मेरी गंगा, मेरी जिम्मेदारी
स्वच्छ गंगा – स्वच्छ भारत के लिए हरिद्वार और ऋषिकेश के नागरिक उठा रहे कदम
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10 वर्षीय बच्चा, कॉलेज के छात्र, या बड़े-बुजूर्ग सभी आयु-वर्ग के लोग गंगा नदी की सफाई के लिए जागरूक हो रहे हैं। सार्वजनिक डंपिंग स्थलों और गंगा में बढ़ते प्लास्टिक कचरे के मुद्दे पर जागरुकता फैलाने के लिए अब हरिद्वार और ऋषिकेश के नागरिक अहम कदम उठा रहे हैं।
भारत की सबसे पवित्र नदी के तट पर बसे हरिद्वार और ऋषिकेष जीवंत व आध्यात्मिक शहर हैं। ये दोनों शहर सालाना लाखों सैलानियों की मेजबानी करते हैं। बढ़ते पर्यटन के कारण दोनों शहरों में प्लास्टिक कचरा भी बढ़ रहा है। इसका एक सबसे बड़ा कारण गीले व सूखे कचरे का अलग-अलग प्रबंधन ना करना भी है। जागरूकता की कमी के कारण पिछले साल तक हरिद्वार में 70% और ऋषिकेश में 90% घरों में एक ही डस्टबिन में गीले-सूखे दोनों तरह का कूड़ा डाला जाता था। अगर कूड़े का अलग-अलग निपटान किया जाये, तो प्लास्टिक को रीसायकल करने में मदद मिलती है।
प्रोजेक्ट अविरल ऐसी पहल है, जिसके तहत इस क्षेत्र में प्लास्टिक कचरे की बढ़ती समस्या का निपटारण किया जा सकता है। अविरल मिशन के जरिये युवा कचरा प्रबंधन प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए नगरपालिका अधिकारियों के साथ मिलकर स्थानीय निवासियों और सैलानियों के बीच जागरूकता बढ़ा रहे हैं।
इस पहल के जरिये युवाओं ने शहरी व ग्रामीण समुदायों में गीले व सूखे कचरे का अलग-अलग प्रबंधन करने में भारत सरकार के साथ अपनी आवाज का आह्वान किया है। इसके साथ ही ग्रामीण एरिया में पीने का स्वच्छ पानी, जल जीवन मिशन और जल स्त्रोतों को स्वच्छ बनाए रखने का आह्वान भी कर रहे हैं, ताकि पेयजल स्त्रोतों में कचरा ना मिलाया जाये।
इस पहल को शुरू करने के बाद से घरों में गीले व सूखे कचरे को अलग-अलग रखा जाने लगा। अब यहां के स्थानीय निवासी न सिर्फ स्वयं कचरा प्रबंधन बेहतर ढंग से कर रहे हैं, बल्कि अपने पड़ोसियों को भी इसके प्रति जागरूक कर रहे हैं। तीन बच्चों की मां स्वयंसेवक मीरा ना सिर्फ खुद बेहतर कचरा प्रबंधन करती है, बल्कि रोजाना 200 घरों का दौरा करके सभी के कचरे के प्रबंधन की निगरानी भी करती है। मीरा गर्व के साथ बताती हैं कि,
“गंगा नदी के प्रति ये सिर्फ मेरा जुनून नहीं है, बल्कि मेरा मानना है कि यह मेरी जिम्मेदारी है। हरिद्वार मेरा शहर नहीं बल्कि परिवार है। मैं जितने लोगों से मिलती हूं सबको अपना मानती हूं और हरिद्वार को स्वच्छ और हरा-भरा रखने के लिए मिलकर काम करती हूं।”
बच्चों ने अपने समुदाय में कचरा प्रबंधन में सकारात्मक बदलाव लाने में अहम भूमिका निभाई। रैलियां निकालने से लेकर, सफाई अभियानों में हिस्सा लेकर स्थानीय निवासियों और सैलानियों को साफ-सफाई और स्वच्छता की अहमियत समझाई। इसके साथ ही जागरूक करने वाले युवाओं को प्रोत्साहित पत्र भी बांटे गये, क्योंकि ये युवा चैपिंयन अपने हाथों में स्वच्छ भविष्य की बागडोर थामे हुए हैं।
हरिद्वार में डीएवी स्कूल के छात्रों ने रैली और सफाई अभियान का नेतृत्व किया, जहां उन्होंने रैली के जरिये गीले-सुखे मिक्स कचरे और खुले में डंपिंग के कारण होने वाली समस्याओं पर आमजन को जागरूक करने का काम किया। उन्होंने कचरा प्रबंधन में सुधार के फायदे भी बताये, जैसे कैसे छोटे-छोटे प्रयासों से सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है। खुले में पड़े कचरे से आवारा घुमने वाले मवेशी जैसे गाय आदि अक्सर प्लास्टिक की वस्तुओं को भोजन समझकर खा लेते हैं और मिक्स कचरा खुले में फैंकने से सफाईकर्मियों को इस कचरे की छंटनी करनी पड़ती है, जिसमें उनका समय और एनर्जी दोनों की व्यर्थ बर्बाद होती है।
डीएवी के एक छात्र ने बताया कि,
“मौजूदा हालातों से हम बहुत ज्यादा चितिंत हैं, क्योंकि नालियों के जरिए यह कचरा हमारी पवित्र नदी गंगा को अशुद्ध करता है। हम गायों को भोजन से लिपटे प्लास्टिक के पॉलिथिन खाते हुए देखते हैं। ऐसे कितने ही मुद्दे हैं जिनके बारे में हम जानते हैं, लेकिन यकीन नहीं होता कि हम इस बारे में सोचना तक नहीं चाहते। पहले हमें नहीं पता था कि आमजन को कैसे जागरूक किया जाए, लेकिन अविरल टीम के प्रशिक्षण प्रोग्राम के बाद हमें यह समझने में मदद मिली कि अपने चारों तक कैसे साफ-सफाई रखी जाये और दूसरों के स्वच्छता के प्रति कैसे जागरूक किया जाये। अब हमें भरोसा है कि हमारे प्रयासों से हम अपने शहर को स्वच्छता की नई ऊंचाईयों तक लेकर जाएंगे।”
इस परियोजना के तहत प्रत्येक वार्ड में क्लब स्थापित किए गए हैं, जिसमें बच्चों के लिए स्वच्छता संबंधी विषयों पर सत्र आयोजित किए जाते हैं। प्रशिक्षण के बाद बच्चे फील्ड सुपरवाइजरों की मदद से सामुदायिक गतिविधियों में भाग लेते हैं, जिसमें रैलियां, सफाई अभियान, नारे लगाना और दीवार पर पेंटिंग करना आदि शामिल है।
अनौपचारिक सफाई कर्मचारी या जिन्हें हम "सफाई मित्र" के नाम से भी जानते हैं, वह भी प्लास्टिक कचरे को कम करने की लड़ाई में अब चैंपियन की तरह सामने आ रहे हैं। किसी भी स्वच्छ शहर की रीढ् वहां के सफाई कर्मचारी होते हैं। जो घर-घर जाकर लोगों के इकट्ठा किये गये कचरे को छांटकर लाते हैं। अक्सर घरों में एकत्रित किया गया कचरा आमतौर पर गीला-सुखा मिक्स होता है।
जो इन सफाई कर्मचारियों की सेहत के लिए भी हानिकारक होता है, क्योंकि कचरे में उन्हें टूटे हुए कांच, गंदे सैनिटरी नैपकिन, डिस्पोजेबल आदि भी मिलते हैं। इसीलिए इस पहल का मकसद हरिद्वार और ऋषिकेश में सफाई कर्मियों के स्वास्थ्य और सुरक्षा को बढ़ावा देना भी है। प्रशिक्षण कार्यशालाओं, चिकित्सा शिविरों, बुनियादी ढांचे में सुधार, पर्सनल सेफ्टी उपकरणों के वितरण के बाद अब सफाईकर्मियों को पहले से ज्यादा सुरक्षित माहौल मिला है।
सफाईकर्मी विजय बताते हैं कि,
“पहले ज्यादात्तर घरों से हमें मिक्स गीला-सुखा कचरा ही मिलता था, जिसकी छंटनी करके रिसाइकिल करने लायक प्लास्टिक को अलग करना एक चुनौती बन जाता था। कुछ मजदूरों के हाथ तक कट जाते थे, क्योंकि कचरे में ढ़ेरों कांच के टुकड़े मिलते थे। अब हम गीले-सुखे कचरे को अलग करने की अहमियत को समझते हैं और लोगों को भी इसके लिए जागरूक करते हैं। अब हमारे कचरे को एकत्रित करने वाले वाहनों में अलग-अलग कचरे के लिए अलग-अलग डिब्बे होते हैं, जिससे कचरे को छंटनी करके डालना आसान होता है। हमें दस्ताने, फेस मास्क और जूते भी दिये गये हें, जो मिक्स कचरे से निपटने में हमारी मदद करते हैं। कचरा प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए और भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है, लेकिन यह एक अच्छी शुरुआत है। हमें उम्मीद है कि हर कोई यह समझेगा कि अपने शहरों को साफ़ बनाने की ज़िम्मेदारी हम सभी की है और केवल साथ मिलकर ही हम स्वच्छ भारत के सपने को साकार किया जा सकता है।”
अविरल एक पायलट प्रोजेक्ट है, जो प्लास्टिक वेस्ट को खत्म करने के लिए एलायंस (एलायंस) द्वारा संचालित किया गया है और इसे साहस एनजीओ और वेस्ट वॉरियर्स सोसाइटी के सहयोग से डॉयचे गेसेलशाफ्ट फर इंटरनेशनेल ज़ुसामेनारबीट (जीआईजेड) जीएमबीएच द्वारा शुरू किया गया है। इस परियोजना का उद्देश्य हरिद्वार और ऋषिकेश में पर्यावरण के लिए नुकसानदेह प्लास्टिक कचरे को कम करना है।
यूनिसेफ भारत सरकार के सहयोग में 15 राज्यों में स्वच्छ भारत मिशन और जल जीवन मिशन को लागु करवाने में तकनीकी भागीदार है।
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https://www.unicef.org/india/what-we-do/clean-drinking-water