भारत को खुले में शौच से मुक्त करना

भारत को खुले में शौच मुक्त बनाए रखने की पहल

सुतराजपुर गांव की रहने वाली छह साल की सोनालिका दलबहेरा को कम उम्र से ही खेतों का इस्तेमाल करने की अस्वस्थ आदत की जगह शौचालय का उपयोग करने की स्वच्छ दिनचर्या को अपनाने की सीख दी गई है।
UNICEF/UN0267920/Latif

स्वच्छता सेवाओं की निरंतरता सुनिश्चित करना

मल के केवल एक ग्राम में लाखों वायरस, बैक्टीरिया और परजीवी सिस्ट शामिल होते हैं, और यह भारत में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में डायरिया से होने वाली लगभग 100,000 मौतों का कारण बनता है। 

बीमार बच्चे, अपने पेट की अंदरूनी सतह में बारम्बार क्षति, जिससे उनकी पोषक तत्वों को हज़म करने की शक्ति कम हो जाती है, के कारण कुपोषण से लड़ने में असहाय हो जाते हैं। 

इससे वह कुपोषण, स्टंटिंग (बोनापन) तथा समय-समय पर होने वाले संक्रमण, जैसे कि निमोनिया, का शिकार बन जाते हैं। खुले में शौच और इससे बाद में होने वाली बीमारियों के अलावा, उसके बाद होने वाली डायरिया आदि बीमारियों से एक बच्चे की शिक्षा प्राप्त करने की क्षमता को भी बहुत प्रभावित होती है। 

खराब सफ़ाई व्यवस्था राष्ट्रीय विकास को अपंग बनाकर महिलाओं और बच्चों के जीवन को भी बुरी तरह से प्रभावित करती है, जिससे मजदूरों का जीवनकाल छोटा तथा उत्पादन और कमाई कम होती है। 

भारत में खुले में शौच से रोजाना कई टन मल पर्यावरण के संपर्क में आता है, जिसके कारण बच्चों पर इसका सीधा असर होता है। नियम से हाथ न धोने और उनके घरों और समुदायों में पानी के माइक्रोबियल संदूषण से डायरिया और वॉटरबॉर्न (जलजनित) रोगों के फैलने का खतरा बढ़ जाता है।

साल 2014 से भारत सरकार ने यूनिसेफ़ की साझेदारी में खुले में शौच मुक्त लक्ष्य तक पहुँचने में उल्लेखनीय प्रगति की है। जनवरी 2020 की स्थिति के अनुसार 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 706 जिलों और 603,175 गांवों को खुले में शौच मुक्त घोषित कर दिया गया है। (स्रोत: एसबीएम डैशबोर्ड)

इन प्रभावशाली आंकड़ों के बावजूद, यह महत्वपूर्ण है कि सामाजिक और व्यवहारिक परिवर्तन संचार के दृष्टिकोण सेवाओं के संवितरण के साथ तालमेल बनाए रखें, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि शौचालय की सुविधा प्राप्त करने वाले परिवार इसका नियमित रूप से उपयोग करते रहें। 

यह आदत बचपन से ही बहुत गहरे से पैठ बनाये हुए है और इस पर चर्चा करना वर्जित माना जाता है जो कि व्यवहारिक परिवर्तन संचार को और चुनौतीपूर्ण बनाता है।

शौचालय के बारे में व्यवहार, विश्वास और मिथकों को बदलना,पूरे भारत में सभी समुदायों के बीच खुले में शौच मुक्त स्थिति सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है।

भारत ने पूरे देश में खुले में शौच को समाप्त करने में तेजी से प्रगति की है,जिसका पानी,सफाई और स्वच्छता (वॉश) में सुधार पर महत्वपूर्ण असर पड़ा है। स्वच्छ भारत मिशन(एसबीएम) ने शौचालय तक पहुँच और उनके इस्तेमाल के बारे में लाखों लोगों के व्यवहार में परिवर्तन लाने का काम किया है। 

2014 से अब तक लगभग 50 करोड़ लोगों ने खुले में शौच करना बंद कर दिया है, जो 55 करोड़ से घट कर अब 5 करोड़ हो गया है। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में चलाए गए स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) (स्वच्छ भारत अभियान) की वज़ह से यह बड़ी उपलब्धि/प्राप्ति संभव हो सकी है।

शहरों या ग्रामीण इलाकों में,खुले में शौच ऐतिहासिक रूप से सबसे गरीब नागरिकों के बीच प्रचलित रहा है, क्योंकि उनमें से कई शौचालय निर्माण का खर्च उठाने में असमर्थ हैं, या बिना शौचालय वाले किराए के घरों में रह रहे हैं। यहां तक कि जहाँ शौचालय बनाए गए हैं, वहाँ कुछ लोग अभी भी खुले में शौच करना पसंद करते हैं।

अगर आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति शौचालय बनवाने में सक्षम है,तब भी ज़्यादातर लोग अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा, स्थिति या कल्याण के लिए शौचालय का महत्व नहीं समझते हैं और इसे एक सरकारी जिम्मेदारी के रूप में देखते हैं।

भीड़-भाड़ वाले शहरी इलाकों में करीब सात प्रतिशत लोग खुले में शौच करते हैं। शहरी क्षेत्रों में खुले में शौच के कई कारण हैं,जिसमें जगह की कमी,शौचालय में निवेश करने के लिए किराएदार की अनिच्छा,और मकान मालिक द्वारा इसे प्रदान करने की अस्वीकृति आदि शामिल है।

भारत सरकार ने यूनिसेफ जैसे भागीदारों की मदद से,साल 2019 तक भारत को ’खुले में शौच मुक्त’ बनाने की दिशा में एक अभूतपूर्व प्रतिबद्धता का प्रदर्शन किया है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने और कई एस डी जी को समर्थन देने के लिए,सरकार ने वर्ष 2014 में स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत की। 

एक ओर जहां अभियान की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि सभी घरों में शौचालय निर्मित हों और उपयोग किए जाएँ, वहीं दूसरी ओर अब यह स्वच्छ पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने और मल अपशिष्ट को खेतों में बहने और फसलों को दूषित करने से रोकने पर भी केंद्रित है।

एक महत्वपूर्ण सरकारी भागीदार के रूप में यूनिसेफ 16 राज्यों के 192 जिलों को जिलेवार ओडीएफ योजनाएँ तैयार करने तथा इसके कार्यान्वयन मॉडल को विकसित करने हेतु तकनीकी सहायता प्रदान करता है।

यह जिलेवार ओडीएफ योजनाएँ शौचालय के उपयोग हेतु व्यवहार परिवर्तन संदेश को शामिल करती हैं, जिसमें शौचालय का उपयोग, सुरक्षित रूप से प्रबंधित पानी की आपूर्ति और साबुन से हाथ धोना भी शामिल है। 

महत्वपूर्ण रूप से, यूनिसेफ यह सुनिश्चित करता है कि ये मॉडल सबसे कमज़ोर समुदायों को प्राथमिकता देने हेतु एक मजबूत समानता के आयाम को अपनाएं,और आपदा प्रभावित जिलों में और नागरिक संघर्ष से प्रभावित जिलों में जोखिम सूचक हों।

यूनिसेफ निगरानी और मूल्यांकन का भी समर्थन करता है,जिसमें जल शक्ति मंत्रालय द्वारा आयोजित समयोचित निगरानी,और सूचना डैशबोर्ड को प्रमाणित करने में मदद करने हेतु तृतीय-पक्ष सत्यापन और स्थलीय -जांच आयोजित करना शामिल है।

स्वच्छता के पोषण पर प्रभाव,और पोषण के स्वच्छता पर प्रभाव को स्पष्ट करते हुए, यूनिसेफ स्वच्छ भारत मिशन और पोषण कार्यक्रमों के बीच संयुक्त कार्यक्रम-निर्माण को बढ़ावा देता है। 

यूनिसेफ पर्याप्त जल,सफाई और स्वच्छता सुविधाओं की मांग को प्रोत्साहित करता है, और जीवन रक्षक प्रथाओं जैसे कि साबुन से हाथ धोने को बढ़ावा देता है।

जाति, लैंगिक असमानता और सामाजिक बहिष्कार की गहरी उलझी प्रथाओं को चुनौती देते हुए, खुले में शौच को समाप्त करने की दिशा में नए सामाजिक मापदंड बनाने के लिए सामाजिक आंदोलनों के दोहन पर भी ध्यान केंद्रित करने के प्रयास किए गए हैं। 

एडवोकेसी द्वारा स्कूलों और प्रीस्कूलों में बड़े पैमाने पर हाथ धोने के स्थानों की स्थापना को बढ़ावा दिया गया है, जिससे रोज़ाना हाथ धोने की आदत और स्वच्छता की अच्छी आदतें सीखी जा सकें।

हमने ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों में अपने कार्यक्रम का विस्तार करना शुरू कर दिया है,जहाँ शहरी गरीबों को अक्सर स्वच्छता समीकरण से बाहर रख दिया जाता है।