गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा

सभी लड़के और लड़कियों के लिए श्रेणीबद्ध शिक्षा

7 year old Laxmi (left) with her best friend and classmate Swapna (right), at Government Secondary School in Chitri Block, Dungarpur District, Rajhastan. They love coming to school as they get to spend time with one another.
UNICEF/UN0271971/Hajra

शिक्षा की खराब गुणवत्‍ता से भारत में शिक्षा के खराब परिणाम आ रहे हैं, जिससे आखिरकार बच्चों का  शिक्षा से मोह भंग हो जाता है और उनके बाल श्रमिक बनने, शोषण और हिंसा का शिकार होने की संभावनाएं बढ़ती हैं। अनेक कक्षाएं अब भी अध्‍यापक केन्द्रित हैं - जिनमें बच्‍चों को रटाना, शारीरिक दण्‍ड देना और उनके साथ भेदभाव होना आम बात है।

शिक्षा के मूल्‍यांकन दर्शाते हैं कि स्‍कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्‍चों में पढ़ने-लिखने और गणना का बुनियादी कौशल नहीं है अथवा वे शिक्षा का अधिकार अधिनियम में निर्धारित सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी ज्ञान और कौशल नहीं सीख रहे हैं।

बच्‍चों की पढ़ाई के अनुकूल ऐसा वातावरण बनाने के लिए बहुत सारे बदलाव किये जाने की जरूरत है। जहां सभी बच्‍चे लैंगिक-संवेदी और समावेशी कक्षाओं के साथ-साथ पानी, स्वच्‍छता और सफाई, और मिड-डे-मिल में अच्छ व पूरक आहार सुविधाओं से लाभान्वित हों सके।

भारत में हर लड़की और लड़के को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा पाने का मौलिक अधिकार है -ऐसी शिक्षा जो बुनियादी पढ़ाई-लिखाई और गणना कौशल अर्जित करने में उनकी मदद करे चाहे वह किसी भी जगह या परिवेश से आए हों, बिना भय और भेदभाव के हर बच्चे को सीखने में आंनद व स्वयं को खास होने महसूस करते हुए पढ़ाई की इस प्रक्रिया में शामिल होने का मौका मिले।       

10 वर्षों में पहली बार सरकारी स्कूलों में शुरुआती ग्रेड (एएसईआर 2016) में पढ़ने और अंकगणित के अंकों में सुधार हुआ है। सात राज्यों (छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, तेलंगाना और उत्तराखंड) में 2014 के बाद से तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों के स्तर में 7% प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह दर्शाता है कि बच्चों के सीखने में प्रोग्रेस हो सकती है, लेकिन इसमें समय लगेगा।

फिर भी, एएसईआर 2018 से पता चला कि चार साल की पढ़ाई के बाद भी पांचवीं कक्षा में महज आधे बच्चे ही दूसरी कक्षा का पाठ बिना किसी रूकावट के पढ़ पा रहे हैं। कक्षा तीसरी, पांचवीं और आठवीं के लिए के बच्चों के लिए आयोजित (एनएएस) नेशनल अचीवमेंट सर्वे 2017 के अनुसार, केवल 45.2% छात्रों ने ही राष्ट्रीय स्तर पर सभी विषयों और कक्षाओं में टारगेट परफॉरमेंस लेवल हासिल किया।

अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अल्पसंख्यक समुदायों के बच्चों की बड़ी आबादी वाले राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, ओडिशा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में सबसे कम स्कोर हैं। एनएएस 2017 में लड़कियों ने लड़कों की तुलना में ज्यादा अंक प्राप्त किये।

जबकि राष्ट्रीय व राज्यों सरकारों ने बड़े पैमाने पर शिक्षा पर निवेश किया है। इससे कहा जा सकता है कि चुनौती शिक्षा में सुधार में मूल्यांकन डेटा के उपयोग में है ना कि इसे एक सिंपल डेटा कलेक्शन एक्सरसाइज बनाये रखने में।

स्कूलों में अच्छे प्रदर्शन के लिए पारंपरिक तरीकों और गणना के कौशल के अलावा भी उनकी क्षमता, नजरिये और सामाजिक-भावनात्मक रूप से बच्चों को सबल बनाया जाना जरूरी है। इससे न सिर्फ बच्चे कौशल निपुण होंगे बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा भी ले सकेंगे

शिक्षा जीवन कौशल के बारे में सीखाती है, लेकिन फिर भी हमें समझना होगा कि पारंपरिक शिक्षा और जीवन कौशल सीखने के बीच व्यवस्था की कमी है। इस समझ को शिक्षा के माध्यम से ही विकसित किया जा सकता है। एनईपी इसी बात पर केंद्रित होकर काम करती है।

मार्च 2020 में कोविड-19 की वजह से जब लॉकडाउन में स्कूल बंद हुए तो शिक्षा को ऑफलाइन मोड से ऑनलाइन मोड में कर दिया गया। इसका असर पूरी शिक्षा प्रणाली पर पड़ा। क्योंकि जो लोग ऑनलाइन शिक्षा का उपयोग कर सकते थे, वह जुड़े रहे। लेकिन कितने ही बच्चे ऐसे थे जिनके अभिभावक सामाजिक व आर्थिक परेशानियों के चलते अपने बच्चों को ऑनलाइन कक्षाओं में समायोजित नहीं कर सके। हालांकि इसके बावजूद स्कूल खुलने पर नामांकन या बच्चों के सीखने पर इसका ज्यादा असर नहीं पड़ा।

वर्ल्ड बैंक के अनुसार कोविड-19 के कारण पांच महीने तक स्कूल बंद रहने से शिक्षा की गुणवत्ता में 0.6% का नुकसान हुआ। इससे एक छात्र जो शिक्षा 7.9 साल में प्राप्त कर सकता था व घटकर 7.3 साल रह गई।

हालांकि इस दौरान बच्चों ने घर पर रहकर ही ऑनलाइन शिक्षा प्राप्त की और सरकार ने इस निरंतरता को बनाये रखने के लिए अनेकों प्रयास किये। इंटरनेट पर शिक्षा घर-घर पहुंचाने के लिए अच्छे उपकरणों का उपयोग करना, ऐप्स, ऑनलाइन क्लासेस, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, टेलीविजन, रेडियो सहित सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग बड़े पैमाने पर किया गया था।

भारत अब ऐसे समाधानों पर विचार कर रहा है जो शिक्षा को बच्चों तक ऑनलाइन-ऑफलाइन दोनों मोड में तेजी से पहुंच बना सके। इससे बच्चों व किशोरों को एजुकेशन के साथ-साथ लाइफ स्किल सीखने का भी मौका मिलेगा।

कोविड-19 एक आपदा के साथ-साथ बच्चों के लिए अवसर की तरह भी रही है। इस दौरान बच्चों को एजुकेशन सिस्टम के ऑफलाइन से ऑनलाइन मोड पर आने से टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने का मौका मिला। हालांकि, टेक्नोलॉजी कोई सिल्वर बुलैट तो नहीं है जो बच्चों में सीखने की समझ को बढ़ा सके। लेकिन ऑनलाइन एजुकेशन सिस्टम ने भारत में शिक्षण और सीखने के तरीके को बहुत हद तक बदलने में अहम रोल निभाया है। इसने न सिर्फ बच्चों बल्कि आगे की कतार में खड़े शिक्षकों, कार्यकर्ताओं को भी सशक्त बनाया है और इससे किशोरों तक पहुंचने वाली शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ी है।

फिलहाल भारत में 2.6 मिलियन माध्यमिक विद्यालयों में आईसीटी लैब और कंप्यूटर हैं। हालांकि हशिये पर रहने वाले समूदायों, जनजातीय, ग्रामीण क्षेत्रों व दिव्यांग बच्चों के घरों तक टेक्नोलॉजी पहुंचना अभी तक सपना ही है। कोविड-19 के दौरान इन्हीं बच्चों को शिक्षा के लिए चुनौतियों का सामना करना पड़ा। देश के हर राज्य, शहर, गली-घर में अभी इंटरनेट की पहुंच नहीं हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां 13% लोग ही इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, वहीं शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 37% तक है।

इसके अलावा हशिये पर रहने वाले समुदायों व गरीब छात्रों के पास अभी तक स्मार्ट फोन नहीं हैं, जिनके पास फोन उपलब्ध हैं, वहां इटरनेट कनेक्टिविटी खराब है। ऐसे में यह समुदाय अभी तक डिजिटल टेक्नोलॉजी की पहुंच से दूर है।

यूनिसेफ ने राज्यों सरकार के साथ मिलकर ऑनलाइन शिक्षा के ऑप्शनों पर काम किया और आरंभिक शिक्षा के साथ-साथ माध्यमिक शिक्षा तक बच्चों की पहुंच सुनिश्चित की।
सभी लड़कियां और लड़के सीख सकें, इसीलिए यूनिसेफ समान और अच्‍छी गुणवत्‍ता के बचपन और क्रम-अनुकूल शिक्षण परिणामों सहित प्राथमिक शिक्षा को महत्व देता है। शिक्षा प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए यूनिसेफ ने सहयोगी पर्यवेक्षण (सर्पोटिवसुपरविज़न) के लिए मूल्‍यांकन डेटा का इस्‍तेमाल करने हेतु शिक्षकों की क्षमता को सुदृढ़ किया।

इसके अलावा, अपर प्राइमरी ग्रेडों में शिक्षण परिणामों में सुधार लाने के लिए सुधारात्‍मक कार्यक्रम विकसित करने हेतु सहायता दी गई। तेलंगाना और कर्नाटक में, शिक्षण सामग्री का डिजिटलीकरण और ऑनलाइन टीचर फीडबैक सिस्‍टम की स्‍थापना ऐसी नवीन पहलें हैं जिन्‍हें शिक्षण स्‍तरों में असमानताएँ दूर करने के लिए मदद दी गई थी। हालांकि यह भी सच है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए शिक्षकों व शिक्षण की ही आवश्यकता होती है।

नई शिक्षा नीति लागू होने के बाद यूनिसेफ राष्ट्रीय व राज्य सरकारों के साथ मिलकर पाठ्यक्रम संशोधन, मूल्यांकन, रिपोर्ट, मूलभूत शिक्षा व जीवन कौशल, करियर मार्गदर्शन के लिए तकनीकी सहायता करता है।