मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण
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माता-पिता अपने बच्चों को मानसिक रूप से मजबूत बनाने में अहम रोल अदा करते हैं। माता-पिता की पोषण और प्यार भरी देखभाल ही बच्चों के मजबूत भविष्य की नींव रखती है। जिससे आगे चलकर आपके बच्चों को खुशहाल भविष्य मिलता है।
बचपन के प्यार दुलार से बच्चों को बड़े होने पर भावनात्मक रूप से मजबूती और समाज में घुलने-मिलने अपनी पहचान बनाने में मदद मिलती है। हमारा मानसिक स्वास्थ्य ही हमारे स्वास्थ्य और खुशहाली का आधार होता है।
इस पेरेंटिंग माह में यूनिसेफ ने युवाओं और बच्चों की परवरिश को ध्यान में रखते हुए उनके मानसिक स्वास्थ्य पर बात की है। मानसिक स्वास्थ्य को दुरूस्त रखने के लिए हमारे कनेक्शन और रिश्ते अहम होते हैं। जो हमें मानसिक और भावनात्मक रूप से सुरक्षा का अहसास कराते हैं।
बच्चे का समाज में व्यवाहार, दोस्तों, रिश्तेदारों से बात करने का तरीका सभी माता-पिता की परवरिश की ओर इशारा करते हैं। या फिर इसे यह भी कह सकते हैं कि बच्चों के विकास में माता-पिता की परवरिश ही नींव का काम करती है। अगर किसी बच्चे का पालन-पोषण प्यार और सुरक्षा के बीच होता है तो बाहरी नकारात्मक चीजें उसे ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाती, क्योंकि बच्चा मानसिक रूप से मजबूत होता है।
लेकिन, वहीं यदि किसी बच्चे को अच्छा पालन-पोषण नहीं मिल पाता तो वह जल्द ही नकारात्मक चीजों की चपेट में आ जाता है। इसके लिए माता-पिता अपने टीनएज बच्चों को उनके दोस्तों के साथ घुलने-मिलने में मदद करते हैं, ताकि बच्चों को सकारात्मक व सुरक्षात्मक संबंध बनाने में मदद मिल सके।
यूनिसेफ की एक वैश्विक रिपोर्ट के लिए किए गये सर्वे में युवाओं ने बताया कि परिवार मदद करता है, लेकिन कई बार मदद मिलने में देरी, झिझक या शर्मिंदगी की वजह से वह अपनी भावनाएं किसी के सामने जाहिर नहीं कर पाते और इसके कारण उन्हें दुर्व्यवहार, उपेक्षा, प्रेशर और कंट्रोल वित्तीय अस्थिरता जैसे जोखिमों का सामना करना पड़ता है।
यह पेरेंटिंग पेज आपके और आपके बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य में सहायता के लिए टिप्स देगा, जिससे आपको अपने बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य को समझने और उसे स्पोर्ट करने में मदद मिलेगी।
इसकी शुरुआत एक पल, बच्चे के साथ बातचीत, और एक सवाल #Onyourmind से होगी।
चिंता से कैसे निपटे
बच्चों में परेशानी के लक्षण अक्सर बहुत साफ नजर आते हैं। अक्सर माता-पिता ही इसे अनदेखा कर देते हैं या फिर बच्चों की भावनाओं को दबा दिया जाता है और वह खुलकर अपनी परेशानी जाहिर नहीं कर पाते।
घर, स्कूल, खेल ग्राउंड यहां तक कि यह कहीं भी हो सकता है। बच्चों को कई बार उनके ही दोस्तों, क्लासमेट्स, टीचर्स या किसी रिश्तेदार द्वारा अलग-थलग महसूस कराया जाता है।
आइये आज से ही अपने बच्चों की परेशानी को नजरअंदाज न करने का संकल्प लें।