सौर ऊर्जा की ताकत और जल बहिनी के नेतृत्व में हर घर पहुंचा जल
छत्तीसगढ़ के गाँवों में पानी की तस्वीर को बदल रही सौर ऊर्जा और समुदाय की ताकत
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पैंतीस वर्षीय पूजा के कंधों पर अपने समुदाय की सबसे कीमती चीज (पीने के साफ पानी) की हिफाजत करना एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। छत्तीसगढ़ के धमतरी ज़िले के दरबा गाँव निवासी पूजा पूरे जोश, लगन और अपने गाँव की नब्ज़ को समझने की गहरी समझ के साथ जल वहिनियों[1] की एक पूरी टीम को संभालती हैं।
छत्तीसगढ़ के दूरदराज के आदिवासी गाँवों में महिलाओं और लड़कियों के लिए पानी लाना कोई रोज़मर्रा का काम नहीं, बल्कि यह एक सज़ा थी। हर दिन घंटों का वक्त उस सफर में खप जाता था, जिसे कितनी भी मेहनत के बावजूद कम नहीं किया जा सकता था।
लेकिन, आज सब कुछ बदल चुका है।
वही सूरज जो उस लंबे सफर को और तकलीफदेह बनाता था, आज सोलर पंपों के ज़रिए सीधे घरों में पानी पहुँचा रहा है।
पानी अनमोल है। और साफ़ व सुरक्षित पीने का पानी हर बच्चे का हक़ है।
"मैं पिछले साल सरपंच बनी। मैं धमतरी से हूँ और शादी के बाद जब इस गाँव में आई, तो धीरे-धीरे समझ आने लगा कि यहाँ के लोग किन मुश्किलों से जूझ रहे हैं, खासकर पानी के मामले में।"
घने जंगलों, ऊँची-नीची पहाड़ियों के बीच बसा ग्रामीण छत्तीसगढ़ भौगोलिक रूप से भारत के सबसे कठिन इलाकों में से एक और देश की सबसे बड़ी आदिवासी आबादी का घर है।
ऐसे दुर्गम इलाके में न तो बिजली के तार बिछाना आसान था और न ही यह किफायती (सस्ता, कम लागत वाला) था। यहां बिजली नहीं, तो पंप नहीं, और पंप नहीं, तो पाइप से पानी नहीं। यह बुनियादी ढाँचे की कमी दरअसल भौगोलिक समस्या थी।
भारत के जल जीवन मिशन के तहत छत्तीसगढ़ ने एक अहम फैसला लिया। दूरदराज के गाँवों तक बिजली का ग्रिड पहुँचने का इंतज़ार करने के बजाय, राज्य ने अपने दम पर चलने वाले ऑफ-ग्रिड सोलर पंप लगाए और उन बस्तियों तक पाइप से पानी पहुँचाया, जिन्हें पारंपरिक बुनियादी ढाँचा कभी छू भी नहीं पाया था।
कोयला उत्पादन के लिए प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ में अधिकांश ग्रिड-आधारित जल योजनाएं कोयले से उत्पन्न बिजली पर निर्भर रहती हैं। इसके विपरीत, ऑफ-ग्रिड सौर प्रणालियां पूरी तरह स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं और सीधे सूर्य की रोशनी से ऊर्जा प्राप्त करती हैं।
"सोलर पंप से पानी की आपूर्ति उन इलाकों में की गई जहाँ बस्तियाँ बिखरी हुई हैं और पहाड़ी ज़मीन की वजह से बिजली का ग्रिड आसानी से नहीं पहुँच सकता।"
जैसे-जैसे मौसम का मिज़ाज बदल रहा है और ऊर्जा की लागत बढ़ रही है, यूनिसेफ और सरकार मिलकर ग्रामीण इलाकों में सौर ऊर्जा चालित और ऊर्जा-दक्ष जल आपूर्ति प्रणालियों को बढ़ावा दे रहे हैं।
ताकि, वॉश सेवाएँ जलवायु के बदलावों को झेलने में और मज़बूत बन सकें। ये प्रणालियाँ साफ पीने के पानी की आपूर्ति को ज़्यादा भरोसेमंद बनाती हैं और साथ ही लागत, पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता, जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल और समुदायों पर बोझ सब कम करती हैं।
यह मॉडल जितना सरल है, उतना ही टिकाऊ भी है। 1.2 किलोवाट का सोलर पंप, 10,000 लीटर का पानी का टैंक और घर-घर तक नल कनेक्शन का एक नेटवर्क। हर इकाई पूरी तरह सौर ऊर्जा पर चलते हुए दिन में दो बार, हर रोज़ पानी देती है। न कोई ईंधन, न बिजली का खर्च, न किसी बाहरी ग्रिड का झंझट।
अप्रैल 2026 तक छत्तीसगढ़ के सभी 31 ज़िलों में ऐसी लगभग 7,500 योजनाएँ चालू हो चुकी थीं, जो राज्य की एकल-गाँव पाइप जल आपूर्ति प्रणालियों का 25 प्रतिशत हिस्सा हैं।
धमतरी ज़िला अब एक मॉडल सोलर हब के रूप में पहचाना जाता है। यहां 226 योजनाएँ 6,500 से अधिक घरों को पानी दे रही हैं, हर साल लगभग 5,94,000 यूनिट स्वच्छ ऊर्जा पैदा हो रही है और 420 टन से ज़्यादा CO₂ उत्सर्जन से बचा जा रहा है।
जो भारत के NDC 3.0 के लक्ष्य को और मज़बूत करता है। जो काम एक बुनियादी ढाँचे की कमी को पूरा करने के लिए शुरू हुआ था, वह जलवायु समाधान भी बन गया।
और इस पूरे मॉडल को आगे बढ़ाने वाली असली ताकत महिला शक्ति है। ये सिस्टम महिलाओं के दम पर टिके हैं। जल बहिनियों के नाम से जानी जाने वाली प्रशिक्षित महिलाओं द्वारा समर्थित ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियाँ रोज़ाना का काम संभालती हैं।
टैरिफ वसूली की निगरानी, जल वितरण और गुणवत्ता की जाँच, तथा खराबी आने पर मरम्मत की सूचना देना। ये महिलाएँ इस व्यवस्था की महज़ लाभार्थी नहीं हैं, बल्कि इसकी असली संरक्षक हैं।
जिन महिलाओं ने कभी हर सुबह दो से तीन घंटे पानी लाने में बिताए हों, उनके लिए दरवाज़े पर नल का कनेक्शन होना सिर्फ एक सुविधा नहीं है। बल्कि, यह उससे कहीं बढ़कर है।
यह उनके लिए अपने बच्चों के साथ बिताने के लिए, अपनी आजीविका को बढ़ाने और खुद पर ध्यान देने के लिए मिला हुआ वक्त है। ज़िंदगी की सबसे ज़रूरी चीज़ का यह एक शांत लेकिन गहरा बदलाव है।
"पहले बोरवेल से पानी लाना बहुत मुश्किल था। सोलर पंप ने पानी की आपूर्ति को इतना आसान बना दिया है। जिस काम में पहले घंटों लग जाते थे, अब वही काम दरवाजे पर ही कुछ मिनटों में हो जाता है। अब मुझे अपने छोटे बच्चे के साथ बिताने के लिए भरपूर वक्त मिलता है।"
छत्तीसगढ़ की सौर जल कहानी असली और उल्लेखनीय है, यह अभी भी पूरी तरह लिखी भी नहीं गई है।
छत्तीसगढ़ में सौर ऊर्जा से चलने वाली जल आपूर्ति अब कोई पायलट प्रोजेक्ट नहीं रही। बल्कि, यह तो आज़माया हुआ और आगे बढ़ाया जा सकने वाला मॉडल बन चुका है।
जो आखिरी छोर तक साफ पानी पहुँचाता है, कार्बन उत्सर्जन घटाता है, खर्च कम करता है और महिलाओं को सेवा वितरण के केंद्र में रखता है।
छत्तीसगढ़ ने यह साबित किया है कि सब कुछ मुमकिन हो सकता है जब तकनीक को इलाके के अनुसार ढाला जाए। जब समुदायों पर नेतृत्व का भरोसा किया जाए और जब स्वच्छ ऊर्जा व साफ पानी को साथ मिलकर हासिल किया जाए।
सरपंच से लेकर जल बहिनियों और मुख्य अभियंता तक यह कहानी हर स्तर पर महिलाओं की उस ताकत को दर्शाती है जो एक टिकाऊ मॉडल को चुपचाप ज़िंदगियाँ बदलते देख रही है।
"जब से मैं सरपंच बनी हूँ, मेरे बच्चे कहते हैं कि उन्हें मुझ पर गर्व है। वे मुझे बैठकों में जाते और लोगों की समस्याओं को सुलझाते देखते हैं। मैं सभी गाँव वालों से बस यही कहना चाहती हूँ कि पानी की कद्र करो, इसे बर्बाद मत करो। अब पानी घर तक आ गया है, तो यह सोचने का वक्त है कि हम इसे कैसे इस्तेमाल करें।"
छत्तीसगढ़ में हर सुबह सूरज उन जंगलों और पहाड़ियों के ऊपर उगता है जिन्होंने कभी यहाँ के लोगों को सबसे बुनियादी हक़ से दूर रखा था।
आज वही सूरज सोलर पैनलों पर उगता है, जो धीरे-धीरे जागते हैं, पानी को ऊपर खींचते हैं और उसे घरों में, रसोइयों में और स्कूल जाते बच्चों के हाथों तक पहुँचाते हैं। तकनीक सरल है। बदलाव उतना नहीं।
यहाँ जो बनाया गया है, वह किसी एक योजना या आँकड़े से कहीं आगे जाएगा। यह समुदायों और उनके भविष्य के बीच एक नया भरोसा है, सिर्फ सूरज की रोशनी से नहीं, बल्कि इस यकीन से कि साफ और सुरक्षित पेयजल की आपूर्ति और उसके साथ आने वाली गरिमा सबकी है।
बच्चों के लिए इसका मतलब है स्वस्थ जीवन, स्कूल में ज़्यादा वक्त और ऐसे गाँव में बड़े होने का मौका जहाँ साफ पानी मिलेगा या नहीं? यह सवाल अब उनके मन में नहीं उठता।
पानी अनमोल है, और साफ़ व सुरक्षित पीने का पानी हर बच्चे का हक़ है।
[1] ‘जल वाहिनी’ (वॉटर सिस्टर) गांव की पांच महिलाओं का एक समूह है, जो जल योद्धा के रूप में काम करते हुए गांवों में पेयजल सेवाओं के बेहतर प्रबंधन और निगरानी की जिम्मेदारी संभालती हैं। छत्तीसगढ़ सरकार ने 22 अप्रैल 2022 को इस पहल की शुरुआत की थी और बाद में इसे राज्य के सभी जिलों में लागू किया गया। यूनिसेफ ने जल जीवन मिशन (JJM) छत्तीसगढ़ के साथ मिलकर ‘जल वाहिनी’ की अवधारणा तैयार करने, इसके शुभारंभ, विस्तार और राज्य के सभी जिलों में महिलाओं के क्षमता विकास में महत्वपूर्ण सहयोग दिया।