खुद से करें बचपन के अनकहे घावों को भरने का वादा

क्यों हर बच्चे के लिए मानसिक स्वास्थ्य अधिकार होना चाहिए, किसी विशेषाधिकार की तरह नहीं

आद्याशा प्रियदर्शिनी, युवा कंटेंट क्रिएटर, #Youth4UNICEF
A promise to heal the invisible scars of childhood — mental healthcare is every child’s right.
UNICEF A promise to heal the invisible scars of childhood — mental healthcare is every child’s right.
21 नवंबर 2025

हर संकट में कुछ ऐसे घायल भी होते हैं जिन्हें हम देख नहीं पाते। वे अस्पतालों में नहीं होते — वे बच्चों के दिलों और दिमाग में बस जाते हैं। इन घावों का इलाज बचपन में ही किया जाना चाहिए। किसी अगली आपदा, युद्ध, या बुलिंग के बाद नहीं। हर बच्चे को मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ पाने का अधिकार है, चाहे वह युद्ध क्षेत्र में बड़ा हो रहा हो, किसी संकट से गुज़र रहा हो, या बस स्कूल और घर की मुश्किलों से जूझ रहा हो।

बचपन हमारी पूरी ज़िंदगी को आकार देता है। फिर भी हम अक्सर बच्चों की भावनाओं को छोटा या महत्वहीन मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, जैसे वे समय के साथ भूल जाएंगें।

मुझे अपना बचपन आज भी याद है। कुछ बुलिंग की घटनाओं ने मेरे मन पर ऐसा असर डाला कि उन्होंने मेरे बड़े होने की सोच और आत्मविश्वास को बदल दिया। केजी क्लास की एक छोटी-सी घटना माने मेरे दिमाग में आज भी छपी हुई हो।

मैंने अपनी टीचर के लिए एक पेंटिंग बनाई थी। मेरी “सबसे अच्छी दोस्त” ने उसे छीनकर अपना बताकर टीचर को दे दिया। मुझे दर्द पेंटिंग खोने का नहीं था, मुझे दर्द हुआ था उस धोखे का... उलझन का, अपमान का जो मेरी सबसे अच्छी दोस्ट ने मुझे दिया था। तब मेरे पास इसे समझाने के लिए शब्द नहीं थे, लेकिन उस घटना ने मेरी मन पर एक गहरी चोट छोड़ दी।

जब मैंने घर पर इसके बारे में बताना चाहा, तो मुझे यह बोलकर टाल दिया गया कि, “इतनी सी बात पर परेशान नहीं होते।” लेकिन उसी “छोटी” बात ने मेरे भीतर भरोसे की कमी और आत्मसम्मान की समस्या पैदा कर दी।

धीरे-धीरे मैंने महसूस किया कि हमारा समाज और माता-पिता अक्सर यह भूल जाते हैं कि बच्चा, उससे की गई उम्मीदों से ज्यादा महत्वपूर्ण है। मैं गणित में अच्छी नहीं थी, जिसकी वजह से मैं (NEET) नीट भी नहीं निकाल पाई। लेकिन, जब मैं अच्छा करती थी, तब भी मुझे एहसास कराया जाता था कि मैं “अच्छी नहीं” हूँ।

जब मैंने मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवाज़ उठानी शुरू की, तो लोगों ने कहा कि मैं ऐसा इसलिए कर रही हूँ, क्योंकि मैं मेडिकल कॉलेज में नहीं जा पाई। रिश्तेदारों, शिक्षक, यहाँ तक कि मेरे अपने माता-पिता ने भी मेरी बात को गंभीरता से नहीं लिया।

फिर भी, मैं रुकी नहीं। मैंने लगातार काम किया, सीखती रही, समझाती रही। कई साल लगे, लेकिन धीरे-धीरे मेरे माता-पिता समझ पाए कि मैं किन मुश्किलों से गुजर रही हूँ, मुझे क्या चाहिए था, और मानसिक स्वास्थ्य मेरे लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है। अब वे मेरे काम में खुलकर मेरा समर्थन करते हैं।

बचपन बहुत नाज़ुक और संवेदनशील होता है। छोटे बच्चे हर उस बात को महसूस करते और समझते हैं जिसे बड़े लोग अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। भरोसा, डर, गुस्सा, आत्मविश्वास—ये सब बचपन में ही आकार लेने लगते हैं। जब हम बड़े लोग सोचते हैं कि बच्चे अभी छोटे हैं उन्हें कुछ समझ नहीं आएगा।

लेकिन, बच्चे सब कुछ अपने मन में गहराई से दर्ज कर लेते हैं। जब उनकी भावनाओं को नज़रअंदाज़ किया जाता है, उन्हें गलत ठहराया जाता है या उन पर ज़रूरत से ज़्यादा दबाव डाला जाता है, तो उसका असर धीरे-धीरे उनके कोमल मन पर होने लगता है और लंबे समय तक साथ रहता है।

आज स्थिति और भी जटिल हो गई है। बच्चे बेहद थकाने वाले स्तर पर साथियों का दबाव और कड़ी प्रतिस्पर्धा झेल रहे हैं। कई बच्चे ऑनलाइन और ऑफलाइन बुलिंग का सामना कर रहे हैं। कुछ पर पढ़ाई, समाज और भावनाओं से जुड़ी उम्मीदें इतनी ज़्यादा डाल दी जाती हैं कि वे अक्सर बिना किसी के ध्यान में आए थकान, तनाव और मानसिक समस्याओं में डूब जाते हैं।

हम बच्चों और किशोरों में चिंता, अवसाद और यहां तक कि आत्महत्या के मामलों में बढ़ोतरी देख रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद, हम अब भी ऐसे व्यवहार करते हैं, जैसे बच्चे बड़े लोगों की तरह टूटते नहीं हैं। इसके अलावा, संकटग्रस्त क्षेत्रों में रहने वाले बच्चे युद्ध, विस्थापन, आपदाओं, अपनों को खोने का दर्द और लगातार असुरक्षा जैसी कठिन स्थितियों का सामना कर रहे हैं।

ये बच्चे अपने घर, स्कूल और परिवार के लोग तक खो देते हैं। उनकी सुरक्षा का पूरा एहसास टूट जाता है, और उनके मन के घाव किसी को दिखाई भी नहीं देते। ऐसे माहौल में उनकी मानसिक स्थिति और उनके भीतर दबे हुए दुख और डर के बारे में सोचकर ही मन कांप जाता है—क्योंकि इतनी भयानक परिस्थितियों में ना ही कोई उनकी भावनाओं को समझता और ना ही उन्हें व्यक्त करने की जगह मिलती।

मानसिक स्वास्थ्य को हर संकट प्रतिक्रिया का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए—चाहे वह स्कूलों में हो, आपदा राहत शिविरों में या संघर्ष वाले क्षेत्रों में। इसे भोजन, आश्रय और दवाइयों की तरह ही हर आपातकालीन सहायता किट में शामिल किया जाना चाहिए। हम मानसिक स्वास्थ्य को अब एक ऐच्छिक या “बाद में देखने वाली” चीज़ की तरह नहीं ले सकते।

बच्चे आघात (ट्रॉमा) को अलग तरह से समझते और झेलते हैं। वे इसके बारे में खुलकर नहीं बताते, लेकिन यह उनके व्यवहार में दिखता है — जैसे अकेले हो जाना, गुस्सा या डर। उन्हें ऐसी देखभाल की ज़रूरत होती है जो लगातार मिले, समुदाय आधारित हो, और उनकी संस्कृति को समझते हुए दी जाए। यदि हम स्वस्थ बच्चे और एक स्वस्थ समाज चाहते हैं, तो हमें यह सब बहुत पहले से शुरू करना होगा।

माता-पिता को प्रशिक्षण दें। शिक्षकों को प्रशिक्षण दें। स्वास्थ्यकर्मियों और राहत-कर्मियों को भी तैयार करें। स्कूलों में सुरक्षित स्थान बनाएं। सामान्य काउंसलिंग को आम करें। बच्चों को सिखाएं कि उनकी भावनाएँ सही हैं और मायने रखती हैं। वहीं बड़ों को सिखाएं कि अपने बच्चों को कैसे ध्यान से सुनना है।

मानसिक स्वास्थ्य कोई विलासिता नहीं है — यह आवश्यकता है। हर बच्चे को सिर्फ सुरक्षित बचपन ही नहीं, बल्कि भावनात्मक रूप से सहारा देने वाला बचपन भी मिलना चाहिए। उनके मन महत्वपूर्ण हैं। उनकी भावनाएँ महत्वपूर्ण हैं। अब समय आ गया है कि हमारी नीतियाँ और हमारे कदम इस सच्चाई को सच में अपनाएँ।

इस बाल दिवस पर, आइए हम बच्चों से यह वादा करें कि हम उन्हें ऐसा बचपन देंगे, जो सिर्फ शारीरिक रूप से सुरक्षित ही नहीं, बल्कि भावनात्मक रूप से भी मजबूत और सहारा देने वाला हो।

ब्लॉग के बारे में

यूनिसेफ अपने हर काम में प्रत्येक बच्चे के अधिकारों और कल्याण को बढ़ावा देता है। अपने साझेदारों के साथ मिलकर, यूनिसेफ बच्चों के अधिकारों और सुरक्षित बचपन को व्यावहारिकता में बदलने के लिए 190 देशों और क्षेत्रों में काम कर रहा है।

यूनिसेफ इंडिया के और इसके कामों के बारे में अधिक जानकारी के लिए https://www.unicef.org/india/hi पर विजिट करें।

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