह की शिक्षा और ज्ञान के लिए ये वर्ष आधारशिला का काम करते हैं। सही आधारशिला के भविष्य में कई फायदे होते हैं : स्कूल में उचित शिक्षा और उच्च शिक्षा की प्राप्ति से समाज को महत्वपूर्ण सामाजिक और आर्थिक लाभ प्राप्त होते हैं।
शोध के अनुसार अच्छी गुणवत्ता वाली आरंभिक शिक्षा और आरंभिक बाल विकास (ईसीई) कार्यक्रमों से ड्रॉपआउट और दोहराव के अवसर कम होते हैं और शिक्षा के हर स्तर पर बेहतर परिणाम मिलते हैं।
प्री-प्राइमरी शिक्षा से बच्चों को एक सुदृढ़ आधारशिला मिलती है जिस पर उनकी समस्त शिक्षा आधारित होती है, इसके बाद आने वाली शिक्षा का प्रत्येक चरण अधिक प्रभावशाली एवं उपयोगी बन जाता है।
भारत सरकार का प्री-स्कूल शिक्षा के लिए आईसीडीएस है, जो राज्यों में प्रारंभिक बाल विकास पर आधारित है। यह प्री-स्कूलों में दी जाने वाली 6 बुनियानी सेवाओं में से एक है। इसमें 1.37 मिलियन आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से बच्चों को टीकाकरण, स्वास्थ्य जांच, रेफरल, भोजन अनुपूरण, विकास निगरानी, स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा दी जाती है।
यूनिसेफ ने आरंभिक बाल शिक्षाऔर विकास केन्द्र (सीईसीईडी)अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली और एएसईआर सेंटर के साथ भागीदारी के द्वारा भारतीय आरंभिक बाल शिक्षा प्रभावी अध्ययन (इंडियन अर्ली चाइल्डहुड एजुकेशन इम्पैक्ट स्टडी) प्रस्तुत किया गया है। यह लंबे समय तक चलने वाली एक पांच-वर्षीय रिसर्च स्टडी है, जिसमें भारत के तीन राज्यों — असम, राजस्थान और तेलंगाना के ग्रामीण क्षेत्रों में 4 से 8 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों में से 4 वर्ष के 14000 बच्चों के दलों पर अध्ययन किया गया है।
भारत सरकार ने आरंभिक शिक्षा के विकास में निवेश को मान्यता देने के लिए वर्ष 2013 में राष्ट्रीय प्रारंभिक बचपन देखभालः और शिक्षा (ईसीसीई) नीति को अपनाया। भारत में कई बच्चे आंगनवाड़ी केन्द्रों में जाते हैं, जो बच्चों को शिक्षा देने, खेलकूद, पौष्टिक आहार खिलाने का कार्य करते हैं और उनमें ऐसे कौशल का विकास करती हैं जो जीवनपर्यंत उनकी शिक्षा में काम आएंगे।
सर्वे के आंकड़ों के अनुसार राज्यों में असमानताएं होने के बावजूद 3-6 वर्ष के 10 में से 8 बच्चे किसी न किसी ईसीसीई कार्यक्रम में नामांकित हैं। (उत्तर प्रदेश में जहां सबसे कम भागीदारी 43.7% है वहीं कर्नाटक में 86% के साथ सबसे अधिक भागीदारी है।)
नामांकित बच्चों में से लगभग आधे बच्चे निजी स्कूलों में नामांकित हैं, शहरी क्षेत्रों में यह संख्या बहुत अधिक है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (51%) के अधिकांश बच्चे ही आंगनवाड़ी केंद्रों में जाते हैं, जबकि जिन परिवारों की वित्तीय स्थिति अच्छी है उन (62%) के अधिकांश बच्चे निजी स्कूलों में जाते हैं।
शिक्षा मंत्रालय द्वारा जुलाई 2020 में जारी की गई नई शिक्षा नीति के अनुसार बच्चे की स्कूली शिक्षा 3 साल की उम्र से ईसीसीई को शामिल करने के साथ शुरू होती है। नीति के अनुसार, " प्री-प्राइमरी शिक्षा के लिए आंगनवाड़ी केन्द्रों में जाने से, बच्चों की स्कूली शिक्षा के लिए तैयारी हो जाती है, जहां वे संवादात्मक रुप से, खेलकूद आधारित तरीकों के माध्यम से शिक्षित अनुदेशकों से गुणवत्तापरक ज्ञान प्राप्त करते हैं।" 2030 से पहले यह सुनिश्चित किया जाएगा कि ग्रेड 1 में प्रवेश करने वाले सभी छात्र स्कूल के लिए तैयार हैं।
नई शिक्षा नीति में ईसीसीई के तीन साल और प्रारंभिक प्राथमिक ग्रेड (कक्षा 1 और 2) को सीखने की निरंतरता के रूप में प्रस्तावित किया गया है और इसे स्कूल की नींव के रूप में माना जाता है।
एनईपी 2020 की गुणवत्तापूर्ण ईसीसीई प्रोजेक्ट को लागू करने के लिए चार मॉडलों में इसकी सिफारिश की गई है। ये समुदायों में आंगनवाड़ी केंद्र, स्कूल परिसर में आंगनवाड़ी केंद्र, स्कूलों में प्री-स्कूल, और स्टैंडल अलोन प्री-स्कूल के जरिये लागू की जाएगी।
वैश्विक स्तर पर किये गये सर्वे के बाद जारी परिणाम के अनुसार बच्चे जब गुणवत्तापूर्ण प्री-स्कूल शिक्षा के बिना सीधे प्राथमिक विद्यालय में दाखिला लिया तो, शिक्षा पाने की तैयारी का जो स्तर उनमें पाया गया वह उम्मीद से कहीं कम था। अतः वे पाठ्यक्रम की मांग को पूरा नहीं कर पाते तथा उनकी शिक्षा का स्तर कम रह जाता है। अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है कि स्कूल के लिए तैयारी का बच्चों का यह निम्न स्तर प्राथमिक स्कूली शिक्षा की खराब गुणवत्ता से स्पष्ट रुप से जुड़ा हुआ है। इस तरह स्कूल की तैयारी के बिना उनके स्कूल छोड़ने और अपनी क्षमता के अनुसार नहीं सीखने की संभावना बढ़ जाती है।
भारतीय आरंभिक बाल शिक्षा प्रभाव अध्ययन (IECEI) 2017 के आंकड़ों के अनुसार जब बच्चे गुणवत्तापूर्ण आरंभिक बचपन शिक्षा (प्री-स्कूल) कार्यक्रम से गुजरते हैं, तो उनके सीखने के संभावना अधिक होती है, खासकर प्रारंभिक प्राथमिक कक्षाओं में।
कोविड-19 के कारण मार्च 2020 से आंगनवाड़ी केंद्र बंद हैं। इस दौरान आंगनवाड़ी कार्यकर्ता सोशल मीडिया प्लेटफार्मों का उपयोग करके माता-पिता तक पहुंचीं। उन्होंने घर-घर पहुंचकर दौरा करके पूरक पोषण आहार वितरित किया। कार्यकर्ताओं ने खेल-खेल में सीखने की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए माता-पिता के लिए गतिविधियों के मासिक कैलेंडर, गाने के वीडियो, कहानियों और कविताओं जैसी टास्क को साझा किया।
कोविड-19 में छोटे बच्चों की आंरभिक शिक्षा में माता-पिता ने अहम रोल निभाया। खेल-कूद की गतिविधियों में माता-पिता को अपने बच्चों के साथ लॉकडाउन की भांति अब भी समय बिताना चाहिए, ताकि माता-पिता की अपने बच्चों से नजदीकियां बढ़ सकें।
यूनिसेफ का ध्यान राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और 2013 में अपनाई गई राष्ट्रीय आंरभिक बचपन देखभाल और शिक्षा (ईसीसीई) नीति के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण ईसीई में सुधार के लिए प्रणालियों को मजबूत करने पर है। जो समावेशी और समान गुणवत्ता वाली शिक्षा व बराबरी के विकास को बढ़ावा दे। 3 से 6 साल तक के हर बच्चे को सीखने के लिए समान अवसर दे।
इसमें स्कूल के लिए बच्चों की तैयारी सहित सभी तीन आयामों को कवर करना होगा; बच्चों को स्कूल भेजने की शीघ्रता, घर पर खेल गतिविधियों के माध्यम से सीखाने पर जोर देना, बच्चों को प्री-स्कूलों में एनरोल करवा कर स्कूल के लिए तैयार करना।
यूनिसेफ प्री-प्राइमरी से बच्चों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का समर्थन करता है। इसके लिए हम एनईपी 2020 के तहत सिफारिश लागू कराने का समर्थन करेंगे, जिसमें एनसीईआरटी, निजी स्कूलों के साथ, प्री-स्कूल शिक्षा पाठ्यक्रम और स्कूल तैयारी कार्यक्रम में भी शामिल की जाये।