पृथ्वी दिवस विशेष: कचरा प्रबंधन में निवेश
कचरा बीनने वालों के एक समूह ने दिखाया कचरा भी हो सकता है आजीविका का साधन, कचरे को रिसाइकल कर बनाई कम लागत वाली उपयोगी सामग्री
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बर्बादी ही धन है। यह हम महाराष्ट्र के ठाणे जिले की कचरा बीनने वाली महिलाओं से सीख सकते हैं। यह महिलाएं एक गैर लाभकारी संस्था SBV समर्थ भारत व्यासपीठ की पहल में शामिल हुई। इस पहल ने कई महिलाओं की जिंदगी को बदल दिया, अब कचरे को देखने के प्रति लोगों का नजरिया बदल गया है।
यह गैर सरकारी संस्था 3-4 कूड़ा बीनने वाली महिलाओं को रोजगार मुहैया कराने की पहल के साथ शुरू हुई थी। देखते ही देखते कचरा प्रबंधन की यह पहल एक जर्नी बन गई, जो आज समुदाय के एक लाख से अधिक घरों को रोजगार दे रही है। इसमें 60,000 से अधिक बच्चों जुड़े हुए हैं और 24 महिलाएं कार्यरत हैं। हर ग्रुप रोजाना करीब 30 टन कचरे को डंप होने से रोकता है।
इस पहल की शुरूआत से सफलता की कहानी
एसबीवी के सीईओ श्री भातू सावंत ने बताया कि यह इसीलिए संभव हो पाया, क्योंकि यह महिलाएं कचरा बीनना छोड़कर कोई अन्य रोजगार को करने को लेकर सहमत नहीं हुई। ये महिलाएं अपना घर चलाने के लिए रोजाना मिलने वाले मेहनताने पर निर्भर थी, क्योंकि इनके पास कोई बचत नहीं थी और इन्हें कई कर्ज भी चुकाने थे। ऐसे में इनके लिए मासिक आय वाली नौकरी पर स्विच करना संभव नहीं था। इसीलिए इन्होंने हमसे अधिक कचरे की मांग करना शुरू कर दिया।
स्थानीय नगर निगम के साथ साझेदारी
इन महिलाओं की मांग सुनकर और इनकी पारिवारिक स्थिति व चिंता को देखते हुए एसबीवी ने अधिक कचरे के लिए नगर निगम ठाणे का सहयोग लिया। वरना नगर निगम से कचरा सीधा डंप में चला जाता है और पर्यावरण को अधिक दूषित करता है। एसबीवी निगम के सहयोग से कचरा खरीदने और कचरा प्रबंधन केंद्र में कूड़ा बीनने वाली महिलाओं को इसके पृथक्करण के लिए नियुक्त करने में कामयाब रहा।
इन्हीं महिलाओं में एक 25 वर्षीय पूनम है। जो पहले एक डंपिंग ग्राउंड से कचरा चुनकर बेचती थी। पांच साल पहले डंपिंग ग्राउंड बंद होने के बाद पूनम का रोजगार छिन गया। अब पूनम एसबीवी के साथ उनके केंद्र में सिक्योर आय के साधन के साथ सेफ्टी से काम करती है। पूनम कहती हैं कि,
“हम सार्वजनिक जगहों से कूड़ा एकत्रित करके उन्हें अलग-अलग करते हैं। हम इसे एसबीवी के संयंत्र में करते हैं। हमारी जीवनशैली पहले से काफी बेहतर हुई है। SBV हमें गैस और बिजली कनेक्शन प्राप्त करने में भी मदद कर रहा है।”
पूनम जैसी जाने कितनी ही महिलाएं हैं जो आजीविका के लिए कचरा बीनने पर निर्भर हैं। नगर निगम के नगर आयुक्त डॉ. विपिन शर्मा बताते हैं कि, “ठाणे एक बड़ा भीड़भाड़ वाला व्यस्त शहर है, यहां कचरा प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। यहां लगभग हर रोज 1000 टन कचरा निकलता है
विकेंद्रीकृत पृथक्करण और एकीकृत अपशिष्ट प्रबंधन अब समय की मांग बन चुका है। हमने एक एकीकृत अपशिष्ट प्रबंधन केंद्र स्थापित करने के लिए एसबीवी का सर्मथन किया। हम इस केंद्र में प्रतिदिन बगीचे के कचरे से उत्पादित लगभग एक टन ब्रिकेट का उपयोग अपने टीएमसी (कलवा) अस्पताल के लिए भी करते हैं।''
एसबीवी (SBV) कचरा प्रबंधन केंद्र में एक ही जगह पर गीला, सुखा, फूलों का कचरा, बगीचे का कचरा आदि सभी तरह के कचरे को छांटकर अलग किया जाता है।
यह सभी तरह के कचरे को पुनर्चक्रण (कचरे को नई सामग्रियों और वस्तुओं में परिवर्तित करने की प्रक्रिया है)। एसबीवी के निदेशक उल्हास कार्ले ने बताया कि, “हमारी पॉलिसी रियूज, रिसायकल और रिवाइटलाइज पर काम करती है।”
लोगों में गीले-सुखे कचरे का अलग निपटान की जागरूकता बढ़ाना
हालांकि शुरूआत में कई परेशानियां आई। जैसे दोबारा इस्तेमाल करने लायक कचरा बहुत ही कम था, क्योंकि लोगों को कचरा फैंकने से पहले इस्तेमाल करने योग्य कचरे को अलग से फैंकने की आदत नहीं है। कार्ले ने बताया कि,
“हमने लोगों से अनुरोध किया कि वह सुखे कचरे (प्लास्टिक के बक्से, बैग, धातु आदि) को अलग को अलग रखे और हफ्ते में एक बार कचरा बीनने वाली महिला को दें। हालांकि ज्यादात्तर लोगों के लिए यह काम बहुत ही असुविधाजनक था, लेकिन धीरे-धीरे लोगों ने हमें सहयोग करना शुरू किया।”
जो लोग पर्यावरण के प्रति जागरूक हैं और जो महिलाओं की मदद करना चाहते है वह आगे आए और अपने घरों में कचरा अलग करने के लिए सहमत हुए।
“शुरुआत में सिर्फ 10 से 12 लोग ही इस मुहिम के साथ बने, धीरे-धीरे यह कारवां बढ़ता गया और आज साढ़े चार बाद हमने 1 लाख परिवारों को अपनी इस मुहिम का हिस्सा बना लिया है। यह परिवार अब दो सप्हात तक कूड़ा बीनने वाली महिलाओं के लिए अपने घरों में दोबारा इस्तेमाल में आ सकने वाले कचरे को बचाकर रखते हैं।”
सबका साथ - सबका विकास
रिसाइक्ल्ड अर्थ ऐप की मदद के बिना इस तरह की प्रोग्रेस संभव नहीं थी। इस ऐप को एसबीवी के पार्टनर, बार्किंग डियर एंटरटेनमेंट के सहयोग से बनाया गया है। पहले हम व्हाट्सऐप ग्रुप का इस्तेमाल कचरा एकत्रित करने के लिए करते थे, लेकिन जब लोगों की संख्या बढ़ी तो व्हाट्सएप ग्रुप से काम चलना मुश्किल हो गया। ऐसे में अर्थ ऐप ने एसबीवी टीम के लिए अलग-अलग जगहों पर सूखा कचरा उठाने का समय निर्धारित किया।
ऐप का इस्तेमाल करने वालों को कचरा उठाने वाली गाड़ी के समय और स्थान के बारे में पहले से सूचना दे दी जाती है। जिससे कचरे को समय पर विभिन्न स्थानों से एकत्रित कर लिया जाता है। इन तकनीकी उपकरणों के जरिए ही केंद्र के लिए अपनी सेवाओं का विस्तार करना सुविधाजनक हुआ। अब कई तरह के कचरे की रीसाइक्लिंग करके रियूज के लायक बनाया जाता है, जैसे प्लास्टिक से पॉलीफ्यूल, बगीचे के कचरे से ब्रियूट, और फूलों के कचरे से खाद इत्यादि।
कचरे को सुंदर मुल्यवान चीजों में बदलना
इसके बाद एसबीवी ने कचरे के बारे में लोगों का नजरिया बदलने का फैसला लिया। टीम ने कचरे को गंदी चीजों को इस्तेमाल करके उन्हें सुंदर मुल्यवान चीजों में बदलकर लोगों को हैरान कर दिया। उन्होंने कचरा प्रबंधन केंद्र को एकीकृत केंद्र के रूप में सैटअप कर दिया, अब यहां सेमिनार, कार्यशालाएं, स्कूल-कॉलेज के छात्रों की आमने-सामने की डिबेट जैसे कचरा प्रबंधन जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाते हैं। कार्ले कहते हैं कि,
“जैसे-जैसे पहल बड़ी होती गई, हम नहीं चाहते थे कि हमारा केंद्र सिर्फ एक कचरा प्रबंधन केंद्र के रूप में देखा जाए, बल्कि लोग इसे एक ज्ञान केंद्र के रूप में पहचाने। इसलिए, हमने कचरे से इस्तेमाल करके बनाई गई सुंदर और मुल्यवान चीजों से केंद्र के सौंदर्यीकरण के विचार के साथ इसकी शुरुआत की।”
केंद्र का सौंदर्यीकरण भी उन बच्चों ने किया जो सप्ताहांत में केंद्र में कचरा प्रबंधन को देखने, इसके बारे में सीखने और जागरूकता फैलाने के लिए आते थे। 15 वर्षीय राशि शाह ने बताया कि,
“मैं कचरे का रियूज करके नई चीजें बनानी सीखने के लिए केंद्र में आई थी। मैंने बर्तनों और टायरों की पेंटिंग करके इस जगह के सौंदर्यीकरण में मदद की। मैंने तीन महत्वपूर्ण बातें सीखीं - हमें कचरे का पुनर्चक्रण करना चाहिए, हमें कचरे को अलग करना चाहिए, और हमें पृथ्वी को बचाना चाहिए।''
सौंदर्यीकरण के अलावा स्कूली बच्चे केंद्र की स्क्रैप लाइब्रेरी को व्यवस्थित करने में मदद करते हैं। इस स्क्रैप लाइब्रेरी में बहुत सारा ई-कचरा, मॉनिटर, कलाकृतियां, किताबें, इलेक्ट्रॉनिक्स, संगीत वाद्ययंत्र और लोगों द्वारा दान की गई अन्य स्क्रैप वस्तुएं होती हैं। बच्चे आकर इन्हें बड़े करीने से व्यवस्थित करते हैं और भविष्य में उपयोग के लिए लेबल लगाते हैं।
यूनिसेफ की भूमिका
यूनिसेफ द्वारा अखिल भारतीय स्थानीय स्वशासन संस्थान (एआईआईएलएसजी) मुंबई के क्षेत्रीय शहरी और पर्यावरण अध्ययन केंद्र (आरसीयूईएस) के सहयोग से स्थापित महाराष्ट्र शहरी वॉश और पर्यावरण स्वच्छता गठबंधन एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यूनिसेफ सुनिश्चित करता है कि जल और स्वच्छता सेवाओं आम लोगों की पहुंच हो।
यूनिसेफ, एआईआईएलएसजी और आरसीयूईएस का यह गठबंधन समर्थ भारत व्यासपीठ जैसे समाजसेवा व्यापी केंद्रों के काम को सुविधाजनक बनाने के लिए समर्थन करता है। क्योंकि यह केंद्र जो महाराष्ट्र में शहरी वॉश और पर्यावरण स्वच्छता में काम कर रहे हैं।
सचिवालय के निदेशक उत्कर्षा कवाड़ी ने बताया कि, “कचरे के अवैज्ञानिक और अनुपचारित डंपिंग के कारण रोगजनक जल निकायों में चला जाता है। जिसके जरिए वह हमारे खान-पान में भी शामिल हो जाता है। ठाणे नगर निगम के सहयोग से समर्थ भारत व्यासपीठ की निरंतर पहल ऐसे कचरा प्रबंधन मुद्दों पर काम करके स्वच्छता का अच्छा मॉडल पेश कर रही है।”
यूनिसेफ महाराष्ट्र के वॉश स्पेशलिस्ट और डीआरआर-सीसीईएस केंद्र बिंदु यूसुफ कबीर का मानना है कि, “जो हमें मिला है उसे हमें आगे आने वाली पीढ़ियों को सौंपना चाहिए। कचरा प्रबंधन न केवल पृथ्वी पर स्वच्छता फैलाएगा, बल्कि यह हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक निवेश की भांति है।”
सरकार, स्थानीय प्रशासन, विकास संगठन और निवेशक बताते हैं कि,“स्वच्छ भारत मिशन के शुभारंभ के साथ हमने शहरी क्षेत्रों में 'कचरा मुक्त शहर' विकसित करने और ग्रामीण क्षेत्रों में सूखा और गीला कचरा प्रबंधन में सुधार करने पर ध्यान दिया।”
यूनिसेफ स्कूलों में प्लास्टिक बैंकों जैसे नए बदलावों पर काम करता है। यह बच्चों और युवाओं में नए इनवेंशन से जागरूकता बढ़ाता है। यूनिसेफ महाराष्ट्र ने सीएसीआर और ब्लू प्लैनेट जैसे भागीदारों के साथ मिलकर 25,000 स्कूली बच्चों को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में टिकाऊ शिक्षा को शामिल करने के लिए एक कार्यक्रम शुरू किया है।
ब्लू नज एक ऐसी तकनीक है जो विद्यार्थियों को संसाधनों का कुशलतापूर्वक उपयोग करने और प्लास्टिक के संग्रह में उनके प्रयासों के लिए प्लैनेट वॉरियर प्रमाणन अर्जित करना सिखाती है। इसके बदले में, स्कूलों को पुनर्नवीनीकरण स्कूल बेंच, कचरा डिब्बे और हाथ धोने के स्टेशन मिलते हैं।
इसके साथ ही, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन विभाग, जीओएम ने यूनिसेफ महाराष्ट्र, सीईई पुणे और आरसीयूईएस, मुंबई के तकनीकी सहयोग से महाराष्ट्र राज्य के तहत निचले और मध्य-प्राथमिक विद्यालयों के लिए एक गतिविधि-आधारित जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण पाठ्यक्रम विकसित किया है।
यूनिसेफ भारत सरकार के समर्थन में 15 राज्यों में स्वच्छ भारत मिशन और जल जीवन मिशन को लागू कराने के लिए तकनीकी भागीदार है। यूनिसेफ के काम के बारे में अधिक पढ़ने के लिए कृपया यहां क्लिक करें:
https://www.unicef.org/india/what-we-do/clean-drinking-water