राजस्थान में बाल-मित्र पंचायतों के ज़रिए सशक्त बन रहे बच्चे
बाल पंचायतों और बाल सभाओं में 10 से 18 वर्ष के युवा नेता अपनी आवाज़ उठाकर बाल विवाह, शिक्षा, और पर्यावरण जैसे मुद्दों में ला रहे बदलाव
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राजस्थान के रंग-बिरंगे गांवों में, यूनिसेफ़ और पंचायती राज विभाग की साझेदारी से चल रही बाल- मित्र ग्राम पंचायत पहल बच्चों को निर्णय लेने की प्रक्रिया के केंद्र में ला रही है।
यह पहल संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार संधि के सिद्धांतों पर आधारित है, जिसमें स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा और भागीदारी जैसे बच्चों के अधिकारों को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है।
बाल पंचायतों और बाल सभाओं के माध्यम से 10 से 18 वर्ष के बच्चे अपनी आवाज़ उठा रहे हैं और बाल विवाह, शिक्षा व पर्यावरण जैसे मुद्दों पर बदलाव ला रहे हैं।
राजस्थान की ग्रामीण विकास और पंचायती राज विभाग की "बाल-मित्र पंचायत राजस्थान" की प्रतिबद्धता के साथ, ये युवा नेता अपने गांवों के भविष्य को नए और सकारात्मक तरीके से गढ़ रहे हैं।
लोकतंत्र की सीख — बच्चों की अपनी पंचायत
बाल पंचायत एक ऐसा मंच है जहां बच्चे खुद अपने बाल सरपंच और वार्ड सदस्यों का चुनाव करते हैं। नियमित बैठकों में बच्चे गांव की समस्याओं पर खुलकर बात करते हैं—चाहे वह स्वच्छता हो, शिक्षा हो या पेयजल—और फिर अपने सुझाव ग्राम पंचायत तक पहुँचाते हैं।
“बाल पंचायत एक ऐसा मंच है जहां हम बच्चे अपनी बातें ज़ोर से कह सकते हैं और बड़ों से अपनी ज़रूरतें पूरी करने की मांग कर सकते हैं।”
— मिशिका राठौड़, बाल सरपंच, जहूता ग्राम पंचायत, राजस्थान
वसुंधरा — बाल विवाह के खिलाफ एक साहसी योद्धा
“जब मैं 12 साल की थी, मेरे लिए शादी का प्रस्ताव आया। मुझे पता था कि बाल विवाह गलत है, इसलिए मैंने इसका विरोध किया,”
— वसुंधरा शर्मा, बाल सदस्य, दर्डी ग्राम पंचायत
बाल पंचायत की चर्चाओं से जागरूक होकर वसुंधरा ने न सिर्फ अपना विवाह रोका, बल्कि अपने गांव में 50 बाल विवाह रोकने में मदद की। इन्होंने कई बच्चों को 1098 चाइल्डलाइन नंबर के बारे में भी बताया।
शिक्षा की राह में बाधाओं को तोड़ते बच्चे
“हमारे गांव में कोई लड़की 8वीं के बाद नहीं पढ़ती थी, क्योंकि पास में स्कूल नहीं था। मैं पहली लड़की हूँ जिसने 9वीं में प्रवेश लिया है।”
— नारंगी कुमारी, बाल सदस्य, दर्डी ग्राम पंचायत
नारंगी के संकल्प से प्रेरित होकर अब 21 और बच्चे स्कूल जाने लगे हैं। इससे साबित होता है कि एक आवाज़ भी बदलाव की लहर शुरू कर सकती है।
मासिक धर्म पर खुलकर बातचीत
“मासिक धर्म एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। मैं अपनी छोटी बहनों को सफाई और देखभाल के बारे में बताती हूँ।”
— पूजा शर्मा, दर्डी ग्राम पंचायत
बाल पंचायत में लड़कियाँ पैड के सही उपयोग, निपटान और स्वच्छता पर चर्चा करती हैं। इससे गांव में माहौल खुला और स्वस्थ बन रहा है।
गांव को हराभरा बनाने की पहल
जहूता ग्राम पंचायत, राजस्थान की बाल सरपंच मिशिका राठौड़ ने बताया कि, “हमारे गांव में पहले सिर्फ 54 पेड़ थे, अब हमने 54,000 पेड़ लगाए हैं!” पर्यावरण को बचाने के लिए बच्चे पेड़ लगाते हैं, प्लास्टिक मुक्त अभियान चलाते हैं और गांव में सफाई का नेतृत्व करते हैं।
प्लास्टिक-मुक्त पंचायत का संकल्प
जहूता ग्राम पंचायत से गजवी शर्मा ने बताया कि, “जहां भी प्लास्टिक का रैपर मिलता है, हम उसे इकट्ठा कर बोतल में डालकर सरपंच को देते हैं।” बच्चों की पहल से गांव साफ और पर्यावरण अनुकूल बनता जा रहा है।
स्कूलों में बेहतर सुविधाएँ — बच्चों की मांग पर बदलाव
दर्डी ग्राम पंचायत के सरपंच अब्दुल करीम ने बताया कि, “बच्चों की मांग पर मैंने अपने पंचायत के सभी स्कूलों में साफ और बड़े बाथरूम बनवाए।” बच्चों की आवाज़ से स्कूलों में डिजिटल लाइब्रेरी, साफ पेयजल और शौचालयों जैसी सुविधाओं में सुधार हुआ है।
बाल सभाओं में गूंजती बच्चों की आवाज़
जहूता ग्राम पंचायत, राजस्थान की बाल सरपंच मिशिका राठौड़ ने बताया कि, "हर चार महीने में होने वाली बाल सभाओं में बच्चे सीधे सरपंच और अधिकारियों से सवाल पूछते हैं। बच्चे बहुत कठिन प्रश्न पूछते हैं, और सरपंच को पूरी तैयारी के साथ जवाब देना पड़ता है।” इन सभाओं में बच्चे खेल मैदान, सड़क सुधार और अन्य सुविधाओं के लिए सुझाव देते हैं।
भविष्य की नई राह
“हमारे विचार आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बनाएँगे। एक उज्ज्वल कल के लिए हमें अभी से काम करना होगा।”
— मिशिका राठौड़
बाल सभाओं में बच्चे एक स्वर में कहते हैं— “हमारी पंचायत — बाल-मित्र पंचायत!”
ये युवा नेता ऐसा राजस्थान बना रहे हैं जहाँ हर बच्चे की आवाज़ सुनी जाती है और हर सपना उड़ान भरता है।