नवजातों को उम्मीद की सांसें देती विशेष नवजात देखभाल इकाईयां

देशभर में 1,000 से अधिक कमजोर नवजात शिशुओं को बचाती और माता-पिता के जीवन में आशा की किरण जगाती विशेष नवजात देखभाल इकाइयां (एसएनसीयू)

आरिफा शर्मिन
A new mother in a hospital gown, surgical cap, and face mask holds her sleeping newborn close to her chest in a maternity ward, practicing skin-to-skin care.
UNICEF/UNI683379/Chakravarty
13 दिसम्बर 2024

अस्पताल के गलियारे से गुजरते हुए ललिता बाई का दिल तेजी से धड़क रहा है। भोपाल के गुना जिले के सरकारी अस्पताल में विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाई (एसएनसीयू) में पिछले 12 दिनों से ललिता का नवजात शिशु एडमिट है। नर्सों की देखभाल और मशीनों के बीच उसका नवजात शिशु जीवन के लिए संघर्ष कर रहा है। हर रोज ललिता अपने बच्चे के पास खड़ी होकर उसके छोटे हाथों और नन्हें माथे को छूकर देखती है। वह प्यार भरे शब्द अपने बच्चे के लिए फुसफुसाती है।

आज ललिता जब कमरे में पहुंची तो उसे कुछ अलग महसूस हुआ। उसे लगा कि जैसे उसका बच्चा उसका इंतजार कर रहा है। वह इनक्यूबेटर के पास पहुंची और उसने अपने सांसें रोककर नन्हें शिशु के हाथ को छुआ। अपने बच्चे को छूते हुए ललिता की उंगलियां मानो कांप रही थी। 

जब उसने अपने बच्चे को छुआ तो जन्म के बाद 12 दिन के लंबे इंतजार के बाद पहली बार उसने आंखें खोलकर अपने हाथों से हरकत की। ललिता हांफने लगी और उसकी आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे। वह हैरानी से अपने बच्चे को हाथ हिलाते हुए देख रही थी। यह किसी जादू से कम नहीं था ललिता के लिए। 

यह छोटी सी मूवमेंट आने वाले बेहतर दिनों का मानो एक वादा हो। वह बच्चे के करीब झुकी और अपने दिल में ढेर सारा प्याल लिए वह फुसफुसाई "मेरा बच्चा" (मेरा बच्चा)!

यहां ललिता सिर्फ अकेली नहीं है, बल्कि ममता और बिवोद की छोटी बच्ची भी एसएनसीयू में थी। क्योंकि, उसका जन्म भी समय से पहले हो गया था। 16 दिन के लंबे इंतजार के बाद आज बच्चे को वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। बिवोद ने बताया कि, “यह हमारी पहला बच्चा है, हमें तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि यह जिंदा भी बच पाएगी या नहीं। लेकिन, डॉक्टरों और नर्सों के समर्पण और सहयोग की बदौलत ही बच्ची को बचाया जा सका और आज हम अपने घर बच्चे को गोद में लेकर वापिस लौट रहे हैं।”

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UNICEF A Breath of Hope

माता-पिता के लिए आशा की किरण बनी एसएनसीयू

आज देशभर में एसएनसीयू हजारों नवजात शिशुओं की जान बचा रहे हैं। वर्ष 2003 में पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में छोटे छोटे कदमों के साथ इस पहल की शुरूआत की गई थी। भारत में नवजात शिशुओं की मृत्यु दर को कम करने के लिए ही पहली 12-बेड वाली बीमार और नवजात देखभाल इकाई की स्थापना की गई। यह यूनिसेफ, सोसाइटी फॉर एप्लाइड स्टडीज, कोलकाता (एसएएसके) - एक शोध संगठन, जिला स्वास्थ्य और परिवार कल्याण समिति और जिला परिषद, पुरुलिया के आपसी सहयोग से शुरू की गई पहल है।

यूनिसेफ इंडिया के अनुभाग प्रमुख (ओआईसी) और स्वास्थ्य विशेषज्ञ विवेक वीरेंद्र सिंह कहते हैं कि, “इस पायलट प्रोजेक्ट के कारण एसएनसीयू सुविधा में नवजातों की मृत्यु दर में काफी कमी आई है। इसकी वजह से जनसंख्या में नवजात मृत्यु दर में आई कमी पर भी सीधा प्रभाव पड़ा है। इससे यह भी साबित हुआ कि सरकारी क्षेत्र में बीमार और छोटे नवजात शिशुओं के लिए अत्याधुनिक देखभाल जिला स्तर पर प्रदान की जा सकती हैं।”

SNCUs saved the lives of thousands of babies across India through 1054 centres across the country. UNICEF/2024/ Saurabh Chakravarty
UNICEF/UNI683376/Chakravarty SNCUs saved the lives of thousands of babies across India through 1054 centres across the country.

मिसाल पेश करता मध्य प्रदेश

“एक विशाल भौगोलिक क्षेत्र होने के कारण मध्य प्रदेश को नवजात शिशुओं की मृत्यु से निपटने में चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। यूनिसेफ के सहयोग से, सरकार ने 2007 में गुना जिले में राज्य का पहला एसएनसीयू स्थापित किया, उसके बाद शिवपुरी में एक और एसएनसीयू स्थापित किया।'' डॉ. हिमानी यादव, उप निदेशक, बाल स्वास्थ्य, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, मध्य प्रदेश सरकार। .

एसएनसीयू इकाई आवश्यक उपकरणों और प्रशिक्षित बाल रोग विशेषज्ञों और नर्सों के साथ-साथ अन्य सहायक कर्मचारियों से सुसज्जित है। इसने ग्रामीण क्षेत्रों में एक आधुनिक सुविधा को जीवंत किया, जिसे सबसे छोटे और सबसे कमजोर नवजात शिशुओं के जीवन को बचाने के लिए डिजाइन किया गया था। जैसे ही इन इकाइयों ने काम करना शुरू किया आम लोगों और नवजात मृत्यू दर पर इनका प्रभाव स्पष्ट देखने को मिला। इसने नवजातों की देखभाल के लिए आधुनिक सुविधाएं मुहैया कराई हैं।

Equipped with the necessary equipment and trained paediatricians and nurses, 1054 SNCUs across the country operate 24/7 and provide essential care to newborns. UNICEF/2024/ Saurabh Chakravarty
UNICEF/2024/ Saurabh Chakravarty Equipped with the necessary equipment and trained paediatricians and nurses, 1054 SNCUs across the country operate 24/7 and provide essential care to newborns.

आधुनिक सुविधाओं से लैस ये एसएनसीयू इकाइयाँ पहले वाली सभी इकाईयों से भिन्न थी। यह नवजात शिशुओं की देखभाल के लिए एक पूरे आधुनिक पैकेज जैसा है। इसी वजह से मध्य प्रदेश इन आधुनिक सेवाओं के क्षेत्र में सबसे अग्रणी है। इस पायलट प्रोजेक्ट की सफलता और इससे मिले अनुभव के बाद, देशभर में एसएनसीयू का तेजी से विस्तार हुआ और इस छोटी सी पहल ने नवजात शिशुओं की देखभाल के मामले में सुधार के लिए सरकार की प्रतिबद्धता को प्रदर्शित किया।

डॉ. हिमानी ने गर्व के साथ बताते हुए कहा कि, “मॉडल की सफलता ने सरकार को एसएनसीयू प्रोजेक्ट हिमाचल प्रदेश से तमिलनाडु और अन्य राज्यों में शुरू करने को प्रोत्साहित किया। आज देशभर में 1054 एसएनसीयू सुचारू रूप से चल रहे हैं, जिससे हर साल हजारों नवजात शिशुओं की जान बच रही है। मध्य प्रदेश में शुरू हुआ यह छोटा सा मॉडल राष्ट्रव्यापी प्रोजेक्ट के रूप में उभरा।”

समय के साथ (सीपीएपी) जैसे अधिक आधुनिक और आवश्यक उपकरणों के साथ एसएनसीयू एक गेम-चेंजर की तरह उभरा है। यह ऐसी तकनीकों के माध्यम से कार्य करती हैं, जो शिशुओं के लिए जरा भी नुकसानदेह नहीं हैं, जिससे उन्हें अतिशीघ्र मजबूती से उपचार मिल सके। ताकि, सभी शिशुओं को जीवित रहने और ठीक होने का बेहतर मौका मिल सके।

“इसमें यूनिसेफ ने पुरा सहयोग किया। यूनिसेफ और एनएचएम के सहयोग के साथ ही हम एसएनसीयू में सीपीएपी संचालन को एकीकृत करने में सक्षम हुए।” पार्थ सारथी सेन शर्मा, प्रमुख सचिव, चिकित्सा, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण, उत्तर प्रदेश सरकार (यूपी)।

आज देशभर में 1054 विशेष नवजात देखभाल इकाइयाँ (एसएनसीयू) नवजात शिशुओं की जान बचाकर अनगिनत परिवारों के लिए आशा की किरण बन गई हैं।  एसएनसीयू एक ऐसी जगह है जहां हर दिल की धड़कन एक जीत जैसी महसूस होती है, हर सांस एक जीत लगती है। यह आधुनिक चिकित्सा के चमत्कारों और जीवन की अदम्य भावना का बेशकिमती नमूना है।

यूपी के एक कस्बे में रहने वाली मालती मयूरिया ने बताया कि, “मेरा बच्चा दिल की समस्या के साथ पैदा हुआ था और उसका वजन भी कम था। उसके जन्म के बाद देखकर मुझे नहीं लगता था कि वह जिंदा भी बचेगा। लेकिन आज वह डॉक्टरों और नर्सों की मेहरबानी से हमारे साथ है।” मालती की आँखों में कृतज्ञता के आँसू भर रहे हैं।

“My child was born with a heart problem and was underweight. I did not think he would survive, but today he is with us,” says Malti Mayuria from Uttar Pradesh, one of many mothers who expressed gratitude for saving lives of newborn babies.
UNICEF/UNI683523/Arora “My child was born with a heart problem and was underweight. I did not think he would survive, but today he is with us,” says Malti Mayuria from Uttar Pradesh, one of many mothers who expressed gratitude for saving lives of newborn babies.

जीवन बचाने के लिए सामूहिक प्रयास

डॉ. पी.एन. एसएनसीयू प्रभारी वर्मा, जो शुरुआत से ही गुना जिला अस्पताल में एसएनसीयू के साथ रहे हैं, अविश्वसनीय प्रगति को दर्शाते हैं। "अब हम हर महीने 300 से अधिक नवजात शिशुओं की जान बचाते हैं, जो 2007 में हमारी शुरुआती संख्या से चार गुना अधिक है।"

उनकी टीम न केवल अपने प्रवास के दौरान शिशुओं की देखभाल करती है, बल्कि परिवारों को आगे के लिए भी तैयार करती है। वह सुनिश्चित करते हैं कि घर पर भी बच्चों का पालन-पोषण अच्छे से किया जाए।

माता-पिता और डॉक्टरों के बीच के मानवीय संबंधों के बारे में बताते हुए डॉ. हिमानी यादव कहती हैं कि, “हमारा काम नवजात शिशु को एसएनसीयू में लाते ही शुरू हो जाता है, और बच्चे के पुरी तरह से स्वस्थ होने तक जारी रहता है। हम बच्चे की देखभाल के लिए पिता सहित परिवार के सभी सदस्यों को सलाह देते हुए उनकी जिम्मेदारी समझाते हैं। क्योंकि एक बच्चा सिर्फ माता-पिता की नहीं, बल्कि पूरे परिवार की जिम्मेदारी होता है।

डिस्चार्ज के बाद, बच्चे को "आशा दीदी" की निगरानी में रखा जाता है। वह माता-पिता को तय अंतराल पर नियमित फॉलो-अप शेड्यूल करने में मदद करती है। माता-पिता को घर से अस्पताल तक आने-जाने के लिए एक निःशुल्क एम्बुलेंस सेवा उपलब्ध है।

आशा दीदी राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के तहत एक सामुदायिक स्वयंसेवक है। बिवोद जैसे नए माता-पिता के लिए वह एक टीचर की तरह है, जो उन्हें सिखाती है कि छोटे बच्चे का कैसे ध्यान रखना है। बिवोद गर्व से बताते हैं कि, “मैंने और मेरी पत्नी ने आशा दीदी से सीखा कि अपने बच्चे की देखभाल कैसे करनी है।”

“मेरे बच्चे का आठ दिनों के बाद पहला फॉलो-अप निर्धारित है। इसके अलावा, हम किसी भी आपात स्थिति के लिए समर्पित टोल-फ्री नंबर 108 पर कॉल करके सहायता प्राप्त कर सकते हैं,'' आत्मविश्वास से भरपूर युवा पिता बिवोद कहते हैं।

Bivod and Mamta’s baby was discharged from the Guna District Hospital SNCU. The parents received comprehensive training and guidance from the doctors and nurses on the special care their baby needs.
UNICEF/2024/ Saurabh Chakravarty Bivod and Mamta’s baby was discharged from the Guna District Hospital SNCU. The parents received comprehensive training and guidance from the doctors and nurses on the special care their baby needs.

वर्ष 1949 से यूनिसेफ भारत सरकार और अन्य हितधारकों के सहयोग से बाल स्वास्थ्य में सुधार के लिए कार्य कर रहा है। इन सामूहिक प्रयासों की बदौलत ही भारत में नवजात शिशुओं की मृत्यु दर जोकि वर्ष 2003 में 1000 शिशुओं के जन्म पर 40 थी वह वर्ष 2020 में आधी कम होकर 1000 शिशुओं पर 20 रह गई है। यह अपने आप में ही एक उपलब्धि है। सफलता की ऐसी कहानियां स्वास्थ्य देखभाल में आ रहे नए और आधुनिक बदलावों के कारण ही संभव हो सकी। जो देशभर में सभी परिवारों के लिए आशा की किरण बनकर उभरी हैं।