उत्तर प्रदेश में बच्चों के लिए हर दरवाजे पर हुई ममता की दस्तक

गांव की एक आशा वर्कर और अभियान ने गोरखपुर की निराशा को बदला आशा में

गौरी सुंदरराजन
A touching moment in Gorakhpur, Uttar Pradesh, as Mamta Yadav (Asha Didi) receives recognition from grandmother Gyanti Devi while holding her 5-month-old grandson, Shivang.
UNICEF
10 जनवरी 2025

पक्षियों की चहचहाहट, स्कूल जाते बच्चों की साइकिल की टन-टन, नए ओवरहेड टैंक सिस्टम से पानी भरने जाती महिलाओं की आवाजों के साथ उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के जैनपुर गांव की सुबह होती है। सुबह की इस रूटिन दिनचर्या के बीच आशा वर्कर ममता देवी भी अपने दिन के लिए तैयार हो रही है।

फोन की घंटी के साथ, ममता के घर की शांति भंग हो जाती है।

“आशा दीदी, मेरे बच्चे को बहुत तेज़ बुखार है। मैंने 108 पर कॉल किया है,” फोन के उस तरफ से एक चिंतित माँ की आवाज आती है।

ममता अपना स्वास्थ्य बैग उठाते हुए फोन पर जवाब देकर कहती हैं, "आपने मुझे फोन करके बिल्कुल सही किया, मैं अभी आ रही हूं थोड़ा इंतजार करो।"

An ASHA worker in a white and brown saree walks purposefully along a street, carrying her official red and black ASHA kit bag.
UNICEF Mamta Yadav, also known as Asha Didi, is actively engaged in the Dastak program. She is effectively conducting door-to-door visits as part of her efforts.

वह फोन करने वाले घर पहुंचकर दरवाजे पर दस्तक देती हैं.... यह दस्तक है, निराशा पर आशा की!

 

दस्तक है, “दरवाजा खटखटाने-बीमारी भगाने की!”

 

घर का दरवाजा खटखटाते हुए ममता सोचती है, "मेरा काम मेरे लोगों के लिए खड़े रहना और उन्हें बीमारियों से सुरक्षित रखना है।"

गांव के हर दरवाजे पर होने वाली ममता की यह दस्तक बच्चों और परिवारों के लिए एक स्वस्थ और सुरक्षित रखने का वादा है।

वर्ष 2018 से पहले गोरखपुर भयानक महामारी की चपेट झेल चुका है। खासकर मानसून के मौसम में पनपने वाले मच्छरों के काटने से होने वाले एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) और जापानी एन्सेफलाइटिस (जेई) से यहां सैकड़ों बच्चों की जान गई थी।

ममता याद करते हुए बताती हैं कि, “उस वक्त हमें नहीं पता था यह क्या बीमारी है, जिससे बच्चे लगातार ग्रसित हो रहे हैं। बच्चों के माता-पिता को लगने लगा था कि यह कोई अभिषाप है, जिसकी वजह से चिकित्सा सेवाओं से उनका भरोसा उठ गया था और उन्होंने पूजा-पाठ और मंदिरों का सहारा लिया। लोग अपने बच्चों को ठीक करने के लिए झाड़-फूंक तक करवाने लगे थे। जब तक बच्चों को अस्पताल लाया जाता था, बहुत देर हो चुकी होती थी।”

तब वर्ष 2018 में यूनिसेफ के सहयोग से उत्तर प्रदेश सरकार ने दस्तक अभियान शुरू किया। यह एईएस और जेई से ग्रसित बच्चों के लिए तत्काल मिलने वाली सुविधा जैसा था। इस अभियान का मकसद संकट के इस समय में माता-पिता को समझाकर बीमारियों से निपटना था।

Embedded video follows
UNICEF The Dastak campaign in Uttar Pradesh, led by UNICEF India and supported by the Government of Uttar Pradesh, is helping ASHA workers fight Acute Encephalitis Syndrome (AES) and Japanese Encephalitis (JE) with awareness, care, and courage.

गोरखपुर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. आशुतोष कुमार दुबे बताते हैं कि, दस्तक का मतलब है हर घर होने वाली दस्तक! जो सुनिश्चित करती है कि कोई भी बच्चा पीछे नहीं छुटेगा।” अभियान का मकसद बीमारी के लक्षणों को पहचान कर, टीकाकरण के जरिए इसपर रोकथाम करना है। अभियान से डोर-टू-डोर जाकर लोगों को जागरूक किया गया।

यूनिसेफ इंडिया के सामाजिक और व्यवहार परिवर्तन अधिकारी दया शंकर सिंह ने बताया कि, “यूनिसेफ और स्वास्थ्य विभाग के सहयोग से चले इस अभियान ने शुरूआत 7 जिलो से की। बुखार के लिए तत्काल चिकित्सा देखभाल और सुरक्षित जल इस्तेमाल करने की आदत को बढ़ावा दिया गया। आशा कार्यकर्ताओं और आंगनवाड़ी कर्मचारियों को प्रभावी रूप से प्रशिक्षण दिया गया।''

In this heartwarming scene, Pratik, a two-year-old boy, is comfortably seated in his mother Pushpa’s lap, alongside his grandmother, Saraswati.
UNICEF In this heartwarming scene, Pratik, a two-year-old boy, is comfortably seated in his mother Pushpa’s lap, alongside his grandmother, Saraswati.

दस्तक अभियान के साथ आशा वर्कर ममता ने अहम रूप से कार्य किया। प्रशिक्षण के बाद उपकरणों से लैस होकर ममता ने स्वास्थ्य के प्रति अपने समुदाय का नजरिया बदलने का मिशन शुरू किया।

ममता ने बताया कि, "हमने सबसे पहली चीज बीमारी के शुरूआती लक्षणों को पहचान कर परिवारों के सलाह देनी सीखी। हमें मामलों को ट्रैक करने और फॉलो-अप लेने के लिए eKavach पोर्टल जैसे टूल का उपयोग करना भी सीखाया गया।"

eKavach पोर्टल स्वास्थ्य कर्मियों और सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों (सीएचओ) को स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने में मदद करता है। यह उन्हें मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, पोषण और गैर-संचारी रोगों जैसे क्षेत्रों को कवर करते हुए परिवारों के लिए महत्वपूर्ण स्वास्थ्य जानकारी को अरेंज करने और ट्रैक करने में मदद करता है। ऐप स्वास्थ्य कर्मियों को उनके दैनिक कार्यों में मदद करने और जरूरत पड़ने पर लोगों को सही सेवाओं के बारे में बताने में भी मदद करता है।

ममता हर दिन अपने स्वास्थ्य बैग को पत्रक और स्टिकर से पैक करके डोर-टू-डोर मिशन पर निकलती है। ममता के अनुसार, “शुरुआत में यह आसान नहीं था। परिवार टीकाकरण को लेकर झिझकते थे, उन्हें लगता था कि इंजेक्शन उनके बच्चों को बीमार कर देंगे। टीकाकरण शुरक्षित है यह भरोसा दिलाने के लिए मैंने समुदाय के लोगों के सामने अपने बच्चों को टीका लगाया, तब जाकर उन्हें मुझ पर भरोसा हुआ।”

ममता के लिए दस्तक अभियान एक टर्निंग पाइंट साबित हुआ। इस मिशन में न सिर्फ ममता को प्रशिक्षण मिला, बल्कि जरूरी उपकरण और एक्सपर्टस की सहायता भी मिली। वह बताती हैं कि, “हमने जल्दी से शुरूआती लक्षणों को पहनाकर परिवारों को परामर्श देने के साथ बच्चों के जीवन को बचाने के लिए आवश्यक कार्रवाई की। इससे पहली बार मुझे महसूस हुआ कि मैं वास्तविक बदलाव लाने के लिए कार्य कर रही हूं।”

यह अभियान राज्यव्यापी आंदोलन के रूप में उभरा, जिससे सभी 75 जिलों में जागरूकता की क्रांति आई और टीकाकरण दर में वृद्धि हुई। सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं में विश्वास बढ़ने से पंजीकृत मेडिकल प्रैक्टिशनर्स (आरएमपी) से इलाज कराने वाले लोगों की संख्या में कमी आ गई। स्वच्छ जल, स्वच्छता और मच्छर नियंत्रण में महत्वपूर्ण सुधार हुए, नतीजन गोरखपुर में एईएस और जेई के मामलों में कमी आई।

ममता अपने गांव में दस्तक अभियान का चेहरा बनकर उभरी। अब हर घर ममता का गर्मजोशी से स्वागत होता है, इसी से अभियान की ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है। स्वास्थ्य, स्वच्छता और शिक्षा सहित सोलह सरकारी विभाग, यूनिसेफ के साथ मिलकर काम करते हैं और तकनीकी मार्गदर्शन तथा संसाधन प्रदान करते हैं।

स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव पार्थ सारथी सेन शर्मा ने बताया कि, “दस्तक की सफलता इसके बहु-विभागीय सहयोग में समायी हुई है। स्वास्थ्य, स्वच्छता, शिक्षा और स्थानीय प्रशासन सभी हमारे बच्चों की सुरक्षा के लिए एक साथ आते हैं। देशभर में संचारी रोगों से निपटने के लिए उत्तर प्रदेश को एक मॉडल के रूप में पेश किया है।

On 15 October 2024, a worker conducted larvicidal spraying in the open drain of Jainpur village, Block Bhathat, Gorakhpur, Uttar Pradesh, India.
UNICEF On 15 October 2024, a worker conducted larvicidal spraying in the open drain of Jainpur village, Block Bhathat, Gorakhpur, Uttar Pradesh, India.

ग्राम प्रधान राज निषाद जैसे स्थानीय नेताओं ने अभियान में अहम रोल अदा किया हैं। उन्होंने बताया कि, “हमने रूके हुए पानी को साफ किया और कूड़े-कचरे को इकट्‌ठा करके मच्छरों को पनपने से रोका। इसी तरह छोटे-छोटे कदमों से जीवन को बचाया जा सकता है।”

शिक्षकों ने भी बच्चों को स्वच्छता के प्रति शिक्षित और जागरूक करके अपना योगदान दिया। गांव के स्कूल की शिक्षिका कुसुम गौतम बताती हैं कि, “हमने बच्चों को साफ-सफाई का महत्व समझाया। बच्चों ने खुद को साफ रखकर मच्छरों से बचाव सीखा और अपने परिवार को भी सफाई की अहमियत बताई।”

A handwashing hygiene session took place as part of the Dastak program, where teacher Babita Gupta taught students proper techniques to prevent diseases like jaundice, cold, typhoid, and diarrhoea.
UNICEF A handwashing hygiene session took place as part of the Dastak program, where teacher Babita Gupta taught students proper techniques to prevent diseases like jaundice, cold, typhoid, and diarrhoea.

दस्तक मिशन से रोग के लक्षणों की पहचान करके शीघ्र उपचार किया गया। ममता ने एक केस को याद करते हुए बताया कि, “उसके गांव में एक युवा लड़के को मानसून के मौसम में तेज बुखार हो गया था, उनके माता-पिता ने ममता को बुलाया।

ममता ने अभिभावकों को तुरंत 108 पर कॉल करने को कहा और उनके साथ स्वास्थ्य केंद्र में गई। बाल गहन चिकित्सा इकाई (पीआईसीयू) में लड़के को उचित उपचार मिला। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. ज्ञान प्रकाश गुप्ता ने बताया कि, ''दस्तक अभियान के आने से पहले बीमारी के ऐसे केस अक्सर बच्चों को मौत के मुंह में धकेल देते थे। अब अभिभावक तुरंत अपने बच्चों को लेकर अस्पताल आते हैं और पीआईसीयू व प्रशिक्षित आशा वर्करों की बदौलत हम बच्चों की जान बचा लेते हैं।”

In a critical moment, Dr. Gyan Prakash Gupta, a Medical Officer at the Pediatric Intensive Care Unit, examines the fever symptoms of two-year-old Arpit Vishwakarma at the Community Health Center.
UNICEF In a critical moment, Dr. Gyan Prakash Gupta, a Medical Officer at the Pediatric Intensive Care Unit, examines the fever symptoms of two-year-old Arpit Vishwakarma at the Community Health Center.

दस्तक अभियान के तहत ममता स्वास्थ्य शिविर आयोजित कराती है, जिसमें बच्चों को जेई का टीकाकरण किया जाता है। शिविर में माताएं स्वास्थ्य संबंधित परार्मश लेने आती हैं। ममता बताती हैं कि, “टीके बच्चों को उन बीमारियों से बचाते हैं, जो कभी हमारे समुदाय को तबाही के मंजर तक ले आई थी।” गांव की एक मां नीलू ने आगे आकर बताया कि, “आशा दीदी ने हमे समझाया कि टीके क्या काम करते हैं। अब मुझे अपने बच्चों को टीके की खुराक दिलवाने से डर नहीं लगता, बल्कि भरोसा है कि टीका लगवाने से मेरा बच्चा सुरक्षित रहेगा।”

दस्तक अभियान के लॉन्च होने के बाद से उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य परिणाम सकारात्मक रूप से बदलते नजर आए। अब हर साल 35.91 लाख से अधिक परिवार एईएस और जेई से बचने के लिए आगे बढ़कर टीकाकरण करवा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में यूनिसेफ के मुख्य फील्ड कार्यालय ज़कारी एडम ने अभियान की सफलता के बारे में बताते हुए कहा कि, “दस्तक मिशन ने एक मॉडल के रूप में कार्य करते हुए दिखाया कि जब समुदाय, सरकारें और संगठन एक साथ काम करते हैं तो हर काम संभव हो सकता है। आशा कार्यकर्ताओं को सशक्त बनाकर और परिवारों को शामिल करके, हमने एक ऐसा आंदोलन चलाया है, जो जीवन बचाता है।”

इसके परिणाम सकारात्मक रहे हैं, कभी एईएस और जेई का केंद्र रहे गोरखपुर में तीन वर्षों में जेई से संबंधित एक भी मौत की सूचना नहीं मिली है।

Mamta Yadav, known as "Asha Didi," and Anganwadi worker Mamta Jaiswal reached out to a family in Jainpur, Block Bhathat, Gorakhpur, Uttar Pradesh, India.
UNICEF Mamta Yadav, known as "Asha Didi," and Anganwadi worker Mamta Jaiswal reached out to a family in Jainpur, Block Bhathat, Gorakhpur, Uttar Pradesh, India.

गोधूलि बेला में जैसे ही सूरज डूबता है, ममता वापिस अपने घर के लिए चल देती है। उसका दिन अभी खत्म नहीं हुआ है। आने वाले नए दिन के साथ ममता और अधिक घरों के दरवाजे पर दस्तकें देगी, ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिलकर बातचीत करेगी और अधिक से अधिक जिंदगियों के बचाने के लिए प्रयास करेगी।

क्योंकि, दस्तक महज एक अभियान नहीं बल्कि कभी न खत्म होने वाली मुहिम है। ममता की आवाज शांति और दृढ़ संकल्प से भरी हुई है। वह कहती हैं, “मैं जब भी किसी दरवाजे पर दस्तक देती हूं, तो मेरी सलाह सिर्फ स्वास्थ्य के बारे में नहीं होती। बल्कि, मैं अपने समुदाय के लोगों को हर बच्चे की जिंदगी को सुरक्षित रखने का वादा देती हूं। मेरी दस्तक महज दरवाजे पर होने वाली खट-खट नहीं होती, बल्कि यह हर बच्चे तक पहुंचने और कभी हार न मानने का वादा होता है।” 

ममता का काम दृढ़ता, सहयोग और देखभाल की शक्ति का प्रमाण है।

दस्तक के जरिए ममता ने अपने समुदाय को भय और मृत्यू के खौफ से दूर करके, स्वास्थ्य और लचीलेपन में बदलने में मदद की है। अब ममता हर घर के दरवाजे पर दस्तक देकर उत्तर प्रदेश के बच्चों की सुरक्षा और उज्जवल भविष्य सुनिश्चित करती है।