शुरुआती सीख को संवारते कदम: बिहार में अग्रिम पंक्ति के कर्मी बच्चों के शुरुआती विकास को बढ़ावा दे रह

आज सिर्फ वाजेदा और पिंकी ही नहीं, बल्कि कुल 650 फ्रंटलाइन कर्मियों और 40 पर्यवेक्षकों को प्रशिक्षित किया गया है, जो घर-घर जाकर समेकित ECD सेवाएँ देकर करीब 10,000 बच्चों तक पहुँच रहे हैं

UNICEF
After receiving his vaccination, Tejas is gently handed over by Khushbu to his father, Sanjeev, as the family prepares to head home.
UNICEF/UNI782130/Jariwala
08 दिसम्बर 2025

पूर्णिया, भारत – बिहार के पुरनिया जिले के बैसी ब्लॉक का डंगराहा घाट गाँव में 18 महीने की सुहाना परवीन अब अपने पिता के साथ खेलते हुए दिन बिताती है। अपने चचेरे भाई आमिर और अलमिश के साथ पानी में छींटे मारते हुए, मिट्टी की गोलियाँ बनाते हुए सुहाना खिलखिलाते हुए हंस रही है।

कुछ महीने पहले तक ऐसा कुछ देखना दुर्लभ था। क्योंकि आमतौर पर लोग समझते हैं कि बच्चे सिर्फ प्लास्टिक के खिलौनों या कपड़े की गुड़िया से ही खेल सकते हैं। उन्हें यह नहीं पता होता कि घर की मामूली लगने वाली चीज़ें भी बच्चों की खेलने और विकास में मददगार होती हैं। इसके अलावा परिवार के साथ खेल-खेल में होने वाली बातचीत बच्चे के समग्र विकास में बहुत ज़्यादा मददगार होती है।

यह बदलाव अचानक नहीं आया। पहले, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता वाजेदा तबस्सुम और आशा कार्यकर्ता पिंकी कुमारी अपनी-अपनी जिम्मेदारियाँ निभा रही थीं, लेकिन सीमित दायरे में। पिंकी जहां HBNC और HBYC के तहत घर-घर जाकर नवजात शिशुओं में ख़तरे के संकेतों की पहचान, सही खानपान और हाथ धोने के महत्व पर ध्यान देती थीं।

वहीं वाजेदा बच्चों के वज़न और वृद्धि की निगरानी, स्तनपान और पूरक आहार पर परामर्श देती थीं।
लेकिन न तो वाजेदा और न ही पिंकी बच्चे के सामाजिक, भावनात्मक और बौद्धिक विकास जैसे बड़बड़ाना, स्पर्श पर प्रतिक्रिया देना या इंटरैक्टिव खेलों में भाग लेना जैसी विकासात्मक उपलब्धियों की सक्रिय रूप से जाँच करती थीं। ।

इसके अलावा, बच्चों की देखभाल में पिता, दादा-दादी और भाई-बहनों की भागीदारी भी लगभग न के बराबर ही थी।

सितंबर 2024 में यूनिसेफ के सहयोग से हुए तीन दिवसीय आरंभिक बाल विकास (ECD) प्रशिक्षण ने वाजेदा तबस्सुम और पिंकी कुमारी को जीवन के शुरुआती वर्षों में मस्तिष्क विकास के महत्व से परिचित कराया गया।

इंटरैक्टिव सत्रों, व्यावहारिक प्रदर्शनों और संयुक्त गृह-भ्रमण अभ्यासों के माध्यम से उन्होंने यह सीखा कि परिवारों के साथ अपनी रोज़मर्रा की बातचीत में खेल-आधारित गतिविधियों को कैसे शामिल किया जाए।

इस प्रशिक्षण में उन्हें मदर एंड चाइल्ड प्रोटेक्शन (MCP) कार्ड का उपयोग कर बच्चों के विकासात्मक माइलस्टोन की निगरानी करना, स्पर्श, बातचीत और खेल जैसी गतिविधियों को बढ़ावा देना, और ऐसी समावेशी देखभाल को प्रोत्साहित करना सिखाया गया, जिसमें पिता, माँ और दादा-दादी सभी सक्रिय रूप से शामिल हों।

प्रशिक्षण के दौरान उन्हें ऐसे बच्चों को पहचानने और सहयोग देने के कौशल भी सिखाए गए, जिनमें विकास में देरी या किसी प्रकार की विकलांगता के शुरुआती संकेत दिखाई देते हों।

The Model Immunization Centre team at Pal UCHC pictured with the UNICEF Gujarat team.
UNICEF/UNI782035/Jariwala The Model Immunization Centre team at Pal UCHC pictured with the UNICEF Gujarat team.

गाँव लौटने के बाद वाजेदा और पिंकी ने साएकसाथ मिलकर गांवों का दौरा करना शुरू किया। जहाँ वे खेल और देखभाल के बारे में एक जैसा ही संदेश देती। शुरुआत में परिवारों ने समय की कमी और समझ न आने का बोलकर उनका विरोध किया।

लेकिन लगातार समझाने, प्रदर्शन, और नवचेतना पुस्तक से मिलते उदाहरणों ने धीरे-धीरे परिवारों का नजरिया बदल दिया। अब माता-पिता और दादा-दादी अपने बच्चों के साथ अधिक सक्रिय रूप से जुड़ने के लिए तैयार हैं।

वाजेदा और पिंकी ने परिवारों को नवचेतना एक्टिविटी बुक के माध्यम से समझाया कि सरल गतिविधियों — जैसे बर्तन, पानी, मिट्टी और कपड़े का उपयोग कर बच्चों के साथ खेलें। परिवारों को समझाया कि बच्चों को संसाधन नहीं बस माता-पिता की भागीदारी चाहिए होती है। उन्होंने माता-पिता को यह भी सिखाया कि विकास में देरी या किसी विकलांगता के शुरुआती संकेतों की पहचान कैसे की जाए, ताकि बच्चों को समय पर आवश्यक सहायता मिल सके।

धीरे-धीरे दिखने लगा असर

परिवारों में अब सकारात्मक माहौल है। सुहाना, आमिर और अलमिश जैसे बच्चे अब अधिक सक्रिय, सामाजिक अधिक खुश दिखते हैं। कई घरों का माहौल बदलने लगा है, खेलने का समय अब परिवार में रोज़मर्रा का हिस्सा बनता जा रहा है।

पिंकी कुमारी कहती हैं, “अब हमें गर्व होता है कि हम गाँवों में सिर्फ स्वस्थ ही नहीं, बल्कि खुश और समझदार बच्चे तैयार करने में मदद कर रहे हैं।”

आज वाजेदा और पिंकी अकेली नहीं हैं, बल्कि बैसी ब्लॉक में 650 फ्रंटलाइन कर्मियों और 40 पर्यवेक्षकों को प्रशिक्षित किया गया है, जो घर-घर जाकर समेकित ECD सेवाएँ प्रदान कर रहे हैं, जिससे बैसी के लगभग 10,000 बच्चों तक पहुँच संभव हो रही है।

यह प्रगति एक महत्वपूर्ण शुरुआत है, लेकिन इसे पूरे पुरनिया और अन्य जिलों तक ले जाने के लिए आवश्यक है कि ECD को नियमित रूप से सरकारी स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रमों में शामिल किया जाए।

अधिक ब्लॉकों और जिलों में प्रशिक्षण का विस्तार—खासकर व्यवहारिक और हाथों-हाथ अभ्यास यह सुनिश्चित करेगा कि सभी फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं में शुरुआती उत्तेजना और उत्तरदायी देखभाल को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक कौशल और आत्मविश्वास हो।