मेरी लड़ाई: स्कूल क्लिनिक के लिए

4000 लड़कियों के लिए मेरी आवाज़ — क्योंकि हर लड़की का सुरक्षित और स्वस्थ रहना ज़रूरी है

उमा एस, युवा कंटेंट क्रिएटर, यूनिसेफ़ इंडिया, #Youth4UNICEF
Uma, Youth Content Creator with Mr. V. Sivankutty, Education Minister, Kerala
Uma. S
05 दिसम्बर 2025

नमस्ते, मैं उमा हूँ। मैं तिरुवनंतपुरम के गवर्नमेंट गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल, कॉटन हिल में कक्षा 9 की छात्रा हूँ। हमारा स्कूल बहुत बड़ा और शानदार है। यहां हम लगभग 4,000 लड़कियां हर दिन सीखती और आगे बढ़ती हैं!

लेकिन कुछ समय पहले मैंने एक चीज़ देखी, जिसने मुझे परेशान किया। स्कूल असेंबली या NCC परेड के दौरान अक्सर लड़कियाँ चक्कर खाकर गिर जाती थीं या तेज़ धूप में बेहोश हो जाती थीं। उन्हें तुरंत एक अस्पताल ले जाना पड़ता था, जो यहाँ से एक किलोमीटर दूर है। 

यह मुझे सही नहीं लगा और तभी मेरे मन में ख्याल आया कि.... हमारे स्कूल में छोटी-मोटी स्वास्थ्य समस्याओं के लिए एक क्लिनिक नहीं होना चाहिए? मुझे यह सोचकर ही अच्छा लगा कि उम्र 10 से 17 साल की हम सभी 4,000 लड़कियों को अगर स्कूल में ही मदद मिल जाए तो हमें कितना सेफ फील होगा!

जब मैंने अपने अध्यापकों से बात की, तो उन्होंने मुझे बताया कि हमारे स्कूल में पहले एक क्लिनिक था और लड़कियों की मदद के लिए दो नर्सें थीं! वे छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज स्कूल में ही करती थीं, जरूरी सलाह देती, और समय रहते बीमारी का पता लगा लेती थीं। सबके लिए क्लिनिक बहुत बड़ा सहारा था, लेकिन COVID-19 के दौरान स्कूल बंद होने पर क्लिनिक भी बंद हो गया।

अच्छी बात यह है कि बाद में स्कूल ने थिरुवनंतपुरम कॉरपोरेशन की मदद से क्लिनिक के लिए एक नई इमारत भी बनवा दी। लेकिन, समस्या ये हुई कि क्लिनिक खोलने के लिए डॉक्टर और नर्सें ही उपलब्ध नहीं थीं।

यहीं से मुझे लगा कि अब मुझे ही कुछ करना होगा। मैंने अख़बार मल्याला मनोरमा के एक सेक्शन के बारे में पढ़ा था, जहाँ छात्र अपनी समस्याएँ लिख सकते हैं। मैंने हिम्मत करके सीधे शिक्षा मंत्री श्री वी. सिवनकुट्टी को एक पत्र लिखा। अपनी चिट्‌ठी के जरिए मैंने दिल से बताया कि हमारे स्कूल में क्लिनिक होना कितना ज़रूरी है — यह सिर्फ मेरे लिए नहीं है, बल्कि कॉटन हिल की हर लड़की के लिए है।

और सोचो आगे क्या  हुआ? अगले ही दिन, अख़बार ने मेरा पत्र छाप दिया! 

उसी शाम शिक्षा मंत्री के कार्यालय से मुझे फोन आया। और अगले दिन मुझे मिलने के लिए बुलाया गया!

अगले दिन मैं अपनी प्रधानाचार्या, अध्यापकों और पीटीए की अध्यक्ष के साथ मंत्री के कार्यालय में पहुंची। वहां सबने मेरा समर्थन किया और हमने मंत्रीगण को क्लिनिक की जरूरत और इसका असर समझाया।

यहां अच्छी बात ये रही कि मंत्री जी ने ध्यान से हमारी बातें सुनी और हमारे पक्ष को समझा भी। उन्होंने समझा कि यह लड़कियों की सेहत और सुरक्षा के लिए कितना महत्वपूर्ण है। उन्होंने क्लिनिक फिर से खोलने में मदद करने का वादा किया। इतना ही नहीं, उन्होंने कहा कि वे पूरे केरल के सभी बच्चों के लिए स्वास्थ्य जांच और शायद एक हेल्थ कार्ड सिस्टम पर भी विचार करेंगे!

मैं सच में इस अहसास को शब्दों में ब्यां नहीं कर सकती। मेरी एक छोटी-सी चिट्ठी अब एक बड़ी शुरुआत बन चुकी है, जो सिर्फ हमारे स्कूल ही नहीं, बल्कि पूरे राज्य की लड़कियों को फायदा पहुँचा सकती है।

यह सब क्यों ज़रूरी है, खासकर लड़कियों के लिए?

क्योंकि..., हर लड़की को स्कूल में सुरक्षित और स्वस्थ महसूस करने का अधिकार है। उसे चक्कर आने या अचानक बीमार पड़ने की चिंता नहीं होनी चाहिए। स्कूल क्लिनिक होने से हम अपनी सेहत का बेहतर ध्यान रख पाएँगे, और पूरी तरह से पढ़ाई, खेल और अपने सपनों पर ध्यान दे सकेंगे।

मैं बहुत गर्व महसूस करती हूँ कि मेरी आवाज़ ने हज़ारों लड़कियों के लिए बदलाव की शुरुआत की है। स्कूल क्लिनिक सिर्फ इलाज की जगह नहीं है—यह सुरक्षा, आत्मविश्वास और सम्मान का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि हमारी सेहत मायने रखती है—और हम बदलाव ला सकते हैं।

....और यही वो बात है, जिसके लिए लड़ना चाहिए!

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