AI और मानव क्षमता — सीखने के भविष्य को आकार देने में भारत की भूमिका

तकनीक को अपनाकर शिक्षा को और अधिक समावेशी और समान बनाने की दिशा में भारत की पहल

साधना पांडे, शिक्षा प्रमुख और सयेम महमूद, शिक्षा विशेषज्ञ, यूनिसेफ इंडिया
Secondary school students, Anjali Sain and Radha Tomar from Atrauli, Uttar Pradesh, sharing their perspectives of using technology at the stakeholder consultation meeting on digital learning at UNICEF India, December 2024
UNICEF/2024/Aldo Vaz Secondary school students, Anjali Sain and Radha Tomar from Atrauli, Uttar Pradesh, sharing their perspectives of using technology at the stakeholder consultation meeting on digital learning at UNICEF India, December 2024
05 दिसम्बर 2025

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के अतरौली के सरकारी हाई स्कूल के छात्र आदित्य तोमर कहते हैं कि, “टेक्नोलॉजी ने हमारे लिए एक नई दुनिया खोल दी है।” अंजलि सैनी ने आगे बढ़ाते हुए कहा, “लेकिन अब भी हमारे सामने कई चुनौतियाँ हैं—जैसे कमजोर इंटरनेट, महँगे डेटा पैक और उपकरणों की कमी और यह भारत के ग्रामीण और शहरी छात्रों के बीच मौजूद डिजिटल अंतर को साफ़ दिखाता है।”

24 जनवरी 2025 को पूरी दुनिया "अंतरराष्ट्रीय शिक्षा दिवस" मनाती है। इस वर्ष की थीम है—“AI और मानव एजेंसी”। यह दिखाती है कि कैसे आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस शिक्षा को बदल रही है, जबकि मनुष्य की भूमिका अब भी केंद्र में है।
यह भारत के लिए मौका है कि वह अपने तकनीक-आधारित शैक्षिक सुधारों का मूल्यांकन करे—और यह भी समझे कि किस तरह उसने शिक्षा को अधिक समावेशी और न्यायसंगत बनाने में वैश्विक नेतृत्व दिखाया है।

भारत: शैक्षिक तकनीक में एक वैश्विक अग्रणी देश

भारत की शिक्षा प्रणाली 25 करोड़ से अधिक छात्रों तक पहुँचती है—जो अलग-अलग सामाजिक, भाषाई और भौगोलिक पृष्ठभूमियों से आते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) और डिजिटल इंडिया के #AIforAll जैसे कार्यक्रमों ने शिक्षा की पहुँच, गुणवत्ता और समानता को बेहतर बनाने के लिए नई संभावनाएँ खोली हैं।

DIKSHA, NISHTHA Online और SWAYAM जैसे AI-समर्थित डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म ने सीखने को स्थानीय भाषाओं और स्थानीय ज़रूरतों के अनुरूप बनाया है। सरकार, स्टार्टअप्स और अन्य संगठनों के सहयोग से विकसित ये नवाचार अब वैश्विक उदाहरण बन चुके हैं।

भारत में शिक्षा: प्रगति और चुनौतियाँ

इन उपलब्धियों के बावजूद कई चुनौतियाँ अब भी बनी हुई हैं:

  • 6–17 वर्ष के करीब 3.2 करोड़ बच्चे अभी भी स्कूल से बाहर हैं।
  • UDISE+ (2023–24) के अनुसार, हर तीन में से एक बच्चा माध्यमिक शिक्षा पूरी नहीं कर पाता।
  • सीखने के परिणाम चिंताजनक हैं—
  • कक्षा 3 तक केवल 42% बच्चे अपेक्षित स्तर तक पहुँचते हैं
  • कक्षा 10 तक यह संख्या 23% रह जाती है
AI: कक्षाओं को बदलने वाली शक्ति

भारत का तेज़ी से बढ़ता EdTech क्षेत्र शिक्षा सुधारों को गति देने वाला एक बड़ा साधन बन चुका है। AI-सक्षम टूल्स और गेमिफ़ाइड लर्निंग प्लेटफ़ॉर्म छात्रों के लिए सीखने को व्यक्तिगत बनाते हैं — हर छात्र अपनी गति से सीख सकता है और अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ सकता है।

भारत का तेज़ी से बढ़ता एडटेक (EdTech) क्षेत्र शिक्षा प्रणाली में बदलाव लाने की भारत की कोशिशों को और मजबूत कर सकता है। AI आधारित एडैप्टिव टूल्स, गेमिफ़ाइड लर्निंग प्लेटफ़ॉर्म और इंटरैक्टिव संसाधन हर बच्चे की ज़रूरत के अनुसार सीखने का अनुभव तैयार करते हैं। इससे छात्र अपनी गति से सीख पाते हैं और अपनी पूरी क्षमता तक पहुँच सकते हैं।

शिक्षकों के लिए, AI छात्रों के प्रदर्शन पर तुरंत जानकारी देता है और कई प्रशासनिक कामों को कम कर देता है, जिससे शिक्षक अपना अधिक समय वास्तविक पढ़ाई और सीखने पर दे पाते हैं।

AI आधारित सहायक तकनीकें (Assistive Technologies) दिव्यांग बच्चों (CWD) की शिक्षा को भी बदल रही हैं। क्षेत्रीय भाषाओं में स्पीच-टू-टेक्स्ट, टेक्स्ट-टू-स्पीच और रियल-टाइम अनुवाद जैसे टूल्स, देखने या सुनने में कठिनाई वाले बच्चों को सीखने में मदद देते हैं और उनके सीखने के अधिकार को मजबूत करते हैं।

डिजिटल अंतर (digital divide) को कम करने के लिए PM eVidya जैसे कार्यक्रम दूरदराज और वंचित क्षेत्रों तक तकनीक आधारित साधन पहुंचा रहे हैं, जिससे तकनीक बच्चों के लिए एक शक्तिशाली समान अवसर देने वाला साधन बन रही है।

यूनिसेफ का डिजिटल लर्निंग पर फोकस

दिसंबर 2024 में, यूनिसेफ इंडिया ने नई दिल्ली में डिजिटल लर्निंग पर एक बड़ी बैठक आयोजित की, जिसमें कई क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल हुए। इसमें यह चर्चा हुई कि शिक्षा में जनरेटिव AI (GenAI) और AR/VR जैसी तकनीकों का उपयोग कैसे किया जाए, और साथ ही बच्चों की गोपनीयता कैसे सुरक्षित रखी जाए।

मुख्य वक्ताओं में प्रो. अमरेंद्र बेहरा (जॉइंट डायरेक्टर, सीआईईटी) ने बताया कि AI और मशीन लर्निंग की मदद से अलग-अलग भाषाओं के छात्रों के लिए किताबों को ज्यादा सुलभ बनाया जा रहा है। गूगल एजुकेशन इंडिया के प्रमुख संजय जैन ने कहा कि AI बहुत तेजी से बदल रहा है, इसलिए हमें भी तेजी से कदम उठाने होंगे। यूनेसको के डॉ. जियान शी तेंग ने सभी छात्रों के लिए समानता और पहुँच सुनिश्चित करने हेतु नैतिक (ethical) AI दिशानिर्देशों की ज़रूरत पर जोर दिया।

यूनिसेफ की शिक्षा प्रौद्योगिकी (EdTech) रणनीति

शिक्षा में तकनीक के उपयोग को बढ़ाने की अपनी रणनीति के तहत, यूनिसेफ इस क्षेत्र में कई नए अवसरों पर काम कर रहा है। इसके तहत कुछ प्रमुख पहलें हैं:

  • AI/ML आधारित अर्ली वॉर्निंग सिस्टम विकसित करना, जिससे खासकर माध्यमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने के खतरे (ड्रॉपआउट) का पहले से पता लगाया जा सके।
  • व्यक्तिगत (पर्सनलाइज़्ड) और अनुकूलित लर्निंग प्लेटफ़ॉर्म तैयार करना, ताकि शिक्षकों की नींव स्तर की पढ़ाई–लिखाई और गणित (FLN) सिखाने की क्षमता बेहतर हो सके।
  • शिक्षा में बच्चों के हितों को ध्यान में रखते हुए नैतिक (ethical) AI दिशानिर्देशों का विकास, ताकि AI का उपयोग जिम्मेदारी से और बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए हो।

नवाचार और ज़िम्मेदारी के बीच संतुलन

AI को अपनाते समय बच्चों के डेटा की सुरक्षा, गोपनीयता और सुरक्षित उपयोग सबसे महत्वपूर्ण हैं। यह भी ज़रूरी है कि AI प्रणालियाँ सभी बच्चों के लिए समान और न्यायपूर्ण हों, बिना किसी भेदभाव के।

सरकार, टेक कंपनियों और शैक्षणिक संस्थानों को मिलकर ऐसे नियम और ढाँचे बनाने चाहिए जो पारदर्शिता, डेटा सुरक्षा और नैतिक AI उपयोग सुनिश्चित करें। ऐसा करने से AI बच्चों की जरूरतों को बेहतर तरीके से पूरा कर सकेगा और शिक्षा को अधिक समावेशी और प्रभावी बना सकेगा।

मानव क्षमता: भविष्य का निर्माण

इंटरनेशनल डे ऑफ एजुकेशन 2025 हमें याद दिलाता है कि AI का उपयोग तभी meaningful है जब वह सीखने और सिखाने में मानव भूमिका को मजबूत करे। शिक्षा का आधार शिक्षक, विद्यार्थी और सीखने की सामग्री का रिश्ता है—और तकनीक का काम इस रिश्ते को बेहतर बनाना है, न कि उसकी जगह लेना। मानव-केंद्रित AI अपनाकर हम शिक्षा को अधिक प्रभावी, समावेशी और सभी बच्चों के लिए सुलभ बना सकते हैं।

जब हम AI को समावेशन, नैतिकता और नवाचार के साथ जोड़ते हैं, तो शिक्षा कुछ बच्चों का विशेषाधिकार नहीं रहती—वह हर बच्चे के लिए सुलभ और सशक्त अनुभव बन जाती है। इसी प्रतिबद्धता के साथ भारत, अंजलि, आदित्य जैसे लाखों बच्चों के लिए एक बेहतर और समान भविष्य का रास्ता तैयार कर रहा है।


[1] इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज़ (IIPS)। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) फैक्टशीट, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार।

[2] यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस (UDISE+) — https://udiseplus.gov.in

ब्लॉग के बारे में

यूनिसेफ अपने हर काम में प्रत्येक बच्चे के अधिकारों और कल्याण को बढ़ावा देता है। अपने साझेदारों के साथ मिलकर, यूनिसेफ बच्चों के अधिकारों और सुरक्षित बचपन को व्यावहारिकता में बदलने के लिए 190 देशों और क्षेत्रों में काम कर रहा है।

यूनिसेफ इंडिया के और इसके कामों के बारे में अधिक जानकारी के लिए https://www.unicef.org/india/hi पर विजिट करें।

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