खसरे से लड़ रहे तुलसीडीह के चैंपियन
तुलसीडीह गांव में खसरे के प्रकोप के बीच लचीलेपन और दृढ़ संकल्प की कहानियां
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ग्रामीण भारतीयों की तरह तुलसीहीड के लोगों के बीच में घनिष्ठ संबंध हैं। यहां के ग्रामीणों में परंपराओं और पारिवारिक बंधनों का ताना बाना मजबूती से बंधा हुआ है। लेकिन, यहां का जीवन का आसान नहीं है, दुर्गम एरिया होने की वजह से स्वास्थ्य सेवाओं जैसी जरूरी सुविधाओं से भी लोगों को वंचित रहना पड़ता था।
संकरी गलियों से गुजरते हुए आपको गांव के कुछ कच्चे, तो कुछ पक्के घर दिखाई देंगे, जिनमें छोटे दरवाजे और खिड़कियां लगी है। कुछ घरों पर टाइलें हैं तो कुछ की छतें भी घास-फूस से ढकी गई हैं। यहां के घरों की बनावट अलग अलग हो सकती हैं, लेकिन यहां के लोगों की कहानियां आपस में इस प्रकार जुड़ी हुई हैं कि आप उनसे बात करेंगे तो महसूस करेंगे कि यहां के लोग एक-दूसरे के लिए कितने जरूरी हैं। मजबूती से बने इस समुदाय के ताने-बाने को तोड़ना मुश्किल है। इस ताने-बाने को और मजबूत करने का काम करते हैं स्वास्थ्य कार्यकर्ता। जो घर-घर जाकर एक व्यक्ति या एक परिवार को नहीं, बल्कि पूरे गांव को मजबूत बनाने के लिए कार्य हैं।
तुलसीडीह दो बस्तियों में बंटा हुआ है, जिसमें एक में 500 तो दूसरी बस्ती में 980 लोग बसे हुए हैं। पहाड़ियों पर बसा होने की वजह से स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को गांव में पहुंचने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
गांव के ज्यादात्तर पुरूष रोजी के लिए दूसरे शहरों में पलायन कर गये हैं। इसकी वजह से महिलाओं को अब घर पर बच्चों, घर की जिम्मेदारी और बाहर पुरूर्षों के काम का बोझ भी अकेले ही उठाना पड़ रहा है। वह घर में महिला और समुदाय की पुरूष की दोहरी जिम्मेदारी का बोझ अपने कंधों पर लेकर चल रही हैं।
एक माँ का संकल्प
इस गांव की ऐसी ही एक महिला हैं फरीदा खातून, जिसके पति अख्तर अंसारी प्रवासी मजदूर हैं। पति के घर से दूर रहने के दौरान फरीदा अपने तीन बच्चों का लालन-पालन अकेले करती हैं। वह अपनी 10 वर्षीय बेटी रेश्मा, 7 वर्षीय बेटे अरबाज और सबसे छोटी 5 वर्षीय बेटी खुशी की देखरेख के साथ-साथ घर और खेतों का काम भी संभालती हैं।
2023 में फरीदा के गांव में मुस्लिम समुदाय में खसरे का प्रकोप फैल गया। जिसके बाद स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने सभी मुश्किलों को पार करते हुए गांव में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाई। तुलसीडीह कसिओटोल स्वास्थ्य उपकेंद्र के अधिकार क्षेत्र में आता है, जिसकी देखरेख सहायक नर्स दाई संध्या कुमारी करती है। संध्या और उसके साथी कार्यकर्ताओं के कंधों पर गांव के 17,000 लोगों की जिम्मेदारी थी, जो मानक केसलोएड से तीन गुना अधिक थी। इसी वजह से गांव के हर परिवार तक पहुंचना लगभग असंभव हो गया था।
शुरूआत में स्वास्थ्य कैंप सिर्फ बड़ी बस्तियों में ही लगाए गये। जिससे फरीदा की छोटी बस्ती की गर्भवती महिलाओं और माताओं को दूर-दराज के दूसरे गांव आने-जाने में परेशानी होती थी। इन महिलाओं के लिए घर के कामकाज छोड़कर इतनी दूर जाना न सिर्फ परेशानी का सबब बना, बल्कि यह थकाने वाला भी था। हालांकि इसके अलावा वह टीकाकरण के बाद होने वाले साइड इफेक्ट को लेकर भी चितिंत थी। खुराक के बाद अगर साइड इफेक्ट्स होने पर तुरंत सहायता न मिलने की स्थिति में ज्यादात्तर महिलाएं दूसरी खुराक के लिए कैंप में दोबारा आने से झिझकने लगी थी।
फरीदा भी उन्हीं महिलाओं में से एक थी, जिन्हें इसका परिणाम भुगतना पड़ा। जब खसरे का प्रकोप हुआ तो स्वास्थ्य सुविधाएं दूर होने की वजह से फरीदा के किसी बच्चे को टीके की खुराक नहीं मिल सकी और कोई स्वास्थ्य कार्यकर्ता भी नियमित रूप से फरीदा के गांव में नहीं जाता था। नत्तीजन फरीदा के तीनों बच्चे खसरे की चपेट में आ गये। जिसके बाद फरीदा को अपने पति की अनुपस्थिति में उनकी देखभाल अकेले करनी पड़ी। प्राथमिक शिक्षा की पढ़ाई करने वाली अपनी सबसे छोटी बेटी खुशी से फरीदा को टीके की खुराक छूटने के बाद होने वाले दुष्परिणामों के बारे में पता चला और सभी बच्चे इससे प्रभावित हो चुके थे।
फरीदा ने बताया कि, “टीकाकरण कैंप दूसरे गांव में था, इसलिए मैं अपने बच्चों को टीकाकरण के लिए लेकर नहीं जा सकी। मेरे सभी बच्चे टीके की खुराक नहीं ले सके। लेकिन, मुझे नहीं पता था कि टीकाकरण इतना जरूरी है।”
फरीदा की किस्मत अच्छी थी कि आशा वर्कर रूबी वर्मा और कसिओटोल स्वास्थ्य उपकेंद्र से सहायक नर्स दाई मनीषा कुमारी उनकी सहायता के लिए तुलसीडीह पहुंची। खसरे के संक्रमण की पहचान होने पर, उन्होंने प्रभावित परिवारों के बच्चों को को दवाएँ दी और उन्हें देखभाल की सलाह दी।
उन्होंने समुदाय को टीकाकरण के महत्व और सावधानियों के बारे में भी बताया। फ़रीदा के लिए यह दवाएं और नर्सों की सलाह किसी चमत्कार से कम नहीं थी। उनके सहयोग से वह बगैर अस्पताल जाये अपने बच्चों की घर पर ही देखभाल कर सकती थी। ऐसी मुश्किल समय में आशा वर्करों का गांव में आना उनके लिए एक राहत की सांस जैसा था।
समुदाय की भागीदारी के कारण बढ़ी वैक्सिन की मांग
16 वर्ष से गांव के एक निजी स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक मंजूर अंसारी ने बीमारी के प्रकोप में गांव वालों की अशिक्षित और अजागरूकता को करीब से महसूस किया। मंजूर ने देखा कि कैसे खसरे के प्रकोप में कम पढ़े-लिखे लोग अफवाहों पर जल्दी से भरोसा कर लेते हैं। उसने पाया कि जब भी कोई स्वास्थ्य कार्यकर्ता अभिभावकों को टीकाकरण के लाभों या बीमारी की सटीक जानकारी देने की कोशिश करता है तो कैसे असाक्षरता और जागरूकता की कमी के कारण गांव के लोग उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं।
मंजूर ने देखा कि उसके गांव में हमेशा सभी के लिए स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हो सकती थी। सामाजिक मुद्दों के प्रति संवेदनशील मंजूर ने अपने समुदाय के लोगों में टीकाकरण के प्रति जागरूकता फैलाने का निर्णय लिया। मंजूर को पता था कि जब तक गांव में हर बच्चे को टीकाकरण नहीं हो जाता, कोई भी बच्चा सुरक्षित नहीं होगा। मंजूर ने गांव के लोगों को समझाकर हर बच्चे को टीकाकरण कराया।
मंजूर ने ऐसे हालातों में मजबूती से काम लिया। उन्होंने न सिर्फ स्वास्थ्य विभाग के साथ स्वयंसेवा की बल्कि विशेष शिक्षण प्रशिक्षण शिविरों में भी भाग लिया। इन प्रशिक्षणों में उन्हें खसरे की गंभीरता का पता चला और उन्होंने स्वास्थ्य प्रथाओं को बढ़ावा देने के लिए जागरूक भी किया और टीकाकरण अभियान का समर्थन किया।
यह जानते हुए कि मुस्लिम बहुल इस समुदाय में लोग धार्मिक नेताओं पर ज्यादा भरोसा करते हैं, मंजूर ने शुक्रवार की नमाज के बाद मस्जिद में घोषणा करने के लिए उनकी मदद मांगी। मौलवी के समर्थन से मंजूर ने मस्जिद के संदेशों में खसरा-रूबेला (एमआर) टीके का महत्व बताते हुए सभी अभिभावकों से अपने बच्चों को टीका लगवाने का आग्रह किया।
जब गांव में टीकाकरण शिविर लगाए गये, तो मंजूर ने एमआर टीकाकरण के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए माता-पिता और शिक्षकों के बीच बैठकें आयोजित की। और अभिभावकों के सवालों का जवाब देकर उनकी शंकाओं का समाधान किया।
उन्होंने बीमारी और टीकाकरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए रैलियों का आयोजन करके छात्रों और उनके अभिभावकों को जागरूक किया। इन रैलियों में छात्रों और अभिभावकों की सामुदायिक भागीदारी ने वास्तव में पहले खसरे के टीकाकरण के बारे में जागरूकता बढ़ाने में मदद की और बाद में इस समुदाय में टीकाकरण को बढ़ावा दिया।
मंज़ूर ने कहा कि, "खसरे के प्रकोप के बाद नए टीकाकरण सत्रों की योजना के साथ, परिवारों को अपने बच्चों को टीकाकरण के लिए मनाना अब आसान हो गया है।"
खसरे के प्रकोप के बाद, गांव में एक नया सत्र स्थल बनाया गया, जिससे बच्चों को लंबी दूरी की यात्रा किए बगैर अपने गांव में ही टीकाकरण कराने की सुविधा मुहैया हो सके। इसके अलावा, अब उन्हें इसी साइट के जरिए टीकाकरण के साथ-साथ अन्य आवश्यक सेवाएँ भी प्राप्त हो रही हैं।
यूनिसेफ यूएसए से मिले उदार वित्त पोषण के साथ, यूनिसेफ ने बार-बार फैलने वाले प्रकोप के कारणों की पहचान करने के लिए झारखंड स्वास्थ्य विभाग के साथ साझेदारी की और खसरे के प्रकोप का मूल कारणों का विश्लेषण (आरसीए) किया। जिससे पता चला कि एक प्राथमिक मुद्दा नियमित टीकाकरण के लिए माइक्रोप्लानिंग था, जिसके कारण कई बच्चे अपनी खुराक लेने से चूक गए।
खसरे के इस प्रकोप से निजात पाने के लिए झारखंड राज्य स्वास्थ्य विभाग ने स्वास्थ्य मंत्रालय के सहयोग से एक एमआर टीकाकरण अभियान चलाया, जो गिरिडीह सहित नौ प्रभावित जिलों में 9 महीने से 15 साल के बीच के 45 लाख बच्चों तक पहुंचा। यूनिसेफ ने मूल्यांकन करके एक अतिरिक्त सत्र की योजना बनाने और इसे नियमित टीकाकरण सूक्ष्म-योजना में शामिल करने में जिला स्वास्थ्य प्रशासन का सहयोग किया।