सहेली कक्ष: सुरक्षा, सुकून और सम्मान की जगह

कृतिका और बिहार की कई लड़कियों के लिए ‘सहेली कक्ष’ मासिक धर्म के दौरान आराम, मदद और सम्मान की सुरक्षित जगह है।

By Idhries Ahmad, Communication Specialist, UNICEF
Kritika Kumari
UNICEF
03 दिसम्बर 2025

यूनिसेफ में हम हमेशा मानते हैं कि सही मार्गदर्शन और समर्थन मिलने पर बच्चे बदलाव लाने की बड़ी ताकत बन सकते हैं।

इसका सबसे अच्छा उदाहरण है 14 साल की कृतिका कुमारी — पूर्वी भारत के बिहार राज्य के पूर्णिया जिले के आदर्श रमनंद मध्य विद्यालय में पढ़ने वाली एक चंचल, समझदार लड़की। उसने अपने गांव में एक ऐसे विषय पर लोगों की सोच बदली है, जिसे भारत में आज भी धीरे-धीरे और बंद कमरों में बात की जाती है — मासिक धर्म।

मैंने जब पहली बार कृतिका से उसके क्लासरूम के बाहर बात की, वह 8वीं पास कर चुकी थी और आगे की पढ़ाई के लिए एक नए, दूर के स्कूल में जाने की तैयारी कर रही थी।

वह उत्साह और चिंता — दोनों महसूस कर रही थी। नए स्कूल में जाना, नए दोस्त, नए शिक्षक — यह सोचकर उसकी आंखें चमक उठती थीं। लेकिन एक डर भी था। यह डर सहपाठियों को छोड़ने का नहीं था — क्योंकि वे भी उसी स्कूल में जाने वाले थे — बल्कि उस एक खास चीज़ को छोड़ने का, जिसे वह शब्दों में नहीं कह पा रही थी।

कृतिका बताती हैं, "यह स्कूल मुझे सुरक्षा देता है. मैं यहाँ सुरक्षित महसूस करती हूँ. ऐसी सुरक्षा का अहसास नए स्कूल में नहीं होगा।"

Saheli Kaksh
UNICEF A teacher with a student inside Saheli Kaksh in Adarsh Ramanand Middle School, Ramanand school in eastern Indian state of Bihar. Saheli Kakshs are equipped with a sanitary pad vending machine, a friendly teacher, an incinerator, a bed for rest, and spare uniforms. It offers comfort and dignity during menstruation. A supportive teacher teaches them that menstruation isn’t something to be embarrassed about but something to celebrate.

मेरे जैसे एक पुरुष, एक अनजान व्यक्ति की मौजूदगी ने उसके लिए खुलकर बात करना और मुश्किल बना दिया था। लेकिन थोड़ी हल्की-फुल्की बातों और उसकी दोस्तों के प्रोत्साहन से बातचीत आगे बढ़ी।

और फिर वह साफ-साफ बोली — “नए स्कूल में ‘सहेली कक्ष’ नहीं है। वह कमरा, जो हमें पीरियड्स के दौरान आराम और सुरक्षा देता है।”

वो अपनी सहेलियों से कहती है, "शायद मुझे यह स्वीकार करना होगा कि मेरे नए स्कूल में सहेली कक्ष नहीं है। वहाँ कोई मुझे भरोसा देने वाले नहीं होंगे, सुरक्षा का अहसास नहीं होगा, किसी को मेरी परवाह नहीं होगी। काश! मैं हमेशा के लिए यहाँ रह पाती, लेकिन मुझे जाना तो पड़ेगा ही। यही जीवन है!"

कृतिका के स्कूल में सहेली कक्ष एक सुरक्षित, सम्मानजनक स्थान है। इस कमरे में सैनिटरी पैड वेंडिंग मशीन, एक सहयोगी शिक्षिका, इस्तेमाल किए पैड जलाने के लिए इन्सीनरेटर, आराम के लिए बिस्तर और अतिरिक्त यूनिफॉर्म हैं। यह लड़कियों को मासिक धर्म के दौरान आराम, सम्मान और आत्मविश्वास देता है। यहां की शिक्षिका उन्हें बताती हैं कि पीरियड्स कोई गंदी या शर्म की बात नहीं, बल्कि एक सामान्य और प्राकृतिक प्रक्रिया है।

“हमें घर और गांव में जो बताया गया था, वह सब गलत है। हम पूजा-घर में जा सकते हैं, अचार छू सकते हैं, और अपने रोज़मर्रा के काम कर सकते हैं,” कृतिका कहती है।

Embedded video follows
UNICEF Saheli Kaksh: Safe spaces of comfort, safety, and dignity

बिहार स्वच्छ विद्यालय पुरस्कार — बदलाव की बड़ी शुरुआत

कृतिका का आत्मविश्वास स्कूल में हुए बड़े बदलावों से भी आता है, जो बिहार स्वच्छ विद्यालय पुरस्कार (BSVP) का हिस्सा हैं। यह सिर्फ एक पुरस्कार नहीं, बल्कि एक आंदोलन है, जिसमें 60,000 से ज्यादा स्कूलों को साफ पानी, शौचालय, हाथ धोने की सुविधा और सहेली कक्ष जैसे सुरक्षित स्थानों के आधार पर आंका गया। यूनिसेफ की मदद से बिहार शिक्षा विभाग ने यह पूरा मॉडल तैयार किया।

यूनिसेफ बिहार के (WASH) वॉश अधिकारी सुधाकर रेड्डी ने बताया कि, “यूनिसेफ ने बिहार स्वच्छ विद्यालय पुरस्कार की रूपरेखा बनाने में मदद की है और बिहार शिक्षा परियोजना परिषद के साथ मिलकर इसकी पूरी प्रक्रिया लागू करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।”

पूर्णिया और अररिया के 50 स्कूलों में सहेली कक्ष का पायलट शुरू किया गया था, और कृतिका का स्कूल उन 54 विजेता स्कूलों में से एक है।

स्कूल में पहले सिर्फ एक लड़कियों का शौचालय था — अब आठ हैं। लड़कों के लिए 17 यूरिनल और कई हैंडवॉश स्टेशन बनाए गए हैं। हर कक्षा के बाहर पानी के ड्रम रखे गए हैं।

कृतिका का सहपाठी हिरादन मुस्कुराते हुए कहता है, “पहले सिर्फ एक शौचालय था। अब इतने सारे हैं — हमें अपने स्कूल पर गर्व है।”

Sita Devi
UNICEF Kritika’s mother, Sita Devi,in her village in Eastern Indian state of Bihar. A changemaker herself and a respected person in her community, Sita Devi has amplified the messages around Menstruation that Kritika has brought from school.

बदलाव अब गांव तक पहुंच चुका है

कृतिका और उसकी सहेलियाँ स्कूल में सीखी बातों को गांव की महिलाओं और लड़कियों तक भी ले गई हैं। पहले जहां महिलाएँ पुराने, गंदे कपड़े इस्तेमाल करती थीं और पीरियड्स पर बात करने से कतराती थीं, अब वे सैनिटरी पैड का इस्तेमाल कर रही हैं और खुलकर बात भी कर रही हैं।

कृतिका की मां सीता देवी, जो ‘जीविका समूह’ की सदस्य हैं, कहती हैं —
“पहले कृतिका महीने में 3–4 दिन स्कूल नहीं जाती थी। अब वह हर दिन जाती है। सहेली कक्ष ने हमारी बेटियों को हिम्मत दी है।” अब गांव के पुरुष और लड़के भी इस विषय पर सहजता से बात करते हैं।

"पहले कृतिका महीने में तीन-चार दिन स्कूल नहीं जा पाती थी। अब वो हर दिन जाती है, सहेली कक्ष एक वरदान की तरह है। लड़कियाँ अब इन मुद्दों के बारे में बिना शर्म, खुलकर बात करती हैं।"

सीता, कृतिका और जीविका समूह ने मासिक धर्म पर होने वाली बातचीत में पुरुषों को भी शामिल किया है।

कृतिका कहती है, “सिर्फ चार–पांच साल पहले, गाँव के लोग पुराने विचारों से बंधे थे और शर्म की वजह से मासिक धर्म पर खुलकर बात नहीं करते थे—यहाँ तक कि अपने पति या परिवार के लोगों से भी नहीं। लेकिन अब लोग खुलकर बात करते हैं।”

कृतिका की माँ, अपनी बेटी के पास खड़ी होकर बताती हैं कि, “पहले मर्द लोग हमारे लिए सेनेटरी पैड खरीदने में हिचकिचाते थे; और अगर खरीदते भी थे, तो उन्हें अखबार में छिपाकर लाते थे। अब वह झिझक ख़त्म हो गई है। वे खुले तौर पर पैड खरीदते हैं और गाँव के पुरुष और लड़के भी इस विषय को समझते हैं और इस पर बात करने में सहज महसूस करते हैं।”

जब मैं स्कूल से निकला, तो मैंने कृतिका और उसकी सहेलियों को ‘सहेली कक्ष’ के पास खड़ा देखा—शायद आखिरी बार उसे महसूस करने के लिए।

मैंने स्कूल से निकलते हुए देखा कि कृतिका ने सहेली कक्ष के पास एक बार फिर से रुककर फुसफुसाते हुए कहा, “मेरा सपना है कि हर स्कूल में सहेली कक्ष हो… ताकि हर लड़की उन खास दिनों में सुरक्षित महसूस करे।”

मैं भी यही चाहता हूं। काश, हर लड़की को वह सुकून, सुरक्षा और सम्मान मिले, जिसे कृतिका ‘सहेली कक्ष का जादू’ कहती है।

#PeriodDignity #SafeSpacesForGirls”

ब्लॉग के बारे में

यूनिसेफ अपने हर काम में प्रत्येक बच्चे के अधिकारों और कल्याण को बढ़ावा देता है। अपने साझेदारों के साथ मिलकर, यूनिसेफ बच्चों के अधिकारों और सुरक्षित बचपन को व्यावहारिकता में बदलने के लिए 190 देशों और क्षेत्रों में काम कर रहा है।

यूनिसेफ इंडिया के और इसके कामों के बारे में अधिक जानकारी के लिए https://www.unicef.org/india/hi पर विजिट करें।

आप हमें ट्विटरफेसबुकइंस्टाग्राम, लिंक्डइन, यूट्यूब और गूगल प्लस पर फॉलो कर सकते हैं।

हमारे काम का अन्वेषण करें