वे लड़कियाँ जिन्होंने एक स्कूल को सुनना सिखाया

पूर्णिया, बिहार की कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में समावेशन मदद करने का नहीं, बल्कि सुनने का नाम है

गौरी सुंदरराजन, संचार अधिकारी
Girls are learning sign language by being shown sign language videos. This is done every evening after school under the supervision of teacher Mansi Kumari. In Purnia’s KGBV Ararchi, inclusion education is taking a new shape.
UNICEF/UNI900696/Khemka
22 जनवरी 2026

अजमती खातून की दो बहनें और तीन भाई हैं। उनका घर हमेशा  बातचीत, हँसी-मज़ाक और आवाज़ों के शोर से गूंजता रहता था, लेकिन वह उन्हें नहीं  सुन सकती थी। सब कुछ उनके चारों ओर होते हुए भी, वह उसका हिस्सा नहीं बन पाती थी।

19 साल की उम्र तक अजमती ने कभी स्कूल तक देखा तक नहीं था। फिर किसी ने उन्हें एक ऐसे स्कूल के बारे में बताया, जहाँ उनके जैसी लड़कियाँ कुछ सीख सकती हैं। उसने अपना बैग पैक किया और निकल पड़ी स्कूल की ओर।

जब किसी को समझ नहीं आया कि क्या करें...

31 साल की मानसी कुमारी बिहार के पूर्णिया जिले में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में सामाजिक विज्ञान पढ़ाती हैं। जब अजमती जैसी 25 सुनने-बोलने में असमर्थ लड़कियाँ स्कूल पहुँचीं, तो वे ठिठक गईं।

“जो सुन नहीं सकते- बोल नहीं सकते, आखिर उन्हें हम कैसे पढ़ाएँ?”

इस सवाल का जवाब हम में से किसी के पास नहीं था।

Anushka Kumari, an 11-year-old class 6 student in a grey tunic, is in her classroom at KGBV Ararchi in Purnia. Thanks to UNICEF and the District Education Office's efforts under Samagra Shiksha, teachers and students are learning Indian Sign Language for better communication.
UNICEF/UNI900677/Khemka Anushka Kumari, an 11-year-old class 6 student in a grey tunic, is in her classroom at KGBV Ararchi in Purnia. Thanks to UNICEF and the District Education Office's efforts under Samagra Shiksha, teachers and students are learning Indian Sign Language for better communication.

ये लड़कियाँ दूसरे छात्रों के साथ सामान्य कक्षाओं में ही बैठती, उन्हें शिक्षक दूसरे विद्यार्थियों के साथ किताबी पाठ्यक्रम ही पढ़ाते। लेकिन, उन्हें कुछ समझ नहीं आता। वे न कुछ बोलती-न सुनती, बस क्लास में चुपचाप बैठी रहती मानो वे सबके लिए मौजूद होकर भी वहां नहीं थी।

समग्र शिक्षा, पूर्णिया के जिला कार्यक्रम पदाधिकारी कौशल कुमार जब इन लड़कियों से मिले तो उन्हें अहसास हुआ कि उनका सीखने का स्तर बहुत कम है। “वे कक्षा में बैठती तो हैं, शिक्षक पढ़ाते भी हैं, लेकिन ये लड़कियाँ न सुन सकती हैं, और न ही बोल सकती हैं।”

अक्सर ऐसे मामलों में "इन्हें पढ़ाना बहुत मुश्किल है, इनकी खास ज़रूरतें हैं, ये हमारे बस का नहीं है" आदि सब बोलकर इन खास बच्चों को कहीं ओर भेज दिया जाता। 

लेकिन कौशल ने अलग फैसला लेते हुए कहा, “अगर हम इन्हें ऐसे ही छोड़ देंगे, तो ये ज़िंदगी में आगे नहीं बढ़ पाएंगी।”

फिर अगला सवाल उठा—अब क्या करें?

एक नई भाषा सीखना

फिर एक नई योजना पर काम किया गया। स्कूल में स्मार्ट बोर्ड लगवाये गये और फैसला  लिया गया कि इन बच्चों को सांकेतिक भाषा में पढ़ाया जाएगा।

लेकिन, फिर भी समस्या वहीं की वहीं थी, क्योंकि स्कूल में किसी को भी सांकेतिक भाषा नहीं आती थी।

कौशल कहते हैं कि, “हमारे पास कोई भी ऐसा शिक्षक नहीं था जो सांकेतिक भाषा जानता हो, सबसे पहले तो शिक्षकों को ही सीखना ज़रूरी था।”

और यहीं से शुरू हुई एक बार फिर से शिक्षकों की विद्यार्थी बनने की जर्नी। यूनिसेफ और बिहार शिक्षा परियोजना परिषद के सहयोग से उत्तर प्रदेश से एक प्रोफेसर को बुलाया गया। जुलाई 2025 में आठ दिनों तक सांकेतिक भाषा सीखने के लिए शिक्षक एक बार फिर से विद्यार्थी बने।

मानसी हँसते हुए यादों को साझा करती हैं, “हम हाथों के इशारे नकल करते थे, गड़बड़ करते थे, संकेत मिला देते थे।”

विशेष शिक्षक संतोष मौर्य कहते हैं कि, “प्रशिक्षण के बाद हमें यहाँ काम करने का आत्मविश्वास मिला।”

स्कूल का माहौल अब धीरे-धीरे बदलने लगा। अब शिक्षकों ने लड़कियों को अपने तरीके से सिखाने की कोशिश छोड़कर लड़कियों के तरीके से सीखना शुरू किया

शिक्षिका अरुणा कुमारी अपने पहले दिन को याद करते हुए कहती हैं कि "उस दिन वो घबराई हुई थीं, हाथ काँप रहे थे और तभी एक छोटी बच्ची आई और उन्हें गले लगा लिया।"

उसी पल उन्हें समझ आ गया कि, “यहां बात सही संकेत बनाने की नहीं है, बल्कि इन बच्चियों के साथ मौजूद रहने की है।”

क्या बदला

पहले संतोष ब्लैकबोर्ड पर A, B, C, D और गिनती सिखाते थे। लड़कियाँ कोशिश भी करती थीं, लेकिन सब धुँधला-सा लगता था।

Teacher Santosh Mourya is taking the daily special two-hour class for the deaf girls. The group hearing aid system enables deaf girls to study with normal-hearing girls.
UNICEF/UNI900710/Khemka Teacher Santosh Mourya is taking the daily special two-hour class for the deaf girls. The group hearing aid system enables deaf girls to study with normal-hearing girls.

फिर कक्षाओं में स्मार्ट पैनल लगे, तस्वीरें, वीडियो और मूवमेंट बढ़ गईं। दीवारों पर सांकेतिक भाषा के पोस्टर लगाये गए। ग्रुप हियरिंग एड लगाए गए।

स्कूल और क्लास का पूरा माहौल बदल गया। अब यह स्कूल सभी के लिए एक “समावेशी मॉडल” बन गया। अलग कक्षाएँ नहीं, अलग स्कूल नहीं, बल्कि एक ही जगह सब बच्चे साथ-साथ, सांकेतिक भाषा के ज़रिए सीखते हुए।

 

अजमती जो कभी स्कूल नहीं गई थीं आज कहती हैं कि, “यहाँ स्मार्ट बोर्ड से मुझे समझ आया कि मुझे गणित बहुत पसंद है।”

जिस लड़की ने कभी स्कूल नहीं देखा था, उसे अब गणित पसंद है।

कुछ ही हफ्तों में जिन लड़कियों को “न पढ़ पाने वाली” समझा जा रहा था, वे परीक्षाओं में 80–90 प्रतिशत अंक लाने लगीं।

संतोष बताते हैं कि, “गणित में कई बच्चों का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा। लगभग सभी बच्चों ने सांकेतिक भाषा में भी अच्छी प्रगति दिखाई।”

कौशल कुमार कहते हैं, “कुछ बच्चों का प्रदर्शन असाधारण था। इससे साबित होता है कि अगर सही माध्यम से जानकारी दी जाए, तो ये बच्चे बहुत अच्छा सीख सकते हैं।”

फिर वह कहते हैं, “ये बच्चे मानसिक रूप से कमजोर नहीं हैं। बल्कि बहुत प्रतिभाशाली हैं।”

ये हमेशा से प्रतिभाशाली थे।

असली समावेशन
Teacher Santosh Mourya is taking the daily special two-hour class for the deaf girls. The group hearing aid system enables deaf girls to study with normal-hearing girls.
UNICEF/UNI900719/Khemka Teacher Santosh Mourya is taking the daily special two-hour class for the deaf girls. The group hearing aid system enables deaf girls to study with normal-hearing girls.

यहां सबसे खास बात यह है कि ये 25 श्रवण-दिव्यांग लड़कियाँ अलग नहीं पढ़तीं।

स्कूल में 75 और लड़कियाँ हैं, जिन्हें सुनने-बोलने में कोई समस्या नहीं है। ये सब मिलकर एक ही कक्षा में पढ़ती हैं। एक ही हॉस्टल में रहकर, एक जैसा जीवन जी रही हैं।

सुनने वाली लड़कियाँ भी अब एक स्किल के जैसे सांकेतिक भाषा सीख रही हैं।

मानसी कहती हैं, “सुनने में असमर्थ बच्चे, बाकी बच्चों के साथ ही पढ़ते, खाते और रहते हैं। उन्हें अलग-थलग नहीं किया जाता।”

Embedded video follows
UNICEF In Purnea, Bihar, three Kasturba Gandhi Balika Vidyalaya (KGBVs) are empowering speech and hearing-impaired girls in Grades 6–8 through inclusive learning.

शाम को 11 साल की नुसरत और शाहिना साथ बैठकर संकेतों का अभ्यास करती हैं।15 साल की मोनिका जब कक्षा में फलों के नाम संकेतों में बताती है, तो पूरी कक्षा उसे संकेतों में जवाब देती है।

हॉस्टल वार्डन बताती हैं कि, “अब लड़कियाँ बिना ज़रूरत भी संकेतों में बात करती हैं। कमरे के इस कोने से उस कोने तक चिल्लाने के बजाय अब वे हाथों से बातें करती हैं।”

अब बच्चे ही बच्चों को सिखा रहे हैं। वे एकसाथ सीख रहे हैं और एकसाथ आगे बढ़ रहे हैं। मानसी कहती हैं, “अगर किसी बच्ची को प्रार्थना में, निर्देश समझाने में, रोज़मर्रा की बातों में परेशानी होती है, तो दूसरी बच्चियाँ तुरंत मदद करती हैं।”

मानसी ने बताया कि, “इन बच्चों को बस सही मार्गदर्शन चाहिए। हाल ही में आयोजित हुई कला प्रतियोगिता में श्रवण-दिव्यांग लड़कियों ने पुरस्कार जीते। वे मॉडल बनाती हैं, पेंटिंग करती हैं और पुरस्कार जीतकर लाती हैं।” 

अब आगे क्या...

अब स्कूल प्रशासन के लिए सबसे बड़ा सवाल है कि — आठवीं के बाद क्या होगा??

Arvind Kumar, an Assistant Resource Person at KGBV Ararchi in Purnia, is helping implement inclusion education with UNICEF's support. Teachers and students are learning Indian Sign Language to enhance communication.
UNICEF/UNI900692/Khemka Arvind Kumar, an Assistant Resource Person at KGBV Ararchi in Purnia, is helping implement inclusion education with UNICEF's support. Teachers and students are learning Indian Sign Language to enhance communication.

कौशल कुमार कहते हैं, “कक्षा 9, 10 और 11 में अभी सांकेतिक भाषा जानने वाले शिक्षक नहीं हैं। इसलिए हमने तय किया है कि अन्य KGBV कस्तूरबा स्कूलों के शिक्षकों को लगातार प्रशिक्षण देंगे, ताकि ये लड़कियाँ आगे जाकर परेशान न हों।”

योजना बड़ी है—

• कक्षा 1 से 5 तक का पूरा पाठ्यक्रम सांकेतिक भाषा में तैयार करना
• स्मार्ट पैनल के लिए वीडियो बनाना
• हर KGBV शिक्षक को प्रशिक्षित करना
• हर ज़िले में ऐसे केंद्र खोलना

यूनिसेफ इंडिया और समग्र शिक्षा बिहार मिलकर इसे पूरे राज्य में बढ़ाने के लिए शैक्षणिक सामग्री और प्रशिक्षण ढांचे विकसित कर रहे हैं।

Purnia’s KGBV Ararchi is promoting inclusive education with UNICEF’s support. Teachers and students are learning to communicate using Indian Sign Language.
UNICEF/UNI900600/Khemka Purnia’s KGBV Ararchi is promoting inclusive education with UNICEF’s support. Teachers and students are learning to communicate using Indian Sign Language.

कौशल कुमार कहते हैं, “अगले साल हम राज्य सरकार को प्रस्ताव देंगे कि हर ज़िले में कम से कम एक ऐसा केंद्र हो।”
 

लेकिन, वह ईमानदारी से चुनौतियां भी बताते हैं, “सबसे बड़ी चुनौती कंटेंट बनाना है। इसके लिए ऐसे लोग चाहिए जो कुशल भी हों और संवेदनशील भी।”

फिर वे रुककर कहते हैं, “हम समावेशी शिक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं देते। हम मान लेते हैं कि दिव्यांग बच्चे ज़्यादा कुछ नहीं कर सकते। हम यह नहीं सोचते कि सही मौका मिले तो वे क्या कर सकते हैं।”

“हर बच्चे में कोई न कोई बुद्धिमत्ता होती है। ज़रूरत होती है उसे पहचानने की। सवाल यह है कि हम उसे पहचानते हैं या नहीं।”

खामोशी में हुआ बदलाव

जब आप उन दो विशेष घंटों में कक्षा के बाहर से (KGBV) केजीबीवी की कक्षाओं के अंदर  झाँकते हैं—तो कोई शोर या आवाज़ें नहीं आती।

लेकिन खिड़की से झाँकिए, तो पाएंगें उनके हाथ चल रहे हैं, चेहरे चमक रहे हैं, बच्चियाँ आगे झुककर ध्यान से, उत्साह से सीख रही हैं।

संतोष कहते हैं, “इन बच्चों के साथ काम करना बहुत अच्छा लगता है। उनकी भाषा, जरूरतों और दुनिया को समझना जरूरी है। यह खास एहसास देता है।”

पच्चीस लड़कियाँ, जिन्हें कभी लगा था कि उनमें कुछ कमी है, अब सीख रही हैं कि वे टूटी नहीं थीं। वे बस एक ऐसी भाषा बोलती थीं, जिसे अब तक कोई सीखना नहीं चाहता था। लेकिन, अब हम सीख रहे हैं।

अजमती से उनके भविष्य के बारे में पूछेंगे, तो उनके हाथ हवा में उड़ने लगते हैं। वह और पढ़ना चाहती हैं और शायद पढ़ाना भी चाहती हैं।

Ladli Khatoon, 18, and other girls are set to attend school at KGBV Ararchi in Purnia. With UNICEF's support and guidance from the District Education Office, teachers and students are learning Indian Sign Language for better communication.
UNICEF/UNI900661/Khemka Ladli Khatoon, 18, and other girls are set to attend school at KGBV Ararchi in Purnia. With UNICEF's support and guidance from the District Education Office, teachers and students are learning Indian Sign Language for better communication.

18 साल की लाडली कहती हैं, “सबसे अच्छी बात पढ़ाई नहीं है। सबसे अच्छी बात है ऐसे दोस्त मिलना जो मुझे समझते हैं। घर पर मैं हमेशा अकेली थी, यहाँ मुझे अपनापन महसूस होता है।”

जो शुरुआत कुछ लड़कियों की मदद से हुई थी, वह आज एक बड़े बदलाव में बदल चुकी है। पूर्णिया की तीन (KGBV)  केजीबीवी स्कूलों में आज कक्षाएँ ज़्यादा संवादात्मक हैं, शिक्षक ज़्यादा सशक्त हैं और लड़कियाँ ज़्यादा आत्मविश्वासी हैं।

उन्होंने न सिर्फ़ सीखने का रास्ता बनाया है, बल्कि मिलकर साबित किया कि समावेशन लोगों को बदलने का नहीं, व्यवस्था बदलने का नाम है। जब शिक्षा हर भाषा बोलती है, तो हर बच्चा सीखता है।

यहाँ शिक्षकों ने आँखों से सुनना सीखा तो छात्रों ने हाथों से बोलना सीखा है।

Embedded video follows
UNICEF From morning routines to sign-language learning, sports, art, and evening study — the girls at Kasturba Gandhi Balika Vidyalaya (KGBV), Purnea, Bihar are thriving every day.

पूर्णिया, बिहार के तीन कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में कक्षा 6 से 8 की लगभग 75 श्रवण-दिव्यांग किशोरियाँ मुख्यधारा के आवासीय स्कूलों में रहते हुए आज साक्षरता, गणित और सांकेतिक भाषा की मज़बूत नींव बना रही हैं। बिहार शिक्षा परियोजना परिषद, समग्र शिक्षा बिहार और यूनिसेफ इंडिया मिलकर यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि हर लड़की—चाहे वह सुन सकती हो या नहीं—सीखे, आगे बढ़े और अपने आत्मविश्वास के साथ अपने भविष्य की ओर कदम रखे।