रांची, झारखंड | आज झारखंड की अपनी यात्रा के पहले दिन, मैंने यूनिसेफ़ रांची कार्यालय में युवा पत्रकारों के एक समूह से मुलाकात की। इनके साथ चार युवा नेता भी थे, जो यूनिसेफ़ के चाइल्ड रिपोर्टर्स प्रोग्राम का हिस्सा हैं।
सालों से यह कार्यक्रम झारखंड के हज़ारों बच्चों को पत्रकारिता का प्रशिक्षण देता आया है। खासकर राज्य की विविध आदिवासी आबादी के बच्चों को, जिनकी हिस्सेदारी 26% है।
पत्रकारिता के इस व्यावहारिक प्रशिक्षण की बदौलत इन बच्चों की ज़िंदगी में बड़ा बदलाव लाया है। उन्होंने अपने आस-पास की असमानताओं को पहचानना सीखा, समुदायों से संवाद किया, और शिक्षा, बाल विवाह, स्वास्थ्य, पोषण और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर आवाज़ उठाई—अपने लिए भी, और अपने साथियों और यहां तक की समुदाय के लिए भी।
मेरी बातचीत BIT मेसरा स्कूल की छात्रा और अपनी कक्षा में अव्वल आने वाली 14 वर्षीय बाल संवाददाता ऋचा से हुई। जब उसने अपनी कहानी सुनाई, वह कहानी मेरे मन में बस गई।
जब मैं स्कूल से भूखी-प्यासी घर आती तो मेरी माँ हर रोज़ मुझे कहती... ‘रुको ऋचा, पहले तुम्हारे भाई खाएंगे।’ मैं भूखे पेट उन्हें खाते देखती रहती। मैं पूछना चाहती थी आखिर क्यों? क्यों मुझे हमेशा सबसे आख़िर में और सबसे कम खाना मिलता है? लेकिन मैं कभी पूछ नहीं पाती थी… और फिर एक दिन मैंने पूछ ही लिया।
चाइल्ड रिपोर्टर्स प्रोग्राम से जुड़ने के बाद ऋचा की सोच बदलने लगी। उसने बाल अधिकार, पोषण, शिक्षा, समानता और गरिमा के बारे में सीखा। उसने भेदभाव को पहचाना और उसका सामना करने का साहस मिला।
उस दिन मैं जेंडर भेदभाव पर हुए सत्र से लौटकर आई थी। माँ ने हमेशा की तरह कहा, ‘अपने भाइयों को खाना परोस दो।’
लेकिन मैं नहीं हिली। मैंने कहा... "नहीं माँ, मैं भी उनके साथ खाऊँगी। मैं भी पढ़ती हूँ, मुझे भी भूख लगती है। मुझे भी बढ़ने, सीखने और जीने के लिए खाना चाहिए।"
यह अवज्ञा नहीं थी... यह मेरा अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने का पल था। यही वो पल वह दरवाज़ा था जो ऋचा ने पहली बार खुद के लिए खोला। इससे भेदभाव खत्म नहीं हुआ, लेकिन बातचीत वहीं से शुरू हुई। पहले घर से, फिर समुदाय में, और फिर स्कूल में।
पिछले हफ्ते ऋचा ने रांची जिला प्रशासन से मुलाकात कर लड़कियों और बच्चों के मुद्दे उठाए। आज वह दूसरी लड़कियों को बोलने का हौसला देती है, बच्चों को स्कूल वापस लाने में मदद करती है और बराबरी की वकालत करती है... गुस्से से नहीं, बल्कि साफ़ उद्देश्य और दृढ़ संकल्प के साथ।
आज जिन दस बाल संवाददाताओं और चार युवा नेताओं से मैं मिली, वे आत्मविश्वासी, समझदार, स्पष्टवादी और बाल अधिकारों के प्रति गहराई से समर्पित थे। कुछ ने सीधे झारखंड के मुख्यमंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात कर बच्चों के मुद्दों को नीतिगत स्तर पर पहुँचाया है।
ऋचा की कहानी सिर्फ भूख या जेंडर की नहीं है। यह गरिमा, आवाज़ और उस बदलाव की कहानी है जो बच्चे ला सकते हैं,
जब उन्हें सीखने और नेतृत्व करने का सही मौका दिया जाए। भारत के साथ यूनिसेफ़ की 76 साल की साझेदारी बच्चों को ऐसे ही मंच और अवसर प्रदान करती रही है।
जंगलों की भूमि, प्राकृतिक सुंदरता, खनिज संपदा और विविध आदिवासी समुदायों से आने वाले ये झारखंड के युवा भारत के बदलाव की उस यात्रा की कुंजी हैं, जो हमें 2047 में 100 साल के राष्ट्र के रूप में ले जाएगी।
पिछले कई दशकों से UNICEF झारखंड की सरकार और लोगों के साथ मिलकर बच्चों के अधिकारों को बढ़ावा देने और उनकी रक्षा करने के लिए काम कर रहा है। झारखंड के साल 2000 में नया राज्य बनने से पहले और बाद में, यूनिसेफ ने 2006 में राजधानी रांची में अपना राज्य कार्यालय स्थापित किया, ताकि झारखंड में कार्यक्रमों और वकालत (advocacy) के काम को और मजबूत किया जा सके।