बच्चों के अनुकूल विद्यालय : बाल मस्तिष्क को जागृत करना

प्रेरणा की आवश्यकता किसे नहीं होती? जैसा कि खोसपोरा और रावतपोरा के सरकारी स्कूल में देखने को मिला, न केवल छात्र, बल्कि उनके अध्यापक भी किसी जोश (स्पार्क) की चाहत में दिखे।

अजरा परवीन रहमान
Children playing cricket in classroom.
UNICEF India/2019/Mukherjee
22 मार्च 2019

आम तौर पर शांत रहने वाले 15 वर्षीय जामिद कयूम की आँखें उस वक्‍त चमक उठती है जब कोई उससे पूछता है कि वह स्कूल जाना क्‍यों पसंद करता है। वह बिना किसी संदेह के कहता है- क्रिकेट। उसने आत्‍मविश्‍वास भरी आवाज में कहा, "मैं स्कूल की क्रिकेट टीम में ऑलराउंडर हूं।" जामिद ने एक वर्ष पहले स्कूल जाना छोड़ दिया था, लेकिन स्कूल के शिक्षकों द्वारा किए गए अथक प्रयासों के बाद, वह वापस लौट आया। पीछे छूटने का एहसास होने के बजाय, जामिद को अब पहले से कहीं ज्यादा स्कूल आना पसंद है। इसका रहस्य प्रदान की गई नई स्‍पोर्ट्स किट में छिपा है – जो यूनिसेफ और आईकेईए फाउंडेशन द्वारा समर्थित अनेक पहलों में से एक है, जिससे बडगाम जिले में रावतपोरा का सरकारी माध्‍यमिक विद्यालय मॉडल चाइल्ड फ्रेंडली स्कूल बन गया है।

मनो-सामाजिक सहायता के रूप में खेल एक माध्‍यम

पर्याप्त वैज्ञानिक अनुसंधान उलब्‍ध हैं जो बच्चे के समग्र विकास में खेल के फायदों की ओर इशारा करते हैं। स्वास्थ्य लाभ के साथ-साथ, खेल आत्मविश्वास पैदा करता है, टीम भावना, लचीलापन और जीवन के कौशल सिखाता है और ऊर्जा को सकारात्मक मार्ग प्रदान करने में मदद करता है। जम्मू और कश्मीर में, सरकार द्वारा संचालित 250 स्कूल मॉडल चाइल्ड फ्रेंडली स्कूल के रूप में काम कर रहे हैं। क्रिकेट मैदान से जामिद को जो सकारात्मक ऊर्जा और आत्मविश्वास मिलता है उससे उसका दिमाग कक्षा में उत्सुक रहता है, वह चुनौतियां स्‍वीकारने और अपने शिक्षकों से सीखने के लिए तैयार रहता है।

स्‍पोर्ट्स किट बच्‍चों में रुचि उत्‍पन्‍न करती है, जो पढ़ाई के लिए आवश्‍यक है, उसके स्‍कूल के एक शिक्षक ने बताया।

कक्षा में बच्चे।
UNICEF India/2019/Mukherjee कक्षा में बच्चे।

जामिद के चाइल्‍ड फ्रेंडली जैसे स्‍कूल की कक्षा में क्रिया-कलाप आधारित शिक्षण तरीकों का इस्‍तेमाल करते हैं, जो बच्‍चों को शिक्षण प्रक्रिया के केन्‍द्र में रखते हैं और उन्‍हें प्रक्रिया में शामिल करते हैं।

नवाचारी शिक्षण विधियों से संबंधित शिक्षक प्रशिक्षण

पीरजादा जावेद डार, सरकारी मिडिल स्कूल खोसपोरा, जो कि एक मॉडल चाइल्ड फ्रेंडली स्कूल भी है, में एक शिक्षक हैं – ने बताया कि जब उन्होंने यूनिसेफ-आईकेईए फाउंडेशन के सहयोग से चलाए गए शिक्षक प्रशिक्षण में भाग लिया तो वे एक नया दृष्टिकोण लेकर बाहर निकले।

“प्रशिक्षण के बारे में मुझे सबसे अच्‍छी बात यह लगी कि क्‍लासरूम शिक्षण के लिए यह बहुत अधिक उपयुक्‍त था। क्रिया-कलाप आधारित इन शिक्षण विधियों ने उपयुक्‍त माहौल बनाने में मदद दी और बच्‍चों ने खेलने और मजेदार तरीके से पढ़ाई की। यह ऐसा था जैसे छात्रों में अचानक नयी जान फूंक दी गई हो.... वे क्‍लास से बाहर नहीं जाना चाहते।”

अपने निजी अनुभव के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा, “जब मैं अपनी बैचलर ऑफ एजुकेशन डिग्री की पढ़ाई कर रहा था, तो विशेष ध्‍यान अभ्‍यास योजनाएं बनाने पर रहता था। । लेकिन जब से हमें इन अवधारणाओं [क्रिया-कलाप आधारित शिक्षा] से अवगत कराया गया, शिक्षकों और छात्रों के बीच विश्वास और मित्रता का संबंध विकसित हुआ और शिक्षण और अधिक प्रभावी हो गया है।”   

कक्षा के बाहर ताली बजाते बच्चे।
UNICEF India/2019/Mukherjee कक्षा के बाहर ताली बजाते बच्चे।

प्रभावी शिक्षण में शिक्षकों की मदद और बच्चों के बीच सीखने को बेहतर बनाने के लिए – चाइल्‍ड फ्रेंडली स्कूलों को प्रारंभिक शिक्षण किट प्रदान की गई जिसमें अंग्रेजी भाषा और गणित का शिक्षण शामिल है।

उसी स्कूल के एक अन्य शिक्षक मोहम्मद अशरफ डार  ने कहा, “मैं गणित पढ़ाता हूं और मेरे करियर के अधिकांश भाग में ब्लैकबोर्ड पर लिखकर पढ़ाई कराने पर निर्भर करता था। तथापि, मैं देख रहा हूं कि गणित किट के मॉड्यूल से बच्चे अवधारणाओं को बेहतर ढंग से समझने में सक्षम हो रहे हैं।”

बुनियादी अवधारणाएं समझना वह आधारशिला है जिस पर बच्‍चे भविष्‍य में अधिक जटिल अध्‍यायों को समझ सकते हैं।

युवाओं के मन को प्रज्वलित करना  

खोसपोरा में चाइल्ड फ्रेंडली स्कूल की कक्षा 8 में पढ़ने वाली छात्रा सबरीना ने कहा कि उन्‍हें गणित उबाऊ लगता था। उन्‍होंने बताया, “लेकिन अब मुझे यह मजेदार लगता है। ज्यामिति मेरा पसंदीदा टॉपिक है और मुझे गणित के समीकरण हल करना अच्‍छा लगता है।”

अध्‍यापकों ने नोट किया कि बच्चों के पढ़ने के तरीकों में इन नवाचारी बदलावों से बच्‍चों को अब पढ़ने और खेलने के लिए पर्याप्‍त अवसर मिलते हैं जिससे कक्षा में खुशनुमा माहौल रहता है। हमारी यात्रा के दिन उत्साह स्पष्ट दिखाई दे रहा था – वह मार्च की एक ठंडी, बर्फीली सुबह थी जब बच्‍चे फेरन (सर्दियों की पारंपरिक कश्मीरी पोशाक) पहनकर अपनी कक्षाओं में जा रहे थे तो मौसम की कठोरता उनकी हंसी और बातचीत के ठीक विपरीत थी।

कक्षा 8 की एक लड़की आशिफा ने कहा, “घर पर हम लड़कियों से वयस्‍कों की तरह व्यवहार करने और घर के कामकाज करने की अपेक्षा की जाती है। स्‍कूल में हम खेलने, दोस्‍तों से बाते करनें और मजेदार चीजें करने के लिए स्‍वतंत्र होते हैं। इसलिए मुझे स्‍कूल आना अच्‍छा लगता है।”

कक्षा 5 के एक छोटे से लड़के तनवीर ने बताया, “मुझे स्‍कूल के क्रिकेट मैचों की कॉमेंटरी करना अच्‍छा लगता है। बड़ा होकर में जर्नलिस्‍ट अथवा रेडियो जॉकी बनना चाहता हूं।”

कक्षा में ज्यामिति सीखने वाले बच्चे।
UNICEF India/2019/Mukherjee कक्षा में ज्यामिति सीखने वाले बच्चे।

जिन बच्‍चों ने स्‍कूल छोड़ दिया था अध्‍यापक उन्‍हें वापस स्‍कूल लेकर आए।

शिक्षकों की भूमिका केवल स्कूल परिसर की चारदीवारी तक ही सीमित नहीं है। यहां स्कूली बच्चों का स्‍कूल से अनुपस्थित रहना बड़ी समस्या है। रावथपोरा के स्कूल के मुख्य शिक्षक, आरिफ रशीद डार ने कहा, “बच्चे घर का काम करने अथवा बाहर काम करके परिवार की आय में हाथ बंटाने के लिए स्कूल नहीं आते।”

यदि कोई बच्चा अचानक स्कूल आना बंद कर दे, तो शिक्षक उनके परिवार से मिलने जाता है और माता-पिता को तब तक समझाते हैं जब तक वे अपने बच्चे को स्कूल भेजने के लिए रजामंद नहीं हो जाते। जामिद भी ऐसा ही बच्चा था। मुख्‍य अध्‍यापक ने कहा, जब उसने एक वर्ष पहले स्कूल आना बंद कर दिया तो मैं उसके घर गया और उसके माता-पिता से बात की। ग्राम शिक्षा परिषद ने भी ऐसा ही किया। अंतत:, वह वापस स्‍कूल आ गया और अब वह स्कूल में आकर बहुत खुश है।”

ग्राम शिक्षा परिषद छात्रों के माता-पिता और शिक्षा विशेषज्ञों सहित 14 सदस्यों का निकाय है जो नियमित अंतराल पर बैठक करते हैं और स्कूल और समुदाय के बीच संचार के “सेतु” के रूप में कार्य करते हैं।

अशरफ डार ने बताया कि शिक्षक के रूप में उनका दिन स्कूल के निर्धारित समय से बहुत पहले शुरू हो जाता है। उन्होंने कहा, “प्रत्‍येक सुबह स्कूल आने से पहले, मैं यह सुनिश्चित करने के लिए पांच या छह घरों में जाता हूं कि बच्चे स्‍कूल आएं।”

उस समय एक अध्‍यापक की खुशी की कल्पना कीजिए जब स्‍कूल छोड चुका कोई बच्चा कहता है कि उसे अब स्कूल आना अच्‍छा लगता है। जामिद प्रत्‍येक बार जब बाहरी लोगों से कहता है, "मुझे स्‍कूल आना और अपने शिक्षकों से बेहतर क्रिकेट खेलना पसंद है!" तो उसके शिक्षकों की आंखों में जामिद से अधिक खुशी होती है।

"मुझे अपने शिक्षकों से बेहतर स्कूल आना और क्रिकेट खेलना पसंद है!" उनकी आंखों में जितनी खुशी है, उससे ज्यादा वह कल्पना कर सकते हैं।