यूनिसेफ ने कहा, नए साल के दिन, दुनियाभर में लगभग 386,000 बच्चों का जन्म होगा
यूनिसेफ विश्वभर में सभी राष्ट्रों को यह सुनिश्चित करने की चुनौती देता है कि ज़्यादा से ज़्यादा शिशु अपने जन्म के पहले दिनों में जीवित रहें।
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न्यू यॉर्क, 01 जनवरी 2018 – यूनिसेफ ने आज कहा कि नए साल के दिन, दुनियाभर में लगभग 386,000 बच्चों का जन्म होगा।
संभावना है कि प्रशांत महासागर में स्थित किरिबाती का क्रिसमस आइलैंड 2018 के पहले शिशु का स्वागत करेगा, और संयुक्त राज्य अमरीका 2018 के आखिरी शिशु का। वैश्विक तौर पर, इनमें से आधे से ज़्यादा जन्म इन नौ देशों में होंगे:
- भारत - 69,000
- चीन – 44,760
- नाइजीरिया – 20,210
- पाकिस्तान – 14,910
- इंडोनेशिया – 13,370
- संयुक्त राज्य अमरीका – 11,280
- कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य – 9,400
- इथियोपिया – 9,020
- बांग्लादेश – 8,370
इनमें से कई बच्चे जीवित रहेंगे, जबकि कुछ अगले दिन का सूरज भी नहीं देखेंगे। 2016 में, साल के हर दिन लगभग 2,600 बच्चों की जन्म के 24 घंटे के भीतर ही मृत्यु हो गई। करीब 20 लाख शिशुओं के लिए, उनके जीवन का पहला सप्ताह ही आखिरी सप्ताह साबित हुआ। कुल मिलाकर, 26 लाख बच्चे अपने पहले महीने के ख़त्म होने से पहले ही मर गए। इन बच्चों में, 80 प्रतिशत की मृत्यु असामयिक जन्म, प्रसव के दौरान जटिलताएं, और सेप्सिस और निमोनिया जैसे कारणों से हुई, जो रोके जा सकते थे या उनका इलाज किया जा सकता था ।
यूनिसेफ के चीफ ऑफ़ हेल्थ (स्वास्थ्य प्रमुख) स्टेफन पीटर्सन ने कहा "इस वर्ष, यूनिसेफ का संकल्प है, हर बच्चे को एक घंटे से ज़्यादा, एक दिन से ज़्यादा, एक महीने से ज़्यादा - जीवित रहने से ज़्यादा देना," । "हम सरकारों और सहयोगियों का आह्वान करते हैं, ताकि वो प्रमाणित और सस्ते समाधान उपलब्ध करा कर लाखों बच्चों को बचाने के संघर्ष में हमारा साथ दें।“
बीते दो दशकों में, विश्वभर में बच्चों के जीवित रहने के दर में बहुत अधिक वृद्धि देखी गई है । 2016 में दुनियाभर में, अपने पांचवे जन्मदिन से पहले मर जाने वाले बच्चों की संख्या आधी हो कर 56 लाख रह गई है। इसके बावजूद, नवजात शिशुओं के लिए प्रगति धीमी रही है। पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु में, जन्म के पहले महीने में ही मर जाने वाले शिशुओं की संख्या 46 प्रतिशत है।
अगले महीने, यूनिसेफ 'एवेरी चाइल्ड अलाइव' नामक अंतर्राष्ट्रीय अभियान शुरू करेगा, जिसके तहत हर माँ और नवजात शिशु के लिए सस्ती एवं गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग और उनकी आपूर्ति करने के लिए प्रयास किए जायेंगे । इसमें स्वास्थ्य केंद्रों पर साफ़ पानी की निरंतर आपूर्ति, जन्म के समय कुशल स्वास्थ्य सहायक की मौज़ूदगी, नाभि रज्जु (नाल) का विसंक्रमण (इन्फेक्शन रोकना), जन्म के पहले घंटे में स्तनपान, और माँ और बच्चे के बीच त्वचीय संपर्क आदि शामिल हैं।
पीटर्सन कहते हैं, "हम एक ऐसे युग में प्रवेश कर रहे हैं जब दुनिया के सभी नवजात शिशुओं को 22वीं सदी देखने का मौका मिलना चाहिए। दुर्भाग्यवश, इस साल में पैदा हुए लगभग आधे बच्चे ये नहीं देख पाएंगे। जनवरी 2018 में स्वीडन में पैदा हुआ एक बच्चा संभवतः 2100 तक जीवित रह सकता है, लेकिन सोमालिया में पैदा हुए बच्चे की 2075 से ज़्यादा जीवित रहने की सम्भावना बहुत कम है।
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संपादक के लिए टिपण्णी
भारत में हर दिन 69,000 बच्चे पैदा होते हैं। जन्म का दिन माँ और बच्चे के लिए सबसे जोख़िम-भरा है, क्योंकि तकरीबन 50 प्रतिशत मातृ मृत्यु और 40 प्रतिशत नवजात शिशुओं की मृत्यु जन्म के दिन होती है। इन मौतों को रोकने के लिए यह सुनिश्चित करना अहम् कदम होगा कि सभी महिलाएं स्वास्थ्य केंद्र में प्रशिक्षित प्रसव सहायक की मदद से जन्म दें , क्योंकि हर साल करीब 50 लाख नवजात शिशुओं का जन्म घर पर होता है।
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विभिन्न देशों के जन्म और जीवन प्रत्याशा पर एकत्रित संपूर्ण अनुमानों के लिए, यहाँ क्लिक करें। इस डाटा के लिए, यूनिसेफ ने वर्ल्ड डाटा लैब के साथ काम किया है।
पैदा हुए बच्चों की गिनती का अनुमान यू एन वर्ल्ड पापुलेशन प्रॉस्पेक्ट्स (2017) के अवधि सांकेतक और जीवन तालिका पर आधारित है। इस डाटासेट के आधार पर, वर्ल्ड डाटा लैब का अल्गोरिथम हर देश में हर दिन होने वाले जन्मों की गिनती, शिशुओं का लिंग, और उनकी जीवन प्रत्याशा बताता है।
इस कहानी के साथ की तसवीरें डाउनलोड करने के लिए, यहाँ जाएं। भारत की तस्वीरों के लिए, जनवरी 1, 2018 को बैरगढ सिविल अस्पताल, भोपाल में पैदा हुए पहले बच्चे की तसवीरें संलग्न हैं। फोटो क्रेडिट: यूनिसेफ/2018/अनिल गुलाटी
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