नवजात शिशु और बाल स्वास्थ्य
नवजात शिशुओं की मृत्यु पर रोक लगाएं और हर बच्चे का जीवन सुनिश्चित करें
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नवजात और बच्चों की मृत्यूदर को कम करना
भारत ने नवजात शिशुओं की मृत्यु दर कम करने में प्रोग्रेस की है। 1990 में विश्वभर में नवजात शिशुओं की मृत्यु में भारत की हिस्सेदारी एक तिहाई थी, जो आज एक चौथाई से भी कम हो चुकी है।
46 प्रतिशत मां की मृत्यु प्रसव के दौरान और 40 प्रतिशत नवजात शिशुओं की मृत्यू जन्म देने के पहले 24 घंटों के अंदर होती है। 29 दिन से कम उम्र की नवजात शिशुओं की मृत्यू के प्रमुख कारणों में समय से पहले प्रसव और जन्म के समय कम वजन (48 फीसदी), प्रसव के दौरान दम घुटना (13 फीसदी), निमोनिया (12 फीसदी), अन्य जन्म विकृतियां (7 फीसदी) हैं।
भारत में तकरीबन 35 लाख बच्चे समय से पहले जन्म लेते हैं और हर साल करीब 10 लाख नवजातों को एसएनसीयू (विशेष नवजात देखभाल इकाइयों) से छुट्टी दे दी जाती है। इन नवजात शिशुओं में मृत्यु, बौनापन, विकास में देरी का खतरा रहता है।
भारत में तकरीबन 35 लाख बच्चे समय से पहले जन्म लेते हैं और हर साल करीब 10 लाख नवजातों को एसएनसीयू (विशेष नवजात देखभाल इकाइयों) से छुट्टी दे दी जाती है। इन नवजात शिशुओं में मृत्यु, बौनापन, विकास में देरी का खतरा रहता है।
फिर भी, प्रसव के दौरान और प्रसव के बाद होने वाली मृत्यु को कुशल प्रसव सहायक और आपात कालीन प्रसूति देखभाल की सुविधाओं से काफी हद तक रोका जा सकता है।
आपातकालीन सेवाओं और प्रसूति देखभाल को आसान बनाकर नवजात शिशु और उसकी मां की मृत्यु को काफी हद तक रोकने में मदद मिल सकती है। 2016 की तुलना में 2020 में भारत में हर महीने लगभग दस लाख नवजात शिशुओं और 8520 माओं की मृत्यु हुई।
यह अधिक से अधिक महिलाओं का प्रसव स्वास्थ्य सुविधाओं में कराने का ही परिणाम है। आपातकालीन सेवाओं और प्रसूति देखभाल को आसान बनाकर नवजात शिशुओं और मातृ मृत्यु को रोकने में मदद मिलती है। पहले की तुलना में आज अधिक महिलाओं का प्रसव स्वास्थ्य सुविधा में किया जाने लगा है।
महज, एक दशक पहले, दस में से छह महिलाओं का प्रसव उनके अपने घरों में किया जाता था। जिसमें किसी कुशल प्रसव परिचर की मदद नहीं ली जाती थी। इससे मां और नवजात शिशु दोनों को जोखिम होता था।
आज, यह संख्या तीन गुना कम हो गई है और दस में से नौ महिलाओं का प्रसव स्वास्थ्य सुविधा में किया जाने लगा है। हालांकि अब भी सेवाओं की गुणवत्ता को कवरेज में वृद्धि के साथ तालमेल करके चलने की जरूरत है।
शिशु के जन्म लेने के बाद, तुरन्त और केवल स्तनपान कराने से जीवित रहने की दर तेजी से बढ़ती है, इससे 41 प्रतिशत मामलों में वृद्धि दर्ज की गई है। जन्म के समय नवजातों की मृत्यू दर 4 प्रतिशत है जबकि एसएनसीयू में दम घुटने से होने वाली कई मौतें देश भर में स्वास्थ्य सेवा की निम्न गुणवत्ता का परिणाम हैं।
कवरेज में वृद्धि भी समान नहीं रही है, गरीब और आदिवासी घरों की महिलाएं जो सामान्यत दुर्गम क्षेत्रों में रहती हैं, अभी भी प्रसव अपने घरों में ही कर रही हैं। इसलिए भले ही भारत ने बाल मृत्यु दर में कमी लाने में बेहतरीन प्रयास किये हैं, लेकिन अब भी हाशिए पर रहने वाले लोगों खासतौर पर किशोरियों पर ध्यान देने की जरूरत है।
जहां देश में एसएनसीयू के तेजी से बढ़ते स्तर से शिशु मृत्यु दर में कमी आई है, वही इससे नवजात कन्या की देखभाल करने में सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाएं भी सामने आई हैं
हालाँकि, प्रमाणों से पता चलता है कि नवजात लड़कियां जैविक रूप से अधिक मजबूत होती हैं, लेकिन वे व्यापक स्तर पर लड़कों को अहमियत दिए जाने के कारण सामाजिक रूप से कमज़ोर रह जाती हैं। नवजात और पाँच वर्ष से कम उम्र की लड़कियों की मृत्यु दर से यह पता चलता है।
भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा बड़ा देश है जहां लड़कों की तुलना में लड़कियों की मृत्यु अधिक होती है। (U5MR) और पांच साल से कम उम्र के लड़के-लड़कियों की मृत्यु दर में 2 प्रतिशत का अंतर है।
यूनिसेफ की भूमिका
नवजात शिशुओं के लिए यूनिसेफ के कार्यक्रमों में देखभाल की असमानताओं को कम करना, स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करना और प्रतिरोध एवं ज़ोखिम अनुरूप योजना बनाना शामिल है। सबसे वंचित समुदायों में पर्याप्त निवेश और दृढ़ अगुवाई लाखों छूटीमाताओं और उनके नवजात शिशुओं को बचा सकते हैं।
यूनिसेफ का दोनों लिंगों के नवजात शिशुओं की मृत्यु में समान कमी लाने पर ज़ोर भारत सरकार की इंडिया न्यूबोर्न एक्शन प्लान (India New-born Action Plan) के अनुरूप है, जिसमें यूनिसेफ एक प्रमुख भागीदार है। इस कार्य-योजना का उद्देश्य शिशुओं की रोकी जा सकने वाली मृत्यु, स्टिलबॉर्न के जन्म में कमी लाना और शिशु मृत्यु दर व स्टिलबॉर्न दर को 2030 तक ‘इकाई अंक’ तक लाना है।
यूनिसेफ योजना बनाने, बजट, नीति निर्माण, क्षमता निर्माण, निगरानी और सुविधाओं की मांग उत्पत्ति में सहायता करने के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (एमओएचएफडब्ल्यू), महिला और बाल विकास मंत्रालय (डब्ल्यूसीडी), नीति आयोगऔर राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करता है।
शिशुओं की उत्तरजीविता के एजेंडे को आगे ले जाने के लिए यूनिसेफ नेशनल नियोनैटोलॉजी फोरम, फेडरेशन ऑफ ओब्स्टेट्रिक्स और गाइनोकोलॉजिकल सोसाइटीज ऑफ इंडिया, एवं इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स, मेडिकल कॉलेजों और शैक्षणिक संस्थानों, नागरिक समाज तंत्रों, द पार्लियामेंटेरिअंस ग्रुप फॉर चिल्ड्रन, मीडिया और निजी क्षेत्र जैसे पेशेवर संगठनों के साथ कार्यनीतिक साझेदारी करता है।
फिलहाल, यूनिसेफ को भारत में 115 में से 39 आकांक्षी जिलों में मुख्य साझेदार की भूमिका भी सौंपी गई है। भारत इसमें और सुविधालैस नवजातों की देखभाल के लिए तकनीकी रूप से नेतृत्व का कार्य कर रहा है।
सुविधा-आधारित शिशु देखभाल के लिए विषय गत तकनीकी बढ़त के रूप में, यूनिसेफ पूरे भारत में (SNCU, MNCU, KMC NBSU, paediatric care, NICU, PICU) में सुधार करने और विश्व स्तर पर रोग ग्रस्त शिशुओं के लिए सबसे बड़े रियल टाईम ऑनलाइन डाटा बेस बनाने में महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है।
- भारत सरकार के स्किल्ड प्रोग्राम को आगे बढ़ाना, जिनमें नवजात के जन्म में सहायता और बीमार और छोटे बच्चों की देखभाल शामिल है।
- नीकू केंद्रों को अपस्केल करना और बीमार नवजात बच्चों के लिए विश्वस्तर का रीयल टाइम डेटा बेस तैयार करना।
- बाल चिकित्सा केंद्रों को मजबूत करना, और iv) पूरे भारत में स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं की क्षमता निर्माण को बढ़ावा देना।
माताओं और नवजात शिशुओं की देखभाल की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए, यूनिसेफ स्वास्थ्य सुविधाओं की गुणवत्ता और सम्मानजनक देखभाल प्रदान करने के अपने प्रयासों को बढ़ाता है।
यह स्वास्थ्य प्रणालियों और समुदायों के बीच संबंधों को मजबूत करने और गर्भवती महिलाओं, परिवारों और समुदायों को आगे संवेदनशील बनाने, परामर्श देने और समर्थन करने के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को सक्रिय रूप से सम्मिलित करता है।
- संस्थागत प्रसव, उसके बाद नियमित प्रसवोत्तर देखभाल के लिए दौरे,
- छह महीने तक केवल स्तनपान,
- बच्चे के पोषण और स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों की पहचान और प्रबंधन,
- बीमार और जन्म के समय कम वजन वाले शिशुओं के लिए विशेष देखभाल,
- नवजात शिशुओं में खतरे के संकेतों की पहचान करना और निकटतम स्वास्थ्य सुविधा के लिए रेफर करना, विशेष रूप से लड़कियों के लिए देखभाल करना,
- टीकाकरण,
- परिवार नियोजन और जन्म अंतर, आदि।
प्रत्येक बच्चे की उचित वृद्धि और विकास के लिए एक सक्षम वातावरण सुनिश्चित करने के लिए, यूनिसेफ समुदायों को सामाजिक और व्यवहारिक परिवर्तन की पहल के साथ संगठित करता है:
- विशेषकर आकांक्षी जिलों के दुर्गम क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण एमएनएच सेवाओं की मांग पैदा करना और उन्हें आगे बढ़ाना।
- नवजात शिशु की देखभाल में लैंगिक पूर्वाग्रहों और हानिकारक सामाजिक-सांस्कृतिक मानदंडों को संबोधित करना।
जन्म का दिन माँ और नवजात शिशु दोनों के लिए सबसे जोखिम भरा होता है, लगभग आधी मातृ मृत्यु और 40 प्रतिशत नवजात मृत्यु बच्चे के जन्म के दिन होते हैं।
इसलिए, यूनिसेफ स्वास्थ्य, पोषण और WASH कार्यक्रमों के संयुक्त हस्तक्षेप के साथ जन्म के दिन को प्राथमिकता देता है, जिससे मातृ, मृत जन्म और नवजात मृत्यु को कम करने के मामले में निवेश पर तिगुना रिटर्न मिलता है।
विश्व स्तर पर, यूनिसेफ # EveryChildALIVE पर केंद्रित है, जो एक हस्ताक्षरित नवजात अभियान है जो बालिकाओं पर विशेष ध्यान देने के साथ 2030 तक रोकी जा सकने वाली नवजात मौतों को खत्म करने के लिए यूनिसेफ इंडिया के प्रयासों का समर्थन और गति प्रदान करता है।