युवा चैंपियन क्लाइमेट माग्रेशन के लिए उठा रहे प्रभावी कदम
ओडिशा में हजारों मछुआरों की आजीविका बहाल करने में की सहायता
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पचपन वर्षीय अशोक बेहरा का एक सपना था। मंगलाजोड़ी में अपने बच्चों और नाती-नातिनों के साथ बूढ़ा होने का एक सरल और संतोषजनक सपना। जलवायु परिवर्तन ने उनके बच्चों को मंगलाजोड़ी छोड़ने और भारत के विभिन्न हिस्सों में अपनी आजीविका कमाने के लिए मजबूर कर दिया था।
चौबीस वर्षीय डैनी बेहरा का भी एक सपना था। अपने सुरम्य मंगलाजोड़ी में वापस लौटना, ताकि वह और उसके बच्चे चिल्का झील में तैर सकें और जीवन भर प्रवासी पक्षियों से घिरे रह सकें।
अशोक और डैनी के सपने सच हो गए हैं। यूथ4वाटर अभियान, भारतीय ग्रामीण सेवा और यूनिसेफ के सहयोग से युवाओं के शानदार काम की बदौलत।
जलवायु परिवर्तन से आजीविका हुई प्रभावित, लोग पलायन के लिए मजबूर
मंगलाजोडी पूर्वी भारतीय राज्य ओडिशा के खोरधा जिले में चिल्का लैगून से जुड़ा एक आर्द्रभूमि है। इस आर्द्रभूमि के आसपास कई गांवों और बस्तियों में बड़ी आबादी रहती है। बेहरा जैसे 50 प्रतिशत से ज़्यादा लोग अपनी आजीविका के लिए चिल्का नदी में मछली पकड़ने पर निर्भर हैं।
जलवायु परिवर्तन, भारी गाद, कचरे के डंपिंग और बांस की घास की अधिकता के कारण चिल्का झील के सिकुड़ने का मतलब था कि अशोक बेहरा और उनके बच्चों को पलायन करना पड़ा और सूरत और चेन्नई जैसे दूरदराज के स्थानों पर कपास मिल श्रमिकों के रूप में अपना जीवन नए सिरे से शुरू करना पड़ा।
स्थानीय समुदायों को बाढ़ और चक्रवात जैसी अचानक आने वाली जलवायु संबंधी आपदाओं का भी सामना करना पड़ा। जो लोग पीछे रह गए, उन्हें भोजन के लिए पक्षियों का शिकार करना पड़ा, क्योंकि प्रदूषण और बांस की अधिकता ने मछली पकड़ने की गतिविधियों को बाधित कर दिया। इससे लैगून की प्रवासी पक्षी आबादी के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया।
"जब मैं छोटा था तो ऐसी स्थिति नहीं थी। जलवायु परिवर्तन ने सब कुछ बर्बाद कर दिया है। हमारे बच्चे सूरत और चेन्नई में शरणार्थियों की तरह रह रहे थे। मैं बस यही चाहता था कि मैं अपने बच्चों और उनके बच्चों के साथ अपने पैतृक स्थान पर बूढ़ा हो जाऊं।"
जलवायु परिवर्तन से लड़कर चिल्का झील को पुनर्जीवित कर रहे युवा
जलवायु प्रवासियों के सामने आने वाली समस्याओं के समाधान के लिए भारतीय ग्रामीण सेवा (IGS), व एक गैर-लाभकारी संगठन ने लोगों को आर्थिक प्रोत्साहन देने के लिए युवाओं को शामिल करते हुए पहल शुरू की है, ताकि उन्हें काम की तलाश में अपने घरों को ना छोड़ना पड़े।
2010 में, IGS ने मंगलाजोडी ईकोटूरिज्म की स्थापना की, जिसका मिशन युवाओं को भूजल संरक्षण और ईकोटूरिज्म सेवाओं में शामिल करना है।
यूनिसेफ समर्थित यूथ4वाटर के सहयोग से, इन हस्तक्षेपों ने जल संरक्षण, कायाकल्प और आजीविका सृजन पर ध्यान केंद्रित किया। ओडिशा में यूथ4वाटर अभियान 2019 में युवाओं तक पहुँचने और उन्हें वाश (जल, स्वच्छता और स्वास्थ्य) और जलवायु क्रियाओं में शामिल करने के लिए शुरू हुआ।
अपने इंटरेक्टिव वाश गार्जियन प्रशिक्षण मॉड्यूल, उद्यमिता समर्थन, नवाचार चुनौती और युवाओं द्वारा डिजाइन किए गए जागरूकता अभियानों के माध्यम से, यह अभिनव यूथ4वाटर अभियान हर युवा को वाश चेंज मेकर बनाता है।
युवाओं को समुदाय के लिए पारिस्थितिकी तंत्र और चिल्का झील में प्रवासी पक्षियों के संरक्षण के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। युवा चैंपियन यह भी सुनिश्चित करते हैं कि पर्यटक पर्यावरण को प्रदूषित न करें। ईकोटूरिज्म के बढ़ने के साथ, युवा स्थानीय लोगों को पर्यटक गाइड और ड्राइवर बनने के लिए भी प्रशिक्षित कर रहे हैं।
अशोक बेहरा पहले से ही अपनी परिधि में जलवायु परिवर्तन शिक्षा में शामिल थे। यूथ4वाटर अभियान के समर्थन से, उन्होंने ऐसे संकटों को कम करने के लिए एक संस्थान बनाने के लिए एक विविध समुदाय के ग्रामीणों को संगठित किया।
यूथ4वाटर अभियान युवाओं के लिए और युवाओं द्वारा चलाया जाने वाला एक मंच है। इस मंच से वर्तमान में एक लाख युवा जुड़े हुए हैं और इसमें ओडिशा के 17 भागीदार शामिल हैं।
अपने प्राकृतिक आवास की ओर वापसी
युवाओं के नेतृत्व वाली पहल शुरू होने के बाद से जलवायु प्रवास में बहुत कमी आई है। जैसे-जैसे स्थानीय रोजगार के अधिक अवसर सामने आए, जलवायु शरणार्थी धीरे-धीरे घर लौट आए। अशोक बेहरा अब साल के अधिकांश समय अपने परिवार के साथ रहते हैं। आज, मंगलाजोडी एक प्रतिष्ठित जल निकाय बन गया है जो स्थायी आजीविका, जिम्मेदार मछली पकड़ने, इकोटूरिज्म और बांस शिल्प का समर्थन करता है।
"हमारी आर्द्रभूमि हमारी माँ है। हमारे युवाओं की बदौलत, हमारी प्यारी झील अब साफ और सुरक्षित है। अब, आपको तटरेखा या आर्द्रभूमि के अंदर शायद ही कोई प्लास्टिक या कचरा मिलेगा," मंगलाजोडी की एक स्थानीय महिला नेता सात्विका कहती हैं।
लगभग 70 युवाओं ने अपनी सक्रिय भागीदारी से अपने बुजुर्गों के पदचिन्हों का अनुसरण किया है और उन्हें जल गुणवत्ता परीक्षण और भूजल मानचित्रण में प्रशिक्षित किया गया है। वे वेटलैंड चैनलों में स्वस्थ जल प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय सरकार के साथ ड्रेजिंग गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल हैं।
मंगलाजोडी के 24 वर्षीय डैनी बेहेरा कहते हैं, "जब हम चेन्नई से अपने गांव आए, तो मेरे पिता वहां काम नहीं कर सकते थे, क्योंकि उनकी उम्र बहुत अधिक थी। मैं अपने भरण-पोषण को लेकर थोड़ा तनाव में था। हालांकि, जलाशय की सुरक्षा के लिए समुदाय द्वारा की गई पहल ने मुझे पर्यटकों के लिए गाइड और नाविक बनने का मौका दिया। अब, मैं अपने परिवार के साथ रहता हूं और खुशी के हर पल का जश्न मनाता हूं।"
डैनी बेहेरा बचपन में साल में सिर्फ़ एक बार मंगलाजोडी आते थे और अपने परिवार के साथ मंगलाजोडी में कभी ज़्यादा समय तक नहीं रहे। इस खूबसूरत जलाशय ने उनके पूरे परिवार को सम्मान के साथ जीवन जीने का शानदार मौक़ा दिया है।
"कल्याण का अर्थ है आरामदायक, स्वस्थ और खुश रहने की स्थिति और हम यहां रहकर बहुत खुश हैं।"
पाखी सरकार - पक्षियों की सरकार
युवाओं के नेतृत्व वाली पहल ने पक्षियों के संरक्षण के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाई है और स्थानीय रोजगार पैदा किया है। पक्षियों का शिकार अंततः बंद हो गया, और इस क्षेत्र में प्रवासी पक्षियों की आमद में लगातार वृद्धि देखी गई।
41 वर्षीय डैनी बेहेरा कहते हैं, "चाहे हम औपचारिक रूप से शिक्षित हों या नहीं, हममें से अधिकांश लोग प्रत्येक पक्षी के नाम दिल से जानते हैं और आसानी से पर्यटकों का मार्गदर्शन कर सकते हैं।"
वे कहते हैं, "हम किसी राजनीतिक नेता द्वारा शासित नहीं हैं। हमारे पास 'पंखी सरकार' (पक्षियों की सरकार) है। पक्षी हमारे लिए सबकुछ हैं - जब वे यहाँ होते हैं, तो इसका मतलब है कि चिल्का झील अच्छी स्थिति में है। हम सभी यहाँ रहना जारी रख सकते हैं," वे उन आर्द्रभूमि के लोगों की भावनाओं को दर्शाते हैं जिनका पक्षियों के साथ गहरा रिश्ता है।
"कुछ साल पहले तक झील में आने वाले पक्षियों की संख्या घटकर मात्र 5,000-6,000 रह गई थी। अब हमारे प्रयासों से हमें हर साल छह लाख से ज़्यादा पक्षी मिलते हैं।"
लेखक के बारे में
स्टालिन नायक, पूर्वी भारतीय राज्य ओडिशा के छोटा नागपुर पठार के समुदाय के लिए समर्पित गैर-लाभकारी संस्था पैंटिस समूह चलाते हैं। वह युवाओं के साथ सामाजिक मुद्दों पर खुलकर आदिवासी समुदायों में भी काम करते हैं।