परवरिश
हम सभी अपने बच्चों के लिए सबसे अच्छा चाहते हैं, लेकिन माता-पिता बनना हमेशा आसान नहीं होता।
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शुरुआत से ही सकारात्मक पालन-पोषण
एक बच्चे के जीवन के शुरुआती साल, उनके बढ़ने और विकास की नींव रखते हैं। मस्तिष्क का शुरुआती विकास तय करता है कि आपका बच्चा कैसे सोचेगा, सीखेगा और व्यवहार करेगा और लंबे समय में अपने जीवन में कामयाब होने की काबिलियत तय करता है।
क्या आप जानते हैं कि जीवन के पहले 1,000 दिनों के दौरान, एक बच्चे का मस्तिष्क बहुत तेजी से विकसित होता है और हर सेकंड दस लाख से ज्यादा नए न्यूरल कनेक्शन बनते हैं।
यह समय, एक बच्चे के सीखने, बढ़ने और समाज में अपना पूरा योगदान देने की क्षमता को आकार देने का जीवन में एक-बार मिलने वाला मौका देता है। हालांकि, ये सभी जुड़ाव एक-साथ तभी आते हैं जब एक बच्चे को सही सेहत, पर्याप्त पोषण, सुरक्षा, जिम्मेदारी सहित देखभाल और जल्दी सीखने का मौका मिलता है।
न्यूरोसाइंस अब इस बात का जबरदस्त सबूत देता है कि हालांकि जीन्स मस्तिष्क के विकास के लिए ब्लूप्रिंट तैयार करते हैं, लेकिन बच्चे का वातावरण ही उसके मस्तिष्क के विकास को आकार देता है। माता-पिता को अपने बच्चों के जीवन के पहले पांच सालों में सही वातावरण को आकार देने में एक बड़ी भूमिका निभानी होती है, जब उनकी सीखने, बदलावों को अपनाने की क्षमता तय होती है और मनोवैज्ञानिक लचीलापन विकसित होता है।
शुरुआती पल क्यों जरूरी हैं, इस पर महत्वपूर्ण तथ्य:
- गर्भाधान से लेकर तीन साल तक मस्तिष्क सबसे तेजी से विकसित होता है।
- 40 सप्ताह के गर्भकाल तक एक व्यक्ति में एक सौ अरब न्यूरोन बनते हैं।
- स्टिमुलेशन के ज़रिए हर सेकंड 1000 न्यूरल कनेक्शन बनते हैं।
- जिम्मेदारी सहित रिश्ते निभाना और स्वस्थ, प्रेरक वातावरण एक पुष्ट मस्तिष्क बनाता है।
- बच्चों को तीन साल की उम्र से लिंग की समझ आने लगती है, लेकिन जन्म से (भारत में, जन्म से पहले) ही लिंग समाजीकरण का एहसास होना शुरू हो जाता है।
घर पर लालन-पालन का एक वातावरण देना
माता-पिता हर बच्चे के जीवन में सबसे जरूरी लोग होते हैं - वे पोषण, सुरक्षा, देखभाल और प्यार देते हैं।
यूनिसेफ का मानना है कि माता-पिता की जिम्मेदारी निभाना दुनिया का सबसे बड़ा काम है। माता-पिता और देखभाल करने वाले अन्य लोग सबसे पहले बच्चों को पोषण, प्रोत्साहन और सुरक्षा प्रदान करते हैं जो हर शिशु को मस्तिष्क के स्वस्थ विकास के लिए आवश्यक है।
अच्छे संबंधों की कमी, पर्याप्त ध्यान न देना और माता-पिता का अपने बच्चों के साथ न जुड़ना, ये सभी चीजें बच्चे के व्यवहारात्मक और भावनात्मक समस्याओं के बढ़ते जोखिम के साथ जुड़ा है। ये बच्चों पर लंबे-समय तक असर करता है और मस्तिष्क के विकास को भी प्रभावित करता है।
यह महत्वपूर्ण है कि माता और पिता, दोनों, बच्चों के साथ अच्छा समय बिताएं और अपने बच्चे को जीवन की एक अच्छी शुरुआत दें।
हर हग और हर किस, हर मील और हर खेल के साथ, आप अपने बच्चे को हर तरह से बढ़ने में मदद कर सकते हैं!
0-2 साल के बच्चों के लिए माता-पिता को मार्गदर्शन
उन्हें उचित पोषण दें। पहले छह महीने तक केवल मां का दूध पिलाएं।
स्पर्श का महत्व जानें। उन्हें अक्सर गले लगाएं और दुलार करें।
उनके बढ़ने पर नज़र रखें। समय पर टीका लगवाने के लिए ले जाएं।
अपने बच्चे से बातें करें। उनसे नज़रें मिलाना न भूलें और अपनी मातृभाषा में उनसे बातें करें।
उन्हें आस-पास की चीजें दिखाएं। बाहर ले जाएं और आस-पास नज़र आने वाली चीजों के नाम बताएं।
2-4 साल के बच्चों के लिए माता-पिता को मार्गदर्शन
बातें करें और सुनें। बातें करने और मन की बात बताने से बच्चों को खुलने में मदद मिलती है।
दिनचर्या। जागने का एक नियमित समय तय करें।
खेलें और मजे करें। गाना गाएं, कहानियाँ सुनाएं और थोड़ा नाच भी लें।
सीमाएं तय करें। उन्हें सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श के बारे में समझाएं।
डिजिटल मीडिया देखना सीमित करें। बच्चों के साथ बातचीत करते समय डिजिटल मीडिया न देखें।
उन्हें (पॉटी ट्रेनिंग) टॉयलेट इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग दें। टॉयलेट इस्तेमाल करने के बाद, खाने से पहले और खेलने के बाद हाथों को साबुन से धोना सिखाएं।
4-6 साल के बच्चों के लिए माता-पिता को मार्गदर्शन
सीखने की नींव रखें। करीबी प्रीस्कूल या आंगनवाड़ी केन्द्रों में उनका नाम लिखवाएं।
हिंसा से हिंसा पैदा होती है। बच्चों पर चिल्लाने के बजाय उन्हें समझाएं और उनके सामने आपसी झगड़ों को शांति से सुलझाएं।
जब भी हो सके, बाहर जाकर खेलें। बाहर खेलना रिश्तों को मजबूत बनाने का एक बेहतरीन तरीका है।
पढ़ें, बातें करें और कहानियाँ सुनाएं। उन्हें कोई कहानी बनाकर सुनाने को कहें – उनकी कहानियाँ सुनना मज़ेदार है।
बच्चों को घर के कामों में शामिल करें। उन्हें घर के सभी काम सिखाएं और लड़कों और लड़कियों के बीच सभी जिम्मेदारियों को बराबर बाँटें।