राह रोशन करती ग्रामीण महिलाएँ गढ़ रही नेतृत्व की नई परिभाषा
झारखंड में जल, स्वच्छता और हाइजीन के मोर्चे की अगुवाई कर रही हैं महिलाएँ
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झारखंड के आदिवासी ज़िले पश्चिमी सिंहभूम के गांव में जंगलों के बीच सूरज उगने से पहले ही महिलाओं के लिए रोज़मर्रा की ज़िंदगी शुरु हो जाती थीं। जब वह महुआ के घने पेड़ों के बीच भोर की ख़ामोशी को चीरते हुए एकमात्र हैंडपंप के पास कतार में खड़ी होती।
सुबह की धुंध में उनकी परछाइयों के हिलते-डुलते सायों के बीच दिखाई देते थे। हैंडपंप के लोहे की चरमराहट और फुसफुसाहटों से भरी धीमी बातचीत.... उनके सुबह की शुरुआत रोजाना ऐसे ही होती है। क्योंकि, इसी पानी से पूरे दिन उनके परिवारों का गुजारा होता है।
तेज़ गर्मियों में जब हैंडपंप सूख जाता है, तो इन महिलाओं को पानी की तलाश में दर-बदर भटकना पड़ता है। इनके लिए पानी की तलाश और भी लंबी और ख़तरनाक हो जाती। घरों में शौचालय न होने के कारण महिलाओं को खुले में शौच के लिए जंगल जाना पड़ता था, जिससे उनकी सुरक्षा और गरिमा दोनों खतरे में पड़ जाती थीं।
पश्चिमी सिंहभूम में यह लंबे समय तक रोज़मर्रा की सच्चाई यही थी। यहां पानी और स्वच्छता की पूरी ज़िम्मेदारी महिलाओं पर थी। लेकिन, परिवार के लिए फैसले लेने में उनका कोई रोल नहीं होता था, इस पर पूरी तरह से घर के मर्दो का कंट्रोल रहता था।
बदलाव की शुरुआत
यह तस्वीर तब बदलनी शुरू हो चुकी है, जब झारखंड सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए ज़मीनी स्तर पर जल सहिया प्रोग्राम शुरु किया। इस पहल ने आदिवासी महिलाओं को जल, स्वच्छता और स्वच्छता व्यवहार (WASH) के प्रयासों की अगुवाई करने का मौका दिया।
पेयजल एवं स्वच्छता विभाग और यूनिसेफ के सहयोग से आज राज्य भर में 29,000 से अधिक जल सहिया काम कर रही हैं। ये महिलाएँ सिर्फ सेवाएँ नहीं दे रहीं, बल्कि व्यवस्थाओं, सामाजिक मान्यताओं और व्यवहारों में बदलाव ला रही हैं।
सीता सरदार: बदलाव की मिसाल
इन्हीं जल सहिया में से एक हैं सीता सरदार। जो तांतनगर प्रखंड के उलिडीह गांव की एक आदिवासी महिला हैं और आज उसी गांव की मुखिया भी हैं।
एक सामुदायिक बैठक में महिलाओं से घिरी हुई सीता दीदी पूरे आत्मविश्वास और स्नेह के साथ चर्चा का नेतृत्व कर रही थीं। उनकी यात्रा तब शुरू हुई, जब वे उलिडीह की जल सहिया बनीं।
जल्द ही उन्होंने ग्राम जल एवं स्वच्छता समिति बनाई, 350 से अधिक शौचालयों के निर्माण की निगरानी की और गांव को खुले में शौच से मुक्त (ODF) घोषित कराने में अहम भूमिका निभाई।
लेकिन, सीता का काम सिर्फ़ ढाँचागत विकास तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने मासिक धर्म स्वच्छता, हाथ धोने की आदत और साफ-सफाई पर जागरूकता अभियान चलाए। शुरुआत में उनका विरोध भी हुआ, लेकिन उनकी लगातार कोशिशों से भरोसा बना और बदलाव आने लगा।
जल जीवन मिशन से नेतृत्व तक
जल जीवन मिशन की शुरुआत के साथ सीता की भूमिका और मज़बूत हुई। उन्होंने समुदाय को एकजुट किया, ग्राम कार्ययोजना तैयार कराने में मदद की और और पानी की गुणवत्ता जाँच तथा ग्रे वॉटर प्रबंधन जैसी व्यवस्थाएँ लागू कराईं।
आज उलिडीह के हर घर में पानी की भरपूर आपूर्ति है और लोग पानी की अहमियत भी समझते हैं।
साल 2022 में, अपने परिवार और समुदाय के समर्थन से, सीता ने ग्राम पंचायत चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। आज मुखिया के रूप में, वे पंचायत निधि का उपयोग स्कूलों में WASH सुविधाएँ बनाने, सैनिटरी पैड इंसिनरेटर लगाने और मासिक धर्म स्वच्छता अभियानों को आगे बढ़ाने में कर रही हैं। उनके प्रयासों से लड़कियाँ गरिमा और जागरुकता दोनों के साथ बड़ी हो रही हैं।
अदृश्य मेहनत से लेकर नेतृत्व तक सीता की कहानी एक बड़े बदलाव साक्षी है। उनकी सफलता ने दूसरी महिलाओं को भी प्रेरित किया है। बैठक में एक महिला ने कहा कि, “अगर सीता कर सकती है, तो हम क्यों नहीं?”
यह जमीनी स्तर पर बदलाव का प्रमाण है। झारखंड आज देश का एकमात्र राज्य है, जहाँ सरकार द्वारा समर्थित, संरचित महिला WASH कार्यबल मौजूद है। जो महिलाएँ कभी सिर्फ़ पानी ढोने वाली थीं, वे आज बदलाव की अगुआ बन चुकी हैं।
जिस जंगल में कभी भोर में महिलाओं के कदमों की आहट गूंजती थी, आज वहाँ नेतृत्व और उम्मीद की आवाज़ सुनाई देती है।
और सीता सरदार जैसी महिलाओं की शांत लेकिन, मज़बूत ताकत में ज़्यादा समान और सशक्त भविष्य आकार ले रहा है।
यूनिसेफ का सहयोग
आज झारखंड देश का एकमात्र राज्य है, जहाँ जल सहिया जैसी महिला फ्रंटलाइन कैडर को राज्य बजट से नियमित वित्तपोषण मिल रहा है। जो इस मॉडल को और भी मज़बूत बनाता है।
यूनिसेफ ने जल सहियाओं के लिए क्षमता-विकास योजनाएँ तैयार कीं और लगातार तकनीकी सहयोग प्रदान दिया है। यूनिसेफ की पैरवी के आधार पर झारखंड सरकार ने जल सहियाओं के लिए प्रोत्साहन व्यवस्था को मंज़ूरी दी।