खामोश दर्शक से सक्रिय पिता तक: बिहार में साझा पैरेंटिंग की नई शुरुआत

बच्चों की परवरिश में पिता की भागीदारी से मजबूत हो रहे हैं रिश्ते, समाज में खुलेगी लैंगिक समानता और सकारात्मक बदलाव की राह

By Priyanka Kumari, SBC Officer
Father story cover picture
UNICEF
11 सितंबर 2025

“चंदा मामा आरे आव… सोना के कटोरिया में दूध भात लेले आव, बाबुनी के मुंह में घुटुक…”
उदय कुमार यादव हर रात अपनी छह महीने की बेटी दिशा को यही लोरी सुनाते हुए खाना खिलाते हैं।

पूर्वी बिहार के पूर्णिया जिले के छोटे से गांव खोखा पंचायत में यह नज़ारा सिर्फ प्यारा ही नहीं, बल्कि बदलाव की निशानी है। उदय, जो अपने गांव में एक छोटा कोचिंग सेंटर चलाते हैं, उन पिताओं में से हैं जो घर और बच्चों की देखभाल को सिर्फ मां की जिम्मेदारी मानने की परंपरागत सोच को तोड़ रहे हैं।

उदय कहते हैं,

“जब मैं बड़ा हो रहा था, तब मैंने कभी अपने पिता को घर के काम या बच्चों की देखभाल करते नहीं देखा। हमें यही सिखाया गया कि पिता का काम बस कमाना और सुरक्षा देना है।”

Uday Singh
Priyanka Kumari Uday Kumar Yadav feeding his six months old daughter Disha during the Annaprashan ceremony at the Anganwadi center.
सोच में बदलाव की शुरुआत

उदय की सोच बदली जब आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और पंचायत सदस्य ने उन्हें अपनी बेटी के अन्नप्राशन समारोह (बच्चे को पहली बार अनाज खिलाने का संस्कार) में शामिल होने के लिए बुलाया।

उदय बताते हैं, “शुरू में मेरा मन नहीं था, लेकिन जब मैं गया तो बहुत कुछ समझ आया। वहां हमने जाना कि बच्चे के जीवन के पहले 1000 दिन कितने ज़रूरी होते हैं। छोटी-सी मदद से हम बच्चे को सही पोषण दिला सकते हैं।”

समुदाय में बदलाव की लहर

छह महीने बाद बच्चों को पूरक आहार देना बहुत जरूरी है और इसके लिए पूरे परिवार का सहयोग चाहिए।

यूनिसेफ और स्थानीय संगठनों की मदद से गांवों में गोदभराई और अन्नप्राशन जैसे सामुदायिक आयोजन किए जाते हैं, जहां पुरुषों को भी बुलाया जाता है ताकि वे अपनी भूमिका समझें।

खोखा पंचायत के पंचायत प्रतिनिधि रवि कुमार बताते हैं,

“शुरू में पुरुषों को बुलाना मुश्किल था। लेकिन अब धीरे-धीरे ज्यादा पिता इन कार्यक्रमों में आने लगे हैं। मुझे भरोसा है कि यह बदलाव और बढ़ेगा।”

नया सामान्य बनता जा रहा है

अब पिता सिर्फ घर का खर्च चलाने वाले नहीं रह गए हैं, वे बच्चों की परवरिश में भी हाथ बंटा रहे हैं।

वे बाजार से पौष्टिक चीजें लाते हैं, बच्चों की सेहत और पढ़ाई के बारे में जानकारी लेते हैं और अपनी पत्नियों की मदद करते हैं।

गांव के ही एक पिता छोटू महतो कहते हैं,

Uday Kumar Yadav feeding his six months old daughter Disha during the Annaprashan ceremony at the Anganwadi center with his wife
Priyanka Kumari Uday Kumar Yadav feeding his six months old daughter Disha during the Annaprashan ceremony at the Anganwadi center with his wife

“पहले मैं खाना अपनी पसंद का खरीदता था। अब मैं सोच-समझकर ऐसा खाना खरीदता हूं जिससे मेरी पत्नी और बच्चे स्वस्थ रहें।”

स्थानीय अधिकारी भी इस बदलाव को देख रहे हैं। श्रीनगर की सीडीपीओ अमृता वर्मा कहती हैं, “पहले पिता इन आयोजनों में शायद ही दिखते थे, लेकिन अब वे न केवल आते हैं बल्कि बच्चों की सेहत के बारे में सवाल भी पूछते हैं। यह बदलाव लगातार जागरूकता और सामुदायिक भागीदारी का नतीजा है।”

Chhotu Mahto with his six months old daughter and wife at the Anganwadi center to attend the Annaprashan ceremony.
UNICEF Chhotu Mahto with his six months old daughter and wife at the Anganwadi center to attend the Annaprashan ceremony.
बदलाव की गूंज

जो शुरुआत कुछ पिताओं से हुई थी, अब एक आंदोलन बनती जा रही है। अब गांवों में पिताओं का एक ऐसा समूह तैयार हो रहा है जो बच्चों के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ा है, पत्नियों का सहयोग करता है और परिवार को बराबरी से संभालता है।

उदय का हर रात बेटी को लोरी सुनाना अब सिर्फ एक आदत नहीं रह गया है। यह उस बदलाव की आवाज़ है जो बिहार के गांव-गांव में गूंज रही है।