भारत में अब बचपन ज्यादा सुरक्षित: वैश्विक प्रगति धीमी होने के बावजूद भारत में 2015 के बाद 60% तक घटी बाल मृत्यु दर
संयुक्त राष्ट्र ने की सराहना, नई रिपोर्ट में पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मौतों के प्रमुख कारणों का पहली बार हुआ विस्तृत विश्लेषण
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नई दिल्ली — संयुक्त राष्ट्र की जारी नई रिपोर्ट के अनुसार भारत में अब बचपन दुनिया के कई देशों के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित हैं। रिपोर्ट में भारत के प्रयासों की सराहना की गई है। भारत ने सही योजना, मजबूत स्वास्थ्य सिस्टम और लगातार प्रयासों से साबित कर दिया कि अधिकांश बाल मृत्यु दर को कम करके बच्चों का भविष्य सुरक्षित बनाया जा सकता है
वर्ष 2024 में अनुमानित 49 लाख बच्चों की पाँच वर्ष की उम्र से पहले मृत्यु हुई, जिनमें 23 लाख नवजात शिशु शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट "लेवल्स एंसड ट्रेंड्स इन चाइल्ड मॉर्टेलिटी" के अनुसार, वर्ष 2000 के बाद से वैश्विक स्तर पर पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मौतों में आधे से अधिक की कमी आई है। हालांकि, 2015 के बाद से इस प्रगति की गति 60 प्रतिशत से अधिक धीमी हो गई है।
इस वर्ष की रिपोर्ट में पहली बार यह भी बताया गया है कि शिशुओं, बच्चों, किशोरों और युवाओं की मृत्यु कहाँ हुई और उनकी मृत्यु के प्रमुख कारण क्या हैं।
रिपोर्ट में पहली बार गंभीर तीव्र कुपोषण (SAM) से सीधे होने वाली मौतों का अनुमान भी शामिल किया गया है। इसके अनुसार वर्ष 2024 में 1 से 59 महीने की उम्र के 1 लाख से अधिक बच्चों की मृत्यु कुपोषण के कारण हुई।
हालांकि, वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है, क्योंकि कुपोषण बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम कर देता है और बचपन में होने वाली सामान्य बीमारियों से मृत्यू का खतरा बढ़ा देता है।
इसके अलावा, मृत्यु से जुड़े आंकड़ों में अक्सर कुपोषण को मौत के मूल कारण के रूप में दर्ज नहीं किया जाता। साथ ही, एक महीने से कम उम्र के नवजात शिशु इस आंकड़े में शामिल नहीं हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि वास्तविक आंकड़े रिपोर्ट से काफी अधिक हो सकते हैं।
सीधे तौर पर कुपोषण से होने वाली मौतों की सबसे अधिक संख्या वाले देशों में पाकिस्तान, सोमालिया और सूडान शामिल हैं।
रिपोर्ट बताती है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत के लगातार प्रयासों से नवजात (जन्म के तुरंत बाद) और 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में काफी कमी आई है। रिपोर्ट के अनुसार, 1990 में जहां हर 1000 बच्चों में से 127 बच्चों की 5 साल से पहले मौत हो जाती थी, वहीं, वर्ष 2000 से 2015 के बीच बच्चों की मौतों में तेज गिरावट देखी गई।
नवजात शिशुओं की मौत के प्रमुख कारणों में समय से पहले जन्म के दौरान चुनौतियों से (36 प्रतिशत) और प्रसव के दौरान होने वाली जटिलताओं में (21 प्रतिशत) बाल मृत्यु शामिल हैं। इसके अलावा, संक्रमण जैसे नवजात सेप्सिस और जन्मजात विकार भी मुख्य कारण रहे।
जन्म के पहले महीने के बाद मलेरिया, दस्त और निमोनिया जैसी संक्रामक बीमारियाँ बच्चों की मौत का प्रमुख कारण बनी। मलेरिया से (17 प्रतिशत), और अधिकांश मौतें उप-सहारा अफ्रीका के उन क्षेत्रों में हुईं जहाँ यह बीमारी अधिक पाई जाती है।
हाल के वर्षों में वैश्विक स्तर पर प्रगति धीमी पड़ गई है। बाल मृत्यु दर भौगोलिक रूप से अत्यधिक केंद्रित है।, जैसे चाड, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (डीआरसी), नाइजर और नाइजीरिया। इन देशों में संघर्ष, जलवायु से जुड़ी चुनौतियाँ, मच्छरों की बढ़ती संख्या, दवाओं के प्रति प्रतिरोध और अन्य जैविक खतरों के कारण रोकथाम और उपचार प्रभावित होते हैं।
वैश्विक स्तर पर पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की कुल मौतों में उप-सहारा अफ्रीका की भागीदारी 58 प्रतिशत रही, इसके बाद दक्षिण एशिया में (25 प्रतिशत) है। इसके विपरीत, यूरोप और उत्तरी अमेरिका में यह यह संख्या घटकर 9 प्रतिशत और ऑस्ट्रेलिया व न्यूज़ीलैंड में 6 प्रतिशत रह जाती है। यह बड़ा अंतर दर्शाता है कि जीवन बचाने वाली प्रभावी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच अभी भी सभी क्षेत्रों में एक समान नहीं है।
इनमें से अधिकांशतः बाल मृत्यु रोकी जा सकती थी। ऐसे समय में भारत का अनुभव दिखाता है कि लगातार निवेश, मज़बूत स्वास्थ्य सेवाएँ और लक्षित नीतियाँ, बच्चों की जान बचाने में बड़ा अन्तर ला सकती हैं। भारत की यह प्रगति ऐसे समय में सामने आई है, जब वैश्विक तस्वीर चिन्ता बढ़ाती है.
नई यूएन रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में 5-24 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 21 लाख बच्चों, किशोरों और युवाओं की मृत्यु हुई। जिसमें छोटे बच्चों की मृत्यु का कारण संक्रामक बीमारियां रही, वहीं 15 से 19 वर्ष की किशोरियों के मामले में आत्महत्या, जबकि लड़कों में सड़क दुर्घटनाएँ सबसे बड़ा कारण रहीं।
घटती वैश्विक सहायता से मातृ, नवजात और बाल स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे समय में भारत का अनुभव दिखाता है कि लगातार निवेश, मज़बूत स्वास्थ्य सेवाएँ और लक्षित नीतियाँ, बच्चों की जान बचाने में बड़ा अन्तर ला सकती हैं। बच्चों के स्वास्थ्य में निवेश सबसे प्रभावी विकास उपायों में से एक है।
ज्यादा बच्चों की जान बचाने के लिए उठाने होंगे ये कदम:
- सभी देशों में सरकार बच्चों के जीवन को राजनीतिक और वित्तीय प्राथमिकता बनाकर सभी के लिए सस्ती व गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच सुनिश्चित करे।
- सबसे अधिक प्रभावित देशों पर ज्यादा ध्यान दिया जाये, खासकर उप-सहारा अफ्रीका और दक्षिण एशिया की माताओं और बच्चों, तथा हशिये पर रहने वाले समुदायों पर।
- मातृ, नवजात और बाल मृत्यु दर कम करने के लिए किए गए मौजूदा वादों पर जवाबदेही मजबूत की जाए, जिसमें व्यवस्था में बदलाव और पारदर्शिता आये। इसमें डेटा संग्रह, निगरानी और रिपोर्टिंग शामिल हो।
- प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश बढ़ाया जाए, ताकि बच्चों की मौत के प्रमुख कारणों की रोकथाम, पहचान और उपचार समय से किया जा सके।
- सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मियों और प्रसव के समय प्रशिक्षित स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना भी जरूरी है।
यूनिसेफ की कार्यकारी निदेशक कैथरीन रसेल ने कहा, "ऐसी बीमारियों से किसी भी बच्चे की मौत नहीं होनी चाहिए जिन्हें संयुक्त प्रयासों से रोका जा सकता है। लेकिन चिंता की बात है कि बच्चों के जीवित रहने में हो रही प्रगति में सुस्ती दर्ज की गई है और यह ऐसे समय में हो रहा है जब वैश्विक स्तर पर बजट में कटौती हो रही है।”
विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया:
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अधानोम घेब्रेयेसस ने कहा, “दुनिया ने बच्चों की जान बचाने में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन अब भी कई बच्चे ऐसी वजहों से मर रहे हैं जिन्हें रोका जा सकता है। संघर्ष और संकट के हालातों में रहने वाले बच्चों की पांच वर्ष की आयु से पहले मृत्यु की संभावना लगभग तीन गुना बढ़ जाती है। इसीलिए हमें स्वास्थ्य और पोषण सेवाओं पर ध्यान केंद्रित करके सबसे कमजोर वर्गों तक पहुँचना होगा, ताकि हर बच्चे को सिर्फ जीवित रहने का ही नहीं, बल्कि आगे बढ़ने का अवसर मिल सके।”
विश्व बैंक समूह की स्वास्थ्य निदेशक मोनिक व्लेडर ने कहा, “नई रिपोर्ट के नतीजे हमें सामुहिक रूप से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। विश्व बैंक समूह का लक्ष्य 1.5 अरब लोगों तक पहुँच कर बच्चों व उनके परिवारों को गुणवत्तपूर्ण प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराना है।
आर्थिक और सामाजिक मामलों के लिए संयुक्त राष्ट्र के अवर महासचिव ली जुनहुआ ने कहा, “संयुक्त राष्ट्र इंटर-एजेंसी ग्रुप फॉर चाइल्ड मॉर्टेलिटी एस्टीमेशन के नये आंकड़ों से साफ जाहिर है कि बच्चों के जीवित रहने में प्रगति धीमी पड़ रही है। कई देश सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा से पीछे हैं। हमें इन मौतों को रोकने के लिए जरूरत है नई राजनीतिक प्रतिबद्धता, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में निरंतर निवेश और मजबूत डेटा प्रणालियों की, ताकि कोई भी बच्चा पीछे न छूटे।”
जॉन्स हॉपकिन्स ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ की एसोसिएट प्रोफेसर और CA-CODE की सह-प्रमुख डॉ. ली लियू ने कहा, “पाँच वर्ष से कम उम्र के समय से पहले जन्म लेने वाले और संक्रमण से होने वाली बच्चों की मौतों को प्रभावी और कम लागत वाले उपायों से रोका जा सकता है।”
संयुक्त राष्ट्र इंटर-एजेंसी ग्रुप फॉर चाइल्ड मॉर्टेलिटी एस्टीमेशन (UN IGME) ने अपनी रिपोर्ट में वैश्विक बाल मृत्यु और मृत्यु के कारणों से जुड़े आंकड़ों को एकीकृत किया है। इसमें जॉन्स हॉपकिन्स ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के नेतृत्व वाले शोध समूह CA-CODE के अनुमान भी शामिल किए गए हैं।
वैश्विक स्तर पर बच्चों की मौतों में गिरावट जारी है, हालांकि डेटा और बेहतर तकनीक के कारण इस बार के अनुमान पिछले वर्ष की तुलना में थोड़े अधिक हैं। UN IGME के आंकड़ों की अलग-अलग वर्षों से सीधे तुलना नहीं की जा सकती, क्योंकि हर बार नए सर्वेक्षण, जनगणना, नागरिक पंजीकरण डेटा, जनसंख्या और जन्म से जुड़े आंकड़ों तथा देशों के कवरेज में बदलाव को शामिल किया जाता है।
भारतीय मीडिया संपादकों के लिए नोट:
संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने बाल जीवन रक्षा के मोर्चे पर उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। वैश्विक स्तर पर बाल मृत्यु दर घटाने की रफ़्तार धीमी पड़ने के बावजूद, भारत के आँकड़े इस दिशा में हुई महत्वपूर्ण सुधार को दर्शाते हैं। यूनिसेफ के अनुसार, इस प्रगति के पीछे ऐसी रणनीति है, जिसमें गर्भावस्था से लेकर जन्म और उसके बाद बच्चे की देखभाल तक की सेवाओं को एक साथ मज़बूत किया गया। इसके साथ ही, स्वास्थ्य व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने और 'जननी सुरक्षा योजना' व 'जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम' जैसी लक्षित पहल को आगे बढ़ाने पर भी ज़ोर दिया गया।
इसके साथ ही, विशेष नवजात देखभाल इकाइयों (Special Newborn Care Units) का विस्तार और टेली-SNCU जैसी डिजिटल पहलें यह दिखाती हैं कि रणनीतिक निवेश और सामुहिक प्रयासों से विभिन्न परिस्थितियों में बच्चों के जीवित रहने के परिणामों में सुधार हो रहा है।
यूएन आईजीएमई (UN IGME) के बारे में
संयुक्त राष्ट्र इंटर-एजेंसी ग्रुप फॉर चाइल्ड मॉर्टेलिटी एस्टीमेशन (UN IGME) की स्थापना वर्ष 2004 में की गई थी। इसका उद्देश्य बच्चों की मृत्यु दर से संबंधित आंकड़ों को साझा करना, अनुमान लगाने की पद्धतियों में सुधार करना, बाल जीवित रहने के लक्ष्यों की दिशा में प्रगति पर रिपोर्ट प्रस्तुत करना और देशों की क्षमता को मजबूत करना है, ताकि वे समय पर और सही तरीके से बच्चों की मृत्यु दर का आकलन कर सकें।
यूएन आईजीएमई (UN IGME) का नेतृत्व यूनिसेफ करता है। इसमें विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), विश्व बैंक समूह और संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक मामलों के विभाग की जनसंख्या प्रभाग (Population Division) शामिल हैं।
अधिक जानकारी के लिए यहां क्लिक करें... http://www.childmortality.org/
जॉन्स हॉपकिन्स ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के बारे में
जॉन्स हॉपकिन्स ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ नए शोध, ज़मीनी स्तर पर ज्ञान के उपयोग और भविष्य के सार्वजनिक स्वास्थ्य नेतृत्व को तैयार करके लाखों लोगों को बीमारियों और चोटों से सुरक्षित रखने के लिए काम करता है।
ब्लूमबर्ग स्कूल की स्थापना वर्ष 1916 में जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के तहत दुनिया के पहले स्वतंत्र सार्वजनिक स्वास्थ्य स्कूल के रूप में हुई थी। जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी अमेरिका की पहली शोध-आधारित विश्वविद्यालय मानी जाती है।
आज ब्लूमबर्ग स्कूल के शोधकर्ता प्रयोगशालाओं से लेकर समुदायों तक विभिन्न स्तरों पर काम कर रहे हैं, ताकि बीमारियों की रोकथाम की जा सके, जनस्वास्थ्य में सुधार हो और अमेरिका सहित दुनिया भर के देशों में स्वास्थ्य नीतियों को मजबूत बनाया जा सके।
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