सुरक्षित इंटरनेट दिवस: दुनिया भर में ऑनलाइन युवाओं में से 70 प्रतिशत से अधिक के साथ दमनकारी (बुलींग) व्यवहार/बदसलूकी एवं उत्पीड़न को रोकने के लिए यूनिसेफ ने ठोस कार्यवाही का आह्वान किया
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न्यू यॉर्क, 05 फरवरी 2019 – आज यूनिसेफ ने दुनियाभर के 15-24 वर्ष की आयु के ऑनलाइन रहने वाले 70.6 प्रतिशत युवाओं के लिए ऑनलाइन हिंसा, साइबर हिंसा और डिजिटल उत्पीड़न से होने वाले खतरों के बारे में चेतावनी दी। बच्चों और युवाओं के खिलाफ ऑनलाइन हिंसा से निपटने और उसको रोकने के लिए यूनिसेफ ने ठोस कार्यवाही का आह्वान किया है।
सुरक्षित इंटरनेट दिवस पर किया गया आह्वान हाल ही में हुए यूनिसेफ के युवा सर्वेक्षण के बाद आया है। इसे 160 से अधिक देशों से पांच सप्ताह में 10 लाख से अधिक प्रतिक्रियाएं मिलीं, और दुनिया भर में छात्र-नेतृत्व के अंतर्गत हुए #END violence यूथ टॉक्स (युवाओं से बातचीत) की एक श्रृंखला से सुझाव मिले। इसमें युवाओं ने अपनी विचारशील प्रतिक्रियाएं प्रदान करते हुए बताया कि अपनी सुरक्षा करने हेतु खुद और उनके माता-पिता, शिक्षक और नीति- निर्माता क्या कदम उठा सकते हैं। उनमें से, बुलींग/बदसलूकी और साइबर हिंसा को रोकने के लिए, हमदर्दी सबसे प्रभावशाली साधन के रूप में सामने आई है।
यूनिसेफ की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर (कार्यकारी निदेशक) हेनरीटा फोर ने बताया, "हमने दुनियाभर के बच्चों और युवाओं से मिली टिप्पणियों को सुना और वह जो कह रहे हैं वह स्पष्ट है: इंटरनेट एक तरह का रेगिस्तान बन गया है जहाँ हमदर्दी मिलना मुश्किल है। यही कारण है कि इस सुरक्षित इंटरनेट दिवस पर, यूनिसेफ ने हर किसी से, चाहे वो युवा हों या वृद्ध, यह आग्रह किया है कि ऑनलाइन रहते समय वह सभी के साथ हमदर्दी पूर्वक व्यवहार करें। इंटरनेट को सभी के लिए एक सुरक्षित स्थान बनाने के लिए यूनिसेफ ने अधिक से अधिक कार्यवाही करने का आह्वान किया है।"
इंटरनेट युवाओं के जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है, भले ही उनकी आय का स्तर कुछ भी हो। अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ (आई.टी.यू) के अनुसार, जहाँ विकसित देशों में 15-24 आयु वर्ग के 94 प्रतिशत युवा ऑनलाइन हैं, वहीं विकासशील देशों में 65 प्रतिशत से अधिक युवा ही ऑनलाइन होते हैं। यह संख्या आम आबादी के इंटरनेट उपयोग की दर से काफी ज्यादा है। दुनियाभर की कुल जनसँख्या का आधा भाग ही ऑनलाइन है। इसमें हर आयु के लोग शामिल हैं।
यह ऑनलाइन का फैलाव अपने साथ बहुत सारे खतरे लाता है। उच्च आय वाले देशों में साइबरबुलींग (ऑनलाइन दमनकारी व्यवहार/बदसलूकी) की व्यापकता पर यूनेस्को के आंकड़ों के अनुसार, साइबरबुलींग से प्रभावित होने वाले बच्चों और किशोरों का अनुपात 5 प्रतिशत से लेकर 21 प्रतिशत तक हैं। लड़कों की तुलना में लड़कियों की साइबरबुलींग होने की संभावना अधिक है।
साइबर बुलींग/बदसलूकी से हमें गंभीर नुकसान हो सकता है क्योंकि यह जल्द ही दूर तक पहुंच सकता है, और अनिश्चित काल के लिए यह ऑनलाइन उपलब्ध रह सकता है। इस कारण साइबरबुलींग से पीड़ित व्यक्ति जीवन-भर इसकी क्षति से अपना पीछा नहीं छुड़ा पाते। बुलींग और साइबरबुलींग एक दूसरे को बढ़ावा देते हैं और इससे दुर्व्यवहार का चक्र लगातार चलता रहता है। अन्य छात्रों की तुलना में, साइबरबुलींग के पीड़ितों की शराब और नशीले पदार्थ लेने की और स्कूल न जाने की संभावना अधिक हैं। उनमें खराब ग्रेड प्राप्त करने की, कम आत्म-सम्मान होने की और स्वास्थ्य समस्याओं से गुज़रने की संभावना अधिक रहती हैं। गंभीर स्थितियों में, साइबरबुलींग की वजह से आत्महत्याएं भी हुई हैं। सुरक्षित इंटरनेट दिवस पर, यूनिसेफ सभी को यह याद दिला रहा है कि हमदर्दी पूर्ण व्यवहार करना एक ज़िम्मेदारी है जो हम सभी के साथ शुरू होती है, चाहे ऑनलाइन हो या ऑफलाइन।
‘बाल अधिकारों पर कन्वेंशन' को अपनाने की 30वीं वर्षगांठ के अवसर पर यूनिसेफ ने बच्चों के अधिकारों को डिजिटल प्रयासों में प्रमुखता से रखने का आह्वान किया है। इसके तहत, यूनिसेफ दुनियाभर के बच्चों के लिए इंटरनेट से शिक्षा और कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने हेतु कई योजनाओं को कार्यान्वित कर रहा है। उदाहरण के लिए, यूनिसेफ के 'इंटरनेट ऑफ गुड थिंग्स' का उद्देश्य है डिजिटल-अंतर को कम करना और जीवन-रक्षा एवं जीवन-सुधार की मुफ्त जानकारी देने के लिए बनाई गई मोबाइल-उपयुक्त सामग्री को सस्ते उपकरणों पर भी उपलब्ध करके समाज में ज्ञान का प्रसारण करना।
फोर ने बताया, “बाल अधिकारों पर कन्वेंशन को अपनाने और वर्ल्ड वाइड वेब के निर्माण के तीस साल बाद, सरकारों, परिवारों, शैक्षणिक समुदायों और निजी क्षेत्रों की विभिन्न डिजिटल नीतियों में बच्चों और युवाओं को महत्व देने का समय आ गया है। इंटरनेट के नकारात्मक प्रभावों से उन्हें बचाकर और इंटरनेट की अच्छाईयों को ज़्यादा से ज़्यादा फैलाकर, हम इंटरनेट की सकारात्मकता बनाए रख सकते हैं।”
ऑनलाइन सुरक्षा के बारे में यहाँ और जानें।
यूनिसेफ के #ENDviolence वैश्विक अभियान के बारे में यहाँ और जानें।
आई.टी.यू आई.सी.टी के तथ्य और आंकड़ों के बारे में
बच्चों और युवाओं में इंटरनेट की पहुँच की जानकारी, ‘आई.टी.यू आई.सी.टी फैक्ट्स एंड फिगर्स 2017’ से आई है, जिसमें 2017 के अंत तक के प्रमुख दूरसंचार/आई.सी.टी संकेतकों के बारे में बताया गया हैं।
भारत में संपादकों के लिए टिपण्णी:
सुरक्षित इंटरनेट दिवस के अवसर पर बोलते हुए, यूनिसेफ इंडिया की प्रतिनिधि डॉ यास्मीन अली हक ने बताया, “डिजिटल टेक्नोलॉजी युवा पीढ़ी को सशक्त बनाने और यहां तक कि उनकी सुरक्षा के लिए भी अवसर प्रदान करती हैं। वह विशेष रूप से सुविधाहीन और सबसे असुरक्षित लड़के और लड़कियों के लिए शिक्षा, सामाजिक समावेश और नागरिक भागीदारी के लिए एक परिवर्तनकारी भूमिका निभा सकते हैं“।
पृष्ठभूमि: भारत में इंटरनेट की पहुंच और उपयोग को समझना
• सबसे अधिक संख्या: ग्लोबल साउथ में, चीन और ब्राजील के साथ, युवाओं के मोबाइल अकाउंट की सबसे बड़ी संख्या वाले तीन बाजारों में से एक भारत है। दिसंबर 2017 में भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या लगभग 48.1 करोड़ थी; इनमें से 60 प्रतिशत छात्र और युवा थे।
• मोबाइल टेक्नोलॉजी का व्यापक उपयोग: नई पीढ़ी के उपकरणों सहित मोबाइल टेक्नोलॉजी का उपयोग उन समुदायों में व्यापक हैं जिनके पास अभी भी बिजली या घर में शौचालय नहीं है।
• एक इंटरनेट उपयोगकर्ता की आम गतिविधियों में मनोरंजन, संचार, सोशल नेटवर्किंग, ऑनलाइन लेनदेन और खरीदारी या अन्य ऑनलाइन सेवाओं का लाभ उठाना शामिल है। इंटरनेट के उपयोग में अंतर होने का मुख्य कारण सामाजिक और आर्थिक स्तिथि, भूगोल एवं लिंग के आधार पर होने वाली असमानताएं हैं।
• उन घरों में जहाँ डिजिटल टेक्नोलॉजी माता-पिता या अभिभावकों द्वारा प्रदान की जाती हो, वहां लड़कों को लड़कियों की तुलना में पहले फोन दिए जाने की अधिक संभावना होती है। लड़कियों को लड़कों की तुलना में अधिक उम्र में डिजिटल टेक्नोलॉजी से परिचित किया जाता है और उपकरणों को साझा करने के कारण इस माध्यम की उन तक पहुँच सीमित रहती है। आई.सी.टी से संबंधित करियर का विचार लड़कियों की तुलना में लड़कों से अधिक जुड़ा हुआ है।
• ऑनलाइन जाने वाले किशोरों के लिए माता-पिता और शिक्षक समर्थन और मार्गदर्शन का सबसे पहला स्रोत होते हैं। लेकिन माता-पिता और शिक्षक दोनों में ही डिजिटल मीडिया का उपयोग करने में अच्छी जानकारी की कमी रहती हैं और बच्चों की गतिविधियों की तरफ उनका व्यवहार आलोचनात्मक हो सकता हैं।
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