विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाइयां(एसएनसीयू):अनमोल शिशु जीवन की सुरक्षा

एसएनसीयू बीमार नवजात शिशुओं को अति आवश्यक चिकित्सा सहायता दे कर, उनका जीवन बचा रही हैतथा अनेक परिवारों के लिए आशा की किरण है।

अज़रा परवीन रहमान
Mother taking a child to SNCU centre.
UNICEF India/Vishwanathan
19 जुलाई 2019

हम जैसे ही उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले में मीरा देवी के घर के आंगन में एक निचले, नीले रंग के दरवाजे से प्रवेश करते हैं, तो देखते है कि  दीवार पर भगवान का एक रंगीन चित्र टंगा है। एक तरफ अपने तीन माह के शिशु को बांहों में पकड़े हुए बैठी मीरा देवी बोली, "हमारे लिए एसएनसीयू (विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाई) भी भगवान के समान ही है।"

Mothers setting up the SNCU centre area.
UNICEF India/Vishwanathan

खुले आंगन में एक चारपाई पर बैठ कर तरुण अवस्था में ही पहली बार माँ बनी, मीरा देवी ने बताया कि एसएनसीयू की वजह से ही आज उसका बच्चा जिंदा है । जब सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में अमर, जिसका अर्थ है 'अनश्वर', का जन्म हुआ तो उस समय वह स्वस्थ था और उसका वज़न 2.5 किलोग्राम था।  दादा-दादी, चाचा-चाची और ताऊ-ताई के भरे-पूरे संयुक्त परिवार में खुशी के माहौल के बीच उसे घर लाया गया।

समस्यातब शुरू हुई, जब तीसरे दिन, मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता, (आशा), किरण देवी उनके घर आईं और शिशु का वज़नलिया। आशा कार्यकर्ता ने बताया, "बच्चे का वज़न कम हो गया थाऔर उसकी माँ की शिकायत थी कि वह ठीकसे स्तनपान भी नहीं कर रहा।"  चूंकि आशा कार्यकर्ता नवजात शिशु की घर पर देखभाल (एचबीएनसी) कार्यक्रम से जुड़ी हुई थीं, इसलिए वह कई बार, ख़ासकर,शुरू के छह महीनों में शिशु को केवल माँ का दूधपिलाने का महत्व और स्तनपान के सही तरीके के संबंध में बताती रही थी।

A child connected to monitoring equipment in SNCU.
UNICEF India/Vishwanathan

जब आशा कार्यकर्ता सातवें दिन दोबारा घर पर आई  तो देखा कि मीरा घबराई हुई थी।  मीरा ने बताया कि “छठे दिन से बच्चा उल्टी कर रहा था और उसे दस्त भी हो रहे थे। सातवें दिन सुबह से वह ज्यादा हिल डुल भी नहीं रहा था ”। बच्चे का वज़न भी घटकर 1.4 किलोग्राम रह गया था। आशा कार्यकर्ता ने घरवालों को सलाह दी कि वो नवजात शिशु को तुरंत जिला अस्पताल में स्थित एसएनसीयू में ले जाएं, जहां उसे भर्ती कर लियागया। बच्चा अगले10 दिनतक एसएनसीयू में अन्य बीमार नवजात शिशुओं के साथ एक छोटे से बिस्तर पर डॉक्टर और अन्य नर्सिंग स्टाफ की निगरानी में रहा, जो लगातार यह देख रहे थे कि शिशुओं के महत्वपूर्ण अंगसुचारू रूप से कार्य कर रहे हैं या नहीं।

मीरा एक अलग वार्ड में रुकी हुई थी और वो काफी चिंतित थी परंतु फिर भी वह संतुष्ट थी किउसका बच्चा सुरक्षित हाथों में है।  चूंकि बच्चादूध नहीं पी रहा था तोमीरा को अपना दूध निकालना सिखाया गया औरबाद में नर्स सुई से उस दूध को बच्चे को पिला देती थी ।

Newborn babies in SNCU centre.
UNICEF India/Vishwanathan

एसएनसीयू उन महत्वपूर्ण पहलों में से एक है जो भारत के अनेकों बच्चों के जीवन के शुरूआती हजार दिनों को सुरक्षा का कवच प्रदान कर रही है। यूनिसेफ और आईकेईए(IKEA) फाउंडेशन द्वारा समर्थित यह पहल,स्वास्थ्य, पोषणऔर वॉश (जल, स्वच्छता और स्वास्थ्य) के हस्तक्षेपों को मिलाकरएक संपूर्ण दृष्टिकोण की मांग करती है।इसका उद्देश्ययह विश्वास दिलाना है कि नवजात शिशुओं का जीवन और स्वास्थ्य, उनकी वृद्धि तथा विकास बेहतर ढंग से हो।

एसएनसीयू उत्तर प्रदेश मेंवर्ष 2008 में स्थापना से लेकर अब तक 5,00,000 शिशुओं को इसकेमाध्यम से आपातकालीन स्वास्थ्य सुविधाएं दी गई हैं। राज्य मेंकुल 78 एसएनसीयू हैं और प्रत्येक जिला अस्पताल में एक एसएनसीयू है। वर्ष 2008 में देश भर में 20 से भी कम एसएनसीयू थे। आज, भारत में 700 से अधिक एसएनसीयू हो गए हैं और इनमें प्रति वर्ष लगभग10 लाख शिशुओं का इलाज़ किया जाता है।

A newborn baby sleeping in a SNCU facility.
UNICEF India/Vishwanathan

एसएनसीयू के श्रावस्ती जिला अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. प्रदीप कुमार ने बताया,“मई महीने में हमारे पास 96 मामले आए। जब यहांएसएनसीयू शुरू किया गया था, उस समय हमारे पास एक समय में केवल चार से छह शिशु आते थे - लोग इस सुविधा और यह किस प्रकार कार्य करती है, के सम्बन्ध में जागरूक नहीं थे। बाद में हमेंउत्साहपूर्ण प्रतिक्रिया मिली और हमें आठबेड की सुविधा वाले अपने वार्ड को 12बेड वाले वार्ड में बदलना पड़ा, और अब आमतौर पर सभी बेड भरे रहते हैं।” कुछ मामले अस्पतालसे ही आ जाते हैं और कुछ दूसरे स्वास्थ्य केंद्रों से रेफर होकर तथा कुछ नवजात शिशुओं के अस्पताल से घर जाने के बाद आशा कार्यकर्ताओं द्वारा भी लाए जाते हैं।

एसएनसीयू स्टाफ का कार्य केवल नवजात शिशुओं की चिकित्सा, देखरेख तक सीमित नहीं है। नर्सों को दो दिन की विशेष ट्रेनिंग दी जाती है।वे माताओं को भी परामर्श देती हैं। डॉ. कुमार ने बताया,“यदि बच्चे का वज़न कम हो तो हम माताओं को कंगारू मदर केयर और चर्म स्पर्श के महत्व के बारे में बताते हैं। जब बच्चा दूध पी रहा हो तो माँ की निगाहें उसकी ओर होने से दूध का प्रवाह बढता है जो माँ और बच्चे, दोनों के लिए अच्छा होता है।”

A newborn baby sleeping in SNCU facility.
UNICEF India/Vishwanathan

हर एसएनसीयू के पास में एक कंगारू मदर केयर वार्ड होता है तथा शिशुओं को समय-समय पर दूध पिलाने के लिए अलगजगह बनाई गई है।  दीपक मीणा, जिला न्यायाधीश, ने बताया,“लोगों को जागरूक करना एक कठिन कार्य है। लेकिन अब हालात सुधर रहे हैं और काफी लोग एसएनसीयू और पोषण पुनर्वास केंद्र जैसी सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं। मुझे विश्वास है कि यूनिसेफ की मदद से श्रावस्ती जिले में अगले दो-तीन वर्षों में स्वास्थ्य संकेतकों में हम काफी सुधार देखेंगे। ”

मीरा के घर में, अमर अब स्वस्थ और खुश नजर आ रहा है। आशा कार्यकर्ता ने बताया कि अब उसका वज़न3.4 किलोग्राम हो गया है और वह ठीक से स्तनपान भी कर रहा है। उसने बताया,“अब तक, मैंने तीन अन्य बच्चों को एसएनसीयू में भेजा है। इस तरह की पहल, शिशुओं के जीवन को बचाने में मदद कर रही है।"