नन्हीं दुर्गा : जीवन की एक नई शुरुआत

नन्हीं दुर्गा कभी अपने भाई को विक्रम को चिकोटी काटकर भाग कर बगल के कमरे में छिप जाती है, तो कभी बाहर आती और इस बार, अपनी सहेली की पेंसिल छीनकर फिर से छिप जाती है।

इदरीस अहमद
Village Kitoora, Dist Udaipur, Rajasthan, INDIADurga’s short journey in Manju’s Anganwadi and preschool has been nothing short of extraordinary.
UNICEF/UN0220426/Singh
15 जनवरी 2019

उदयपुर, किटोरा के अनिकों में से एक 4 वर्षीय बच्ची दुर्गा की कहानी है जिसका पौष्टिक भोजन की कमी, जन्म के समय वजन कम होने और बार-बार बीमार पड़ने से तीन साल की उम्र तक शारीरिक विकास सही से नहीं हो पाया।

लेकिन इन सबके बावजूद नन्हीं दुर्गा की शरारतें कम नहीं हैं । वह कभी अपने भाई को विक्रम को चिकोटी काटकर भाग कर बगल के कमरे में छिप जाती है, तो कभी बाहर आती और इस बार, अपनी सहेली की पेंसिल छीनकर फिर से छिप जाती है। दुर्गा की शरारतों का सिलसिला यूँ ही चलता रहता है और आखि़रकार उसके सहपाठी उससे परेशान होकर टीचर से उसकी शिकायत कर देते हैं।

बच्चों की शिकायत पर टीचर आवाज लगाती है – “दुर्गा ! अपने दोस्तों को तंग न करो। वापस आओ।”  वे उसे बार-बार बाहर बुलाती हैं। दुर्गा अपने नन्हें क़दमों से चलते हुए चुपके से आती है और अपने हाथों में पकड़े पेंसिल, कलम और तीन खिलौने टीचर को दे देती है।  दुर्गा के मासूम चेहरे को देखते हुए टीचर दुर्गा के गाल को प्यार से चूमती है और उसे उसकी पसंदीदा कहानी सुनाने के लिए कहती हैं।  दुर्गा  मासूमियत से  कभी टीचर को देखती है तो कभी अपने बालों में उँगलियाँ घुमाती है । फिर टीचर के कहे अनुसार ‘कछुआ और खरगोश‘ की कहानी सुनाना शुरू करती है ।

 दुर्गा के चेहरे के भाव कहानी में खोते चले जाते हैं । टीचर के चेहरे पर हल्की सी झुंझलाहट के बावजूद उसकी कहानी में कछुआ हार जाता है और खरगोश जीत जाता है | उसकी कहानी को सुन टीचर को हल्की सी झुंझलाहट होती है।

शरारत करते देख मंजू अग्रवाल, दुर्गा की प्रीस्कूल शिक्षिका और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता कहती हैं कि हम कभी दुर्गा से परेशान नहीं हो सकते । उसकी इन हरकतों को करते देखकर हमें गर्व होता है। हम खुद को खुश और परिपूर्ण महसूस करते हैं।

आज साढ़े चार वर्ष की दुर्गा को शरारत करते देख मंजू अग्रवाल, दुर्गा की प्रीस्कूल शिक्षिका और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता कहती हैं कि “हम कभी दुर्गा से परेशान नहीं हो सकते । उसकी इन   हरकतों को करते देखकर हमें गर्व होता है। हम खुद को खुश और परिपूर्ण महसूस करते हैं।

 एक नई शुरुआत

गौरतलब है की उत्तर भारत के राजस्थान में तालों, पहाड़ियों और दर्रों से भरे उदयपुर के किटोरा गाँव में 2014 में बहुत कम वजन के साथ दुर्गा का जन्म हुआ। और यह हाल केवल दुर्गा की माँ का ही नहीं है जिसने कम उम्र में ही शादी की और फिर बच्चे को जन्म दिया हो । राजस्थान में 350,000 लड़कियाँ हैं, जिन्हें व्यस्कों में साक्षरता का अभाव, विशेषकर महिलाओं में, होने की वजह से बाल विवाह और उसके फलस्वरूप कम उम्र में माँ बनने के बोझ को झेलना पड़ता है ।

दुर्गा का परिवार भी इस बंजर गाँव के अधिकांश परिवारों की तरह गरीब है और गरीबी रेखा के नीचे वाले समुदायों से आता है, जो अपने बच्चों को शुरुआती वर्षों में पौष्टिक भोजन नहीं दे पाते हैं। इसी वजह से  जन्म के समय वजन कम होने और बार-बार बीमार पड़ने की वजह से दुर्गा का शारीरिक विकास सही से नहीं हो पाया।

राजस्थान में पाँच साल से कम उम्र के लगभग 39 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। इस तरह के बच्चों का दिमाग ठीक तरह से विकसित नहीं हो पाता है जिसका असर उनके मानसिक क्षमता के विकास पर पड़ता।

नन्हीं दुर्गा के बढ़ने, फलने-फूलने का अद्भुत सफर मंजू के आंगनवाड़ी और प्रीस्कूल में ही तय हुआ है। यह यात्रा एक ऐसे कुपोषित बच्ची के  उड़ान की यात्रा है जो पहले वजन बढ़ाने और पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने के लिए संघर्ष कर रही थी और जो आज साढ़े चार साल की स्वस्थ बच्ची के रूप में उसका विकास हो रहा  है ।

और यह संभव हुआ है मंजू के समर्पण और उदयपुर में आइकिआ (IKEA) समर्थित यूनिसेफ की अर्ली चाइल्डहुड डेवलपमेंट प्रोग्राम (Early Childhood Development Programme ) के कारण । इस कार्यक्रम के तहत बच्चों के उचित शारीरिक और समग्र विकास सुनिश्चित करने के लिए आंगनवाड़ी में दुर्गा जैसे बच्चों को प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल, भोजन और प्रीस्कूल शिक्षा मुहैया कराया जाता है।

मंजु कहती हैं कि दुर्गा का दाखिला जब उनके आंगनवाड़ी और प्रीस्कूल में हुआ तो वह अन्य कमज़ोर और कुपोषित बच्चों की तरह आंगनवाड़ी केंद्र की गतिविधियों में बहुत कम दिलचस्पी दिखाती थी।  “वह खाने से मना करती थी और ज्यादातर समय सोती रहती थी। शारीरिक व मानसिक रूप से निर्बल होने के कारण केंद्र की गतिविधियों में भी दुर्गा की कोई दिलचस्पी नहीं थी।”

आईसीडीएस रेफरल (ICDS referral programme) कार्यक्रम के तहत, दुर्गा को उदयपुर के आर.एन.टी. मेडिकल कॉलेज अस्पताल में कुपोषण उपचार केंद्र (Malnutrition Treatment Centre - MTC) में भेजा गया। एमटीसी में, डॉक्टरों ने दुर्गा को पूरक पोषण की खुराक दी और दुर्गा के माता-पिता को सलाह दिया कि वे दुर्गा को पौष्टिक भोजन देने के साथ साथ उसे नियमित रूप से आंगनवाड़ी ले जायें ।

इस बात पर मंजू ने भी  ध्यान दिया कि दुर्गा आंगनबाड़ी केंद्र नियमित रूप से आए और उसे आई.सी.डी.एस. कार्यक्रम का लाभ मिल सके। इस कार्यक्रम में, तीन से छह साल की उम्र के बच्चों को संतुलित, पौष्टिक भोजन मिलता है जो कार्बोहाइड्रेट, फैट और प्रोटीन युक्त होते हैं। 12-15 ग्राम  प्रोटीन से युक्त 500 किलो कैलोरी का आहार प्रत्येक बच्चे को हर दिन मिलता है।

मंजू ने नियमित रूप से दुर्गा के स्वास्थ्य संकेतकों की निगरानी करने के साथ सुनिश्चित किया कि वह आंगनवाड़ी में दिए जा रहे भोजन को नियमित रूप से खाए। संतुलित भोजन की नियमितता का दुर्गा के स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ा । लगभग दो वर्षों तक 5.5 किलोग्राम के स्थिर वजन से, दुर्गा का वजन नौ महीने से कम समय में बढ़कर 10 किलोग्राम हो गया। उसके अन्य स्वास्थ्य मापदंडों में भी काफी सुधार हुआ और वह प्रीस्कूल गतिविधियों में भी अब अधिक रुचि दिखाने लगी।

मंजू कहती हैं कि “दुर्गा न केवल नियमित हो गई बल्कि उसे प्रीस्कूल में मजा भी आने लगा।’’ मुस्कुराते हुए मंजु ने कहा, “अब जो मैं कहती हूँ वह ध्यान से सुनती भी है और अपने सहपाठियों के साथ भी घुल मिल गई है।’’

प्रारंभिक बाल शिक्षा पर ध्यान

वैश्विक प्रमाण के मुताबिक मस्तिष्क का 90 प्रतिशत विकास पाँच वर्ष की आयु तक होता है। प्रारंभिक पौष्टिक पोषण,  प्रेरणा और संरक्षण बाल्यावस्था के विकास के लिए आवश्यक होते हैं और किसी भी बच्चे के संज्ञानात्मक, भावनात्मक और सामाजिक विकास, उनके सीखने की क्षमता,  भविष्य को मजबूत आधार देने में सहयोग करते हैं । इससे बच्चों के बालपन के विकास के शुरुआती कार्यक्रमों में निवेश करने से उनके अंदर कौशल विकास ही नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में भी सहयोग मिलता है।

 बच्चों के पूर्ण विकास में अर्ली चाइल्डहुड डेवलपमेंट (ईसीडी) की भूमिका को के समझते हुए, आईकिआ (IKEA) द्वारा प्रीस्कूल और आंगनवाड़ी में प्रारंभिक बाल शिक्षा कार्यक्रम को बच्चों के लिए खेलकूद आधारित बनाया गया है जिससे उनका भाषाई, कलात्मक एवं ज्ञानात्मक विकास पूर्णरूप से हो सके।

दुर्गा के व्यक्तित्व विकास में आंगनवाड़ी और प्रीस्कूल में व्यक्तिगत व सामूहिक खेल-आधारित गतिविधियां शामिल हैं । व्यक्तिगत व सामूहिक गतिविधियों का उद्देश्य बच्चों का भाषाई, रचनात्मक और संज्ञानात्मक आधारित विकास है।

कहानी, ड्राइंग, पेंटिंग, शब्द निर्माण, रोल प्ले और गिनती आदि जैसी गतिविधियों को पूरे दिन के मुताबिक सुव्यवस्थित किया जाता है, जिनका उद्देश्य बच्चों के लिए इंटरैक्टिव माहौल बनाना जिससे बच्चों को कलात्मकता के साथ-साथ सवाल पूछने के लिए प्रोत्साहित करते हैं ।

मंजू कहती हैं “बच्चों को कहानी की पुस्तक, पेंटिग और स्टेज पर परफॉर्म करना पसंद हैं। जब मैं कक्षा में एक नई कहानी की किताब खोलती हूँ तो वे मेरे चारों ओर खुशी से इकट्ठा हो जाते हैं।

वे कहती हैं कि ‘‘हम उन्हें खाना खाने से पहले और शौचालय से आने के बाद  हाथ धोना सिखाते हैं। वे इन आदतों को अपने माता-पिता को भी सिखाते हैं।’’

इन गतिविधियों के साथ-साथ प्रार्थना, सक्रिय अभ्यास तथा नाश्ते और गर्म भोजन का भी समय निर्धारित है।

प्राथमिक विद्यालय के लिए बेहतर तैयारी

महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसी गतिविधियां बच्चों को प्राथमिक स्कूलों के लिए तैयार करती हैं। भारत में साक्ष्य मोजूद हैं जहाँ बच्चों की पढ़ाई पिछड़ रही है। बच्चों का स्कूल में दाखिला तो हो जाता है लेकिन वे मूल बातें सीखने में पिछड़ जाते हैं।

यूनिसेफ इंडिया की शिक्षा विशेषज्ञ मीता गुप्ता कहती हैं कि, ‘‘4 से 5 साल की नियमित प्रीस्कूल भागीदारी से जब बच्चे 5 वर्ष के बाद स्कूल के लिए तैयार होते हैं तो उनकी तैयारी काफी प्रभावकारी होती है । स्कूल में दाखिला के पहले स्कूल के पूर्व की तैयारी (Early Childhood Education - ECE) बच्चों के लिए काफी लाभकारी साबित होती है ।’’

मीता कहती हैं कि, ‘‘यह मान्य है कि एक अच्छा बाल शिक्षा कार्यक्रम (ईसीई) स्कूल में प्रवेश के समय ही बच्चों के विकास की दिशा में परिवर्तन ला देता है।’’

किटोरा आंगनवाड़ी केंद्र के करीब 60 छात्रों का दाखिला, पास के शासकीय हाईस्कूल में हुआ है। मंजू कहती हैं कि , ‘‘जिन बच्चों ने प्रीस्कूल में भाग लिया है, उनका प्रदर्शन हमेशा उन बच्चों की तुलना में बेहतर होता है जो कभी प्रीस्कूल गए ही नहीं।’’ स्कूल की प्रिंसिपल भी इस तथ्य को   स्वीकार कर रहीं कि,  दुर्गा की बहन भी आंगनवाड़ी और प्रीस्कूल के लाभार्थियों में से एक है।

दुर्गा के भाई – बहनों के साथ खड़ी उसकी माँ बीच में टोकते हुए कहती है कि दुर्गा में काफी बदलाव आया है | अब स्कूल से घर आने पर भी निरंतर अपने दोस्तों, कविताओं आदि के बारे में और उसकी कभी नहीं खत्म होने वाली कहानियों के बारे में बातें करती रहती है। अब दुर्गा शांत रहने वाली दुर्गा नहीं रही । दुर्गा के पिता कहते हैं कि दुर्गा रात में भी आंगनवाड़ी केंद्र जाना चाहती है ।

दुर्गा  के माता-पिता मंजू की ओर देखते हैं और  आभार व्यक्त करते हुए बोल पड़ते हैं ‘‘यह सब इनकी वजह से संभव हुआ है।’’

मंजू धीरे से सर हिलाती हैं और दुर्गा की ओर झुक कर मुस्कुरा कर कहती हैं, ‘‘कछुआ दौड़ जीतता जाता है खरगोश नहीं।’’

‘‘कछुआ दौड़ जीतता जाता है खरगोश नहीं।’’