रटने से नवाचार की ओर बढ़ते कदम

विजयवाड़ा में शिक्षा का रूप बदल रही अटल टिंकरिंग लैब्स

गौरी सुंदरराजन, संचार अधिकारी
V.Vamsi, a 12-year-old 6th grade student at ATL Lab.
UNICEF
08 दिसम्बर 2025

विजयवाड़ा के कक्षाओं में अब रटने और एक जैसी नीरस पढ़ाई के दिन पीछे छूट चुके हैं। अटल टिंकरिंग लैब्स (ATLs) के माध्यम से एक शांत लेकिन प्रभावी बदलाव आ रहा है। ये लैब्स युवाओं के लिए एक ऐसा मंच बन गई हैं, जहाँ वे नवाचार की दुनिया में कदम रख रहे हैं और भविष्य के इनोवेटर बन रहे हैं।

पाठ्यपुस्तकों से प्रयोग की ओर: सीखने का नया तरीका

कुछ समय पहले तक रेवल्ला अर्चना जैसी छात्राओं के लिए पढ़ाई का मतलब किताबों से तथ्यों को रटकर याद करना था। लेकिन, भारत सरकार के अटल इनोवेशन मिशन (AIM) की एक राष्ट्रीय पहल अटल टिंकरिंग लैब्स ने इस सोच को बदल दिया है। ATLs ने छात्रों की पढ़ाई का तरीका बदल दिया, ये लैब्स देशभर के स्कूलों में कक्षा 6 से 12 तक के छात्रों के लिए बनाई गई हैं।

यहाँ बच्चे विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित (STEM)  के सिद्धांतों को किताबों से नहीं, बल्कि प्रयोग करके सीखते हैं। उपकरणों से काम करते हुए वे जिज्ञासा, समस्या-समाधान और रचनात्मकता को विकसित करते हैं। प्रोजेक्ट बनाते हुए टीमवर्क और उद्यमिता की भावना भी विकसित होती है। यही बदलाव छात्रों को रटने से खोज की ओर लेकर जाती है और यही ATLs की असली ताकत है।

R.Archana and S.Tarun (not in the picture), 9th grade students from Zilla Parishad High School, build a train accident prevention system at the Atal Lab.
UNICEF R.Archana and S.Tarun (not in the picture), 9th grade students from Zilla Parishad High School, build a train accident prevention system at the Atal Lab.

अर्चना की कहानी इसका एक उदाहरण है। अपनी माँ को खोने का दर्द किसी भी बच्चे की पढ़ाई और भविष्य को तोड़ सकता था। लेकिन, ATL अर्चना के लिए सहारा बनकर आया। अपने शिक्षक के मार्गदर्शन में उसने अपने दुख को सकारात्मक दिशा दी। विज्ञान में रुचि जगी और आज वह अपनी टीम के साथ ट्रेन दुर्घटना रोकने की प्रणाली पर काम कर रही है। यह दिखाता है कि ATL कैसे कठिन समय में भी बच्चों को आगे बढ़ने की शक्ति देती है।

अर्चना को नवाचार में मिला सहारा...

अर्चना बताती है कि, “ATL से पहले विज्ञान का मतलब किताबों से तथ्य याद करना था,”
“यहाँ हम असली समस्याओं का समाधान ढूँढते हैं। मेरे शिक्षक और लैब ने मेरे दुख को किसी सकारात्मक और उपयोगी काम में बदलने में मदद की। अब मैं सिर्फ सीख नहीं रही, बल्कि एक ऐसी प्रणाली बना रही हूँ जो ज़िंदगियाँ बचा सकती है।”

शुरुआती चुनौतियाँ और सामूहिक प्रयास

ATLs की यात्रा आसान नहीं रही। अच्छे इरादों के बावजूद, शुरुआत में कई चुनौतियाँ सामने आईं। शिक्षा विभाग से सीमित तालमेल के कारण शिक्षकों का प्रशिक्षण और निगरानी पर्याप्त नहीं हो पाई। पाठ्यक्रम में ATL गतिविधियों को ठीक से जोड़ा नहीं गया, जिससे कई स्कूलों में ये लैब्स मुख्य पढ़ाई से अलग-थलग रह गईं। कुछ स्कूलों ने इन्हें पढ़ाई से “ध्यान भटकाने वाली” गतिविधि तक मान लिया।

लेकिन, 2021 में एक नया अध्याय शुरू हुआ। स्थिति को समझते हुए यूनिसेफ ने आंध्र प्रदेश शिक्षा विभाग और विज्ञान आश्रम के साथ मिलकर विजयवाड़ा की ATLs में जान फूँकते हुए इन्हें मजबूत बनाने का काम शुरू किया।

ATLs में नई ऊर्जा

यूनिसेफ के सहयोग से बना यह नेटवर्क शिक्षकों और छात्रों के लिए प्रशिक्षण मॉड्यूल, संसाधन और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराता है। इसका मकसद था—हर बच्चे को हाथों-हाथ सीखने का मौका मिले।

यूनिसेफ के शिक्षा विशेषज्ञ शेषगिरी मधुसूदन बताते हैं कि, “हमारी भूमिका सरकार और स्कूलों के बीच की खाई को पाटने की थी। हमने तकनीकी सहयोग दिया, शिक्षकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए और सबसे अहम ATL गतिविधियों को स्कूल पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने की पैरवी की।”

नतीजे उम्मीद से कहीं बेहतर रहे। शिक्षा विभाग की सक्रिय भागीदारी से स्कूलों ने ATL के लिए निश्चित समय तय किया। शिक्षक अब अपनी कक्षाओं में डिज़ाइन थिंकिंग और समस्या-समाधान के तरीकों को शामिल करने लगे। ATLs अब अलग-थलग प्रयोगशालाएँ नहीं रहीं, बल्कि स्कूल जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गईं।

कक्षा से बदलाव के नायक बनने वाले: बच्चों की कहानियाँ

ATLs ने बच्चों को कल्पना और नवाचार की दुनिया में पहुँचाया है। अब कल्पना कीजिए ऐसी कक्षाएँ जहाँ बच्चे प्रयोग करने से नहीं डरते, बड़े सपने देखते हैं और उन्हें साकार करने की कोशिश करते हैं। विजयवाड़ा की ATLs इसी भविष्य को आकार दे रही हैं।

R.Archana (not in the picture) and S.Tarun (right), 9th grade students from Zilla Parishad High School, build a train accident prevention system at the Atal Lab.
UNICEF R.Archana (not in the picture) and S.Tarun (right), 9th grade students from Zilla Parishad High School, build a train accident prevention system at the Atal Lab.

तरुण गर्व से कहता है, “ATL गेम-चेंजर है। पहले पढ़ाई रटने जैसी लगती थी। अब हम हाथों-हाथ समस्याएँ सुलझाते हैं। डिज़ाइन थिंकिंग ने मुझे आसपास की चीज़ों से समाधान निकालना सिखाया।”

इसी सोच और इलेक्ट्रॉनिक्स के ज्ञान से तरुण और उसकी टीम ने भी ट्रेन दुर्घटना रोकने की प्रणाली विकसित की। तरुण की कहानी बताती है कि सही माहौल मिले, तो जिज्ञासा कितनी दूर ले जा सकती है।

B.Supraja, an 8th grade student from Zilla Parishad High School, is working on a password-based door lock system where a secure password will act as a door unlocking system.
UNICEF B.Supraja, an 8th grade student from Zilla Parishad High School, is working on a password-based door lock system where a secure password will act as a door unlocking system.

सुप्रजा की कहानी आत्मविश्वास की ताकत दिखाती है। वह बताती है कि, “ATL में किताबें नहीं, बल्कि आसपास की चीज़ों से समस्याएँ हल करना सीखते हैं—ये मैंने अपने दादाजी से सीखा था! अब मैं पासवर्ड-आधारित डोर लॉक सिस्टम बना रही हूँ।”

एक दिन स्कूल में चाबियाँ भूल जाना उसके लिए एक विचार बन गया। शिक्षक के मार्गदर्शन में उसने पासवर्ड-आधारित डोर लॉक सिस्टम बनाना शुरू किया। इस परियोजना ने न सिर्फ एक असली समस्या का समाधान दिया, बल्कि सुप्रजा का आत्मविश्वास भी बढ़ाया।

वह बताती हैं कि “ATL ने मेरी झिझक दूर कर दी है। “अब मैं आत्मविश्वास के साथ आसानी से दोस्तों और सहपाठियों से बात कर पाती हूँ।” सुप्रजा IPS अधिकारी बनकर अपने पिता का सपना पूरा करना चाहती है। ATL उसे उस सपने तक पहुँचने के लिए ज़रूरी कौशल और भरोसा दे रही है।

Portrait of B.Supraja (right) and A.Dileep Kumar (left), 8th and 6th grade students from Zilla Parishad High School, with a password-based door lock system where a secure password will act as a door unlocking system.
UNICEF Portrait of B.Supraja (right) and A.Dileep Kumar (left), 8th and 6th grade students from Zilla Parishad High School, with a password-based door lock system where a secure password will act as a door unlocking system.

दिलीप के लिए ATL विज्ञान-कथा को हकीकत में बदलने जैसा था। वह कहता है, “ATL से पहले इलेक्ट्रॉनिक्स और 3डी प्रिंटिंग मुझे किसी साइंस-फिक्शन फ़िल्म जैसी लगती थी। लेकिन यहाँ आकर यह सब हकीकत बन गया! अब मैं खुद चीज़ें बना सकता हूँ और अपने दोस्तों को भी प्रोत्साहित करता हूँ।”

इस व्यावहारिक सीख ने दिलीप को सिर्फ तकनीकी ज्ञान ही नहीं दिया, बल्कि धैर्य, समस्या-समाधान और सोचने की क्षमता जैसे ज़रूरी जीवन कौशल भी सिखाए। उसकी यात्रा इस बात का प्रमाण है कि ATL बच्चों को केवल सुनने-पढ़ने वाले विद्यार्थी नहीं रहने देती, बल्कि उन्हें सक्रिय रचनाकार बनाती है—जो नए विचार सोचते हैं और उन्हें साकार करने का साहस रखते हैं।

मुस्कराते हुए दिलीप कहता है कि, “ATL सचमुच गेम-चेंजर है। यह हर छात्र के भीतर रचनात्मकता जगा देती है। मैं अपने दोस्तों से कहता हूँ—ज़रूर जुड़ो और अपनी असली क्षमता को पहचानो।”

कक्षा से बाहर तक असर

ATLs का प्रभाव कक्षा की दीवारों तक सीमित नहीं है। माता-पिता अपने बच्चों में बड़ा बदलाव देख रहे हैं।अब वे सिर्फ किताबों से रटते नहीं हैं, बल्कि सोचते हैं, सवाल पूछते हैं और समाधान ढूँढते हैं। और यही कौशल उनके पूरे जीवन में काम आयेगा।

स्थानीय व्यवसाय भी इस बदलाव को नोटिस कर रहे हैं। वे छात्रों और स्कूलों से जुड़कर वास्तविक समस्याओं के लिए नए विचार मांग रहे हैं। इससे विजयवाड़ा में नवाचार का एक नया पारिस्थितिकी तंत्र बन रहा है।

ATLs कई छात्रों के लिए उद्यमिता की पहली सीढ़ी भी बन रही हैं। उपकरण, मार्गदर्शन और सहयोगी माहौल के साथ बच्चे अपने विचारों को प्रोटोटाइप में बदल रहे हैं।

आगे की राह: चुनौतियाँ और अवसर

विजयवाड़ा की ATLs ने बहुत प्रगति की है, लेकिन कुछ चुनौतियाँ अभी बाकी हैं:

व्यापक पहुँच: हर बच्चे तक ATL के अवसर पहुँचाना होगा। इसके लिए सरकार, स्कूलों और NGOs के बीच और मजबूत सहयोग चाहिए।

शिक्षकों का निरंतर प्रशिक्षण: लंबी अवधि की सफलता के लिए शिक्षकों में निवेश ज़रूरी है, ताकि वे ATLs को पाठ्यक्रम से सहज रूप से जोड़ सकें।

नवाचार की संस्कृति: बच्चों को सिर्फ औज़ार देना काफी नहीं है। उनमें ऐसी सोच भी विकसित करनी होगी जो प्रयोग, खोज और जोखिम को महत्व दे।

भविष्य की नींव

विजयवाड़ा की ATLs सिर्फ प्रयोगशालाएँ नहीं हैं। वे आशा हैं। ऐसी शिक्षा का मॉडल, जो जिज्ञासा जगाता है और बच्चों को सशक्त बनाता है। ATLs में निवेश करना मतलब (भविष्य में निवेश करना)। एक ऐसी पीढ़ी तैयार करना, जो कल की दुनिया के अनुसार सिर्फ ढलेगी नहीं, बल्कि उसे नया आकार भी देगी।

आइए, हर बच्चे को ATL की दीवारों के भीतर खोजने, बनाने और रचने का अवसर दें। क्योंकि, इन्हीं बच्चों की नवाचार-शक्ति में न सिर्फ विजयवाड़ा, बल्कि पूरी दुनिया को बदलने की क्षमता है।