भविष्य में बच्चों के निरंतर आगे बढ़ने के लिए मजबूत और सतत परिणाम बनाये रखना जरूरी है, परंतु हम यह कैसे कर सकते हैं?
इसी सवाल की खोज में मैंने भारत के ह्दय में बसे मध्य प्रदेश राज्य की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान मैंने यूनिसेफ के लक्ष्य 3C (convene, converge, catalyse) अभिसरण करना, उत्प्रेरित करना और संगठित करने की झलक देखी।
क्षेत्रफल के हिसाब से भारत जहां दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश और जनसंख्या के हिसाब से पाँचवाँ सबसे बड़ा देश है। यहां हमारे सामने सबसे पहला सवाल ही यही उठता है कि शुरुआत कहाँ से की जाए? जिसका जवाब साफ है - बेशक, बच्चों से। मध्य प्रदेश की 10 लाख आबादी में 40 प्रतिशत बच्चे हैं और उन तक जल्द-से-जल्द पहुँचना ही यूनिसेफ के लिए गेम चेंजर कदम है।
मुझे मध्य प्रदेश में पहली बार 3सी में होने वाले कार्यों की झलकियां दिखाई दी। जिसमें यूनिसेफ ने अपने भागीदारों के साथ बढ़े पैमाने पर बदलाव को उत्प्रेरित किया है। राज्य के नेता बच्चों में निवेश कर रहे हैं।
सरकार का महिला और बाल विकास विभाग बच्चों तक स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा और सुरक्षा पहुंचाने वाली मज़बूत मॉडल पर कार्य करते हुए निवेश कर रहा है। सरकारी योजनाओं के जरिए सबसे कमज़ोर वर्ग पर ध्यान केंद्रित करके उन्हें जागरूक किया जाता है।
यूनिसेफ अपनी कार्य प्रणाली को दुनियाभर के अपने भागीदारों के साथ साझा करता है। महिला एवं बाल विकास के साथ हमारा काम मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री द्वारा संचालित नेतृत्व द्वारा बढ़ाया जाता है, जो बाल जीवन रक्षा को बढ़ाने वाले कार्यक्रम चलाते और संसाधन जुटाते हैं।
यहां गांधी मेडिकल कॉलेज में मैंने अपने दौरे में मदर-न्यूबॉर्न केयर यूनिट (MNCU) में दूसरे C (Converge) अभिसरण (प्रगति को) भी नजदीक से देखा। एक तरफ जहां भागीदारों, सरकार, नेताओं और निर्णय कर्ताओं के सहयोग से कार्रवाई करना जरूरी है, वहीं समय-समय पर यह देखना भी उतना ही जरूरी है कि हमारे किये गये प्रयासों से बच्चों और महिलाओं के जीवन में बदलाव आये या नहीं...!
यूनिसेफ ने एमएनसीयू के साथ मध्य प्रदेश में भारत का सफल एसएनसीयू (स्पैल आउट) से लागू किया है। इसके जरिए साबित किया है कि बच्चे की संपूर्ण परवरिश और पोषण के लिए सिर्फ मां का नहीं, बल्कि, बच्चे के पूरे परिवार का एक साथ आना कितना महत्वपूर्ण है। मध्य प्रदेश सबसे अधिक शिशु और मातृ मृत्यु दर वाले राज्यों में से एक है। यहां (एसआरएस 2022 के अनुसार शिशु मृत्यु दर 1,000 जीवित बच्चों पर 40 और आईएमआर और प्रति 100,000 जीवित बच्चों पर 159 एमएमआर है।)
मध्य प्रदेश का एमएनसीयू कार्यक्रम अभिसरण के साथ इन चुनौतियों का समाधान कर रहा है, जहाँ माँ और नवजात शिशु देखभाल इकाइयों में शिशुओं के साथ उनकी माताओं का रहना जरूरी है। इस इतनी छोटी और आसान सी लगने वाली चीज का बच्चों के स्वास्थ्य पर आश्चर्यजनक प्रभाव पड़ा है। एमएनसीयू माताओं को अपने शिशुओं के साथ रहने के लिए जगह देते हैं; और साथ ही मां के स्पर्श की शक्ति से हमें रूबरू कराते हैं। माताओं के स्पर्श और स्तनपान से ही शिशुओं को आवश्यक पोषण, सुरक्षा और ज्ञान मिलता है।
यूनिट में नई माताएं नवजात शिशुओं को अपने स्पर्श के जरिए बेहतर स्वास्थ्य की ओर लेकर जाती हैं, यह देखना अपने आप में दिल को छू लेने वाला अद्भूत पल है। केयर यूनिट की शांत गूँज में यहां उपचार और आशा पाने वाली माताओं के साथ मैंने कुछ समय बातचीत करते हुए बिताया। 22 वर्षीय रूपा प्रकाश अपनी दो सप्ताह की नवजात बेटी को अपनी छाती से लगाए हुए मानो किसी शांत शक्ति का परिचय दे रही हों, जो बिना शब्दों के भी अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है।
उसकी दिल को छूने वाली कोमल मुस्कान और स्थिर उपस्थिति ने उसके आस-पास के पोषण करने वाले माहौल को दर्शाया। उसके बगल में, एक और युवा माँ प्रिया अपने तीन सप्ताह के जुड़वां बच्चों में से एक के साथ शांति से आराम कर रही थी, जबकि उसकी भाभी दूसरे बच्चे को प्यार से झुला रही थी। वहाँ कोई हड़बड़ी नहीं थी, कोई घबराहट नहीं, अगर कुछ था तो सिर्फ देखभाल और जुड़ाव के एक सुकून देने वाले पल। केयर यूनिट न केवल चिकित्सा विशेषज्ञता से सुसज्जित है, बल्कि शांत आत्मविश्वास, करुणा के साथ परिवारों में आशा की किरण जगाती नजर आती है।
एक माँ के रूप में मैं स्वयं भी डर, घबराहट, राहत और आश्वासन की भावना को समझती हूं। इसी अहसास को संजोए ये इकाई चुपचाप, लेकिन आत्मविश्वास से हर मां के कान में फुसफुसाती है: कि उम्मीद रखो सब कुछ ठीक हो जाएगा!
यूनिसेफ की योजना 2028 तक पूरे राज्य में 25 एमएनसीयू स्थापित करने की है, जैसा कि संजीवन रोडमैप 2030 के अंतर्गत परिकल्पना की गई है - जो उत्प्रेरक साझेदारी द्वारा पूरक प्रभावी प्रोग्रामिंग के महत्व को दर्शाता है, जो सफलता को बड़े पैमाने पर ले जा सकता है।
मेरा यह दिन भोपाल की बेटी और यूनिसेफ इंडिया की यूथ एडवोकेट व एथलीट गौरांशी शर्मा से मिले बगैर तो अधूरा ही रह जाता। गौरांशी एक राष्ट्रीय बैडमिंटन चैंपियन और अंतरराष्ट्रीय स्तर की बैडमिंटन विजेता हैं, जो बच्चों प्रेरणा का प्रतीक हैं।
गौरांशी का मकसद एथलेटिक होने के साथ-साथ देश के युवाओं को एकजुट करने और उनके लिए नये अवसर खोलने की है। मैंने उनके साथ और यूनिसेफ भोपाल टीम के साथ एक रोमांचक सीड बॉल गेम में हिस्सा भी लिया। जो मेरे लिए रोमाचंक अनुभव था, मानो बचपन के दिन फिर से लौट आये हों।
गौरांशी ने बाधाओं का सामना करते हुए उन पर विजय प्राप्त की है तथा साहसपूर्वक अपनी कहानी सबके साथ साझा की है, ताकि हम सब मिलकर सभी बच्चों के लिए सपने देखने और उन्हें उनकी क्षमता तक पहुंचाने के लिए मार्ग तैयार कर सकें।
भोपाल में बिताया यह दिन मेरी यादगार स्मृतियों का हिस्सा रहेगा। मैंने देखा कि यूनिसेफ की टीम किस तरह से काम करती है। जब हम अपने भागीदारों के साथ मिलकर बच्चों के अधिकारों और उनके बेहतर भविष्य के लिए काम करते हैं तो इसके परिणाम अपने आप में सुखद होते हैं।