भारत के युवा और जलवायु परिवर्तन

धीमी गति से बढ़ रहा जलवायु संकट — खतरे के खिलाफ जागरूकता और दृढ़ निश्चय से खड़ी हुई नई पीढ़ी

शिवांक साहा
A flood affected girl paddles a raft through flood waters in Mayong village in Mayong village in Morigaon district  July 3, 2024.
UNICEF
08 दिसम्बर 2025

जब एक अडिग समस्या एक अजेय ताकत से टकराती है, तो हमारी समय की कहानी बनती है—जलवायु परिवर्तन का धीमी लेकिन बढ़ता हुआ संकट। दशकों से दुनिया की प्रतिक्रिया में इनकार, देरी और ध्यान भटकाने की प्रवृत्ति देखी गई है। लेकिन इस संकट के केंद्र में आज एक नई पीढ़ी खड़ी है—युवा, जागरूक और अब चुप रहने को तैयार नहीं।

भारत के लिए जलवायु परिवर्तन अब कोई दूर की बात नहीं। दिल्ली और हैदराबाद की रिकॉर्ड तोड़ गर्मियाँ, महाराष्ट्र और बिहार में अनियमित बारिश से खराब होती फसलें, गिरते जल-स्तर, बाढ़ और प्रदूषण—लाखों युवाओं के लिए यह संकट बेहद व्यक्तिगत हो चुका है।

वे अब ‘पोलर बियर’ के बारे में नहीं सोच रहे। वे सांस लेने में दिक्कत, गर्मी के कारण स्कूल बंद होने, और अनिश्चित भविष्य की चिंता पर बात कर रहे हैं।

लेकिन इस पीढ़ी की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ जागरूकता नहीं—कार्यवाही है।

कोर्टरूम से लेकर क्लासरूम तक, मोहल्लों से लेकर सोशल मीडिया तक—भारतीय युवा उठ खड़े हुए हैं। उन्हें अनुमति की ज़रूरत नहीं, न ही परफेक्ट योजनाओं की। 9 साल की उम्र में रिद्धिमा पांडे ने जलवायु बदलाव पर कार्रवाई न करने के लिए भारत सरकार को कोर्ट में घेरा।

गरविता गुल्हाठी अपने "Why Waste?" अभियान के ज़रिए लाखों छात्रों को जल संरक्षण के लिए प्रेरित कर चुकी हैं। वहीं 6 साल की उम्र से लिसीप्रिया कंगुजम पर्यावरण शिक्षा और क़ानूनों के लिए आवाज़ उठा रही हैं।

ये केवल कुछ नाम नहीं, बल्कि उन जागरूक युवाओं के जीवंत उदाहरण हैं जो ना सिर्फ अपने हक के लिए आवाज उठा रहे हैं, बल्कि पर्यावरण के लिए लड़ाई भी लड़ रहे हैं।। देश भर में युवा नदियाँ साफ कर रहे हैं, पेड़ लगा रहे हैं, जलवायु आंदोलनों का नेतृत्व कर रहे हैं, याचिकाएँ दायर कर रहे हैं और सामुदायिक स्तर पर प्लेटफ़ॉर्म बना रहे हैं। वे न सिर्फ बातचीत शुरू कर रहे हैं, बल्कि लगातार उसे आगे बढ़ा भी रहे हैं।

लेकिन इस जागरूकता की उन्हें कीमत भी चुकानी पड़ी है। कई युवा भविष्य के डर से जलवायु चिंता (eco-anxiety) से जूझ रहे हैं। कुछ को अपने उपभोग पर अपराधबोध होता है। कुछ को समाज में उपहास सहना पड़ता है, तो कुछ को मानसिक स्वास्थ्य समर्थन या ब्रेक की जरूरत पड़ी क्योंकि यह बोझ भारी हो गया।

फिर भी, अधिकतर युवाओं के लिए यह चिंता ही बदलाव की आग बन जाती है।
सतत जीवनशैली अपनाने से लेकर मोहल्लों की मुहिम और कानूनी कार्रवाई तक—वे हार नहीं मानते। उन्हें पता है कि यह अस्थायी आंदोलन नहीं—यह उनकी पूरी पीढ़ी की चुनौती है।

समर्थन लगातार बढ़ रहा है। भारत सरकार के Mission LiFE में 2 करोड़ से अधिक लोगों ने पर्यावरण-अनुकूल आदतों की शपथ ली है, जिनमें बड़ी संख्या युवाओं की है। MY Bharat के ईको-क्लब अब 130 से अधिक शहरों के स्कूलों में चल रहे हैं, जहाँ छात्र स्वच्छ वायु, ऊर्जा संरक्षण और कचरा प्रबंधन जैसे मुद्दों पर स्थानीय अभियान चला रहे हैं।

लेकिन चुनौतियाँ अब भी मौजूद हैं। युवा जलवायु कार्यकर्ता अक्सर ऑनलाइन ट्रोलिंग का सामना करते हैं, उनसे राजनीतिक रूप से तटस्थ रहने का दबाव बनाया जाता है, और उन्हें पर्याप्त फंडिंग या मानसिक स्वास्थ्य सहायता नहीं मिलती। युवाओं द्वारा नेतृत्व किए जाने वाले कार्यों को मजबूत करने वाला ढांचा भी अभी विकसित हो रहा है।

फिर भी, उनका संकल्प डगमगाता नहीं। उनके लिए यह लोकप्रियता या किसी ट्रेंड का विषय नहीं, बल्कि जीवन का सवाल है।

यह पीढ़ी समझती है कि जलवायु परिवर्तन न सिर्फ उनके भविष्य को आकार देगा, बल्कि संभव है कि उनकी युवावस्था को भी छोटा कर दे। उनके लिए जलवायु आंदोलन आत्म-सुरक्षा का तरीका बन चुका है। वे सिर्फ बेहतर भविष्य की उम्मीद नहीं कर रहे—वे उसे हर दिन, अपने प्रयासों से बना रहे हैं।

अगर जलवायु परिवर्तन एक अजेय शक्ति है, तो भारत के युवा वह अडिग दीवार हैं जो इसका सामना करने के लिए तैयार खड़े है। और इसी जज़्बे, इसी प्रतिरोध में हमारी सबसे बड़ी उम्मीद छिपी है।

अगर आप एक युवा भारतीय हैं, तो आपकी आवाज़ और आपके कदम मायने रखते हैं। किसी ईको-क्लब से जुड़ें, बातचीत की शुरुआत करें, या किसी स्थानीय पहल का समर्थन करें। जलवायु परिवर्तन इंतज़ार नहीं करेगा—और हमें भी नहीं करना चाहिए। अब वक्त है कि हम सब मिलकर कदम उठाएँ।

Shivank Saha
UNICEF

लेखक परिचय

शिवांक साहा, XLRI दिल्ली-एनसीआर के प्रथम वर्ष के छात्र हैं, जिनकी गहरी रुचि सतत विकास और सार्वजनिक नीति में है। दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज के पूर्व छात्र और DPS आर.के. पुरम के अकादमिक गोल्ड मेडलिस्ट, शिवांक शोध-आधारित सोच के साथ युवाओं से जुड़ी सामाजिक चुनौतियों पर लिखते हैं। वे विशेष रूप से यह समझने में रुचि रखते हैं कि युवा आवाज़ें कैसे एक अधिक जलवायु-लचीला और न्यायपूर्ण समाज बनाने में योगदान दे सकती हैं।