बच्चों के लिए न्याय

बच्चों के सर्वश्रेष्ठ हित के लिए न्याय करने के साथ-साथ, बाल सुरक्षा को पूर्ण रूप से सुदृढ़ बनाने के लिए सामूहिक प्रयास करना l

Inaugural Session,Shri Rabindra Panwar, Secretary, MWCD,Honorable Mr. Justice Deepak Gupta, JJC Chairperson & Judge Supreme Court,Justice Lokur, retired Judge Supreme Court,Dr. Yasmin Haque, Representative, UNICEF India
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बच्चों के लिए न्याय

बच्चे न्याय प्रणाली के संपर्क में पीड़ित, गवाह या अपराधी किसी भी रूप में आ सकते हैं। फिर भी न्याय प्रणाली अक्सर वयस्कों को ध्यान में रखकर बनाई गई होती है, जो बच्चे को भाग लेने के लिए आवश्यक स्थान नहीं देती।

एक बच्चे को (विशेष रूप से पीड़ित बच्चे को) कार्यवाही को समझने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की ज़रूरत होती है। और यदि वह कथित या दोषी अपराधी है, तो दंड और पुनर्वास के बीच का संतुलन पुनर्वास की ओर झुका होना चाहिए।

अपराध के शिकार और गवाह बच्चे अक्सर ऐसी न्याय प्रणालियों द्वारा दोबारा पीड़ित किए जाते हैं जो उनके अधिकारों और ज़रूरतों के अनुरूप नहीं होतीं। पुलिस, अभियोजक और न्यायाधीश सहित पेशेवरों में अक्सर बाल पीड़ितों और गवाहों से निपटने का विशेष प्रशिक्षण नहीं होता। संबंधित प्रक्रियाएँ भी शायद ही कभी बाल-संवेदनशील होती हैं।

बाल पीड़ितों की न्याय तक पहुँच अक्सर कई बाधाओं से रुकी रहती है — जैसे अपने अधिकारों के बारे में जानकारी का अभाव, अदालत और कानूनी प्रतिनिधित्व की फीस, और अधिकारों के उल्लंघन को न्याय तक पहुँचाने के लिए वयस्कों पर निर्भरता।

बच्चे नागरिक या पारिवारिक कानून से जुड़े मामलों में भी न्यायिक प्रणाली के संपर्क में आ सकते हैं जैसे हिरासत, तलाक की सुनवाई, घरेलू हिंसा के गवाह या वैकल्पिक देखभाल में नियोजन। अक्सर, आपराधिक कार्यवाही की तरह ही, इन मामलों में भी उनकी बात नहीं सुनी जाती।

बच्चों के मामले अक्सर वयस्कों के लिए बनाई गई न्याय प्रणालियों के ज़रिए निपटाए जाते हैं, जो बच्चों के अधिकारों और उनकी विशेष ज़रूरतों के अनुरूप नहीं होतीं।

स्वतंत्रता से वंचित करने को केवल अंतिम उपाय के रूप में और यथासंभव कम से कम समय के लिए उपयोग किए जाने के सिद्धांत का उल्लंघन करते हुए, किशोर अपराधियों के लिए स्वतंत्रता से वंचित करना आज भी दंड का एक सामान्य तरीका बना हुआ है। जिन्हें अक्सर कई वर्षों तक और कुछ मामलों में अनिश्चित काल तक हिरासत में रखा जाता है।

पूरे दक्षिण एशिया में बच्चों को आव्रजन, मानसिक स्वास्थ्य या उनकी अपनी 'सुरक्षा' के संदर्भ में भी हिरासत में रखा जाता है। किसी बच्चे को प्रशासनिक रूप से हिरासत में लेने के फैसले संदर्भ, तर्क और कानूनी ढाँचे के लिहाज़ से भले ही अलग-अलग हों, लेकिन आमतौर पर यह निर्णय किसी न्यायाधीश या अदालत द्वारा नहीं, बल्कि किसी अन्य निकाय या ऐसे पेशेवर द्वारा लिया जाता है जो सरकार की कार्यपालिका शाखा से स्वतंत्र नहीं होता।

आपराधिक जिम्मेदारी की न्यूनतम आयु बहुत कम रखना भी बच्चों पर हानिकारक प्रभाव डालता है। भारत में आपराधिक जिम्मेदारी की न्यूनतम आयु सात वर्ष है, जो अंतर्राष्ट्रीय मानक से कम है।

किसी बच्चे की गिरफ्तारी, हिरासत या कारावास का उपयोग केवल अंतिम उपाय के रूप में और यथासंभव कम से कम समय के लिए ही किया जाना चाहिए। कानूनों, विनियमों और नीतियों को तदनुसार अनुकूलित किया जाना चाहिए, पेशेवरों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए और जहाँ समुदाय-आधारित विकल्प मौजूद नहीं हैं, वहाँ उन्हें स्थापित किया जाना चाहिए।

यूनिसेफ हिरासत के विकल्पों को बढ़ावा देता है जैसे डायवर्शन (Diversion), पुनर्स्थापनात्मक न्याय (Restorative Justice) के तरीके और स्वतंत्रता से वंचित करने के विकल्प जो आम तौर पर बच्चों के अधिकारों की प्राप्ति के लिए अधिक अनुकूल हैं। ये सार्वजनिक सुरक्षा के हित में भी हैं और अधिक किफायती साबित हुए हैं।

बच्चों के लिए न्याय एक ऐसा दृष्टिकोण है जो न्याय प्रणाली के संपर्क में आने वाले सभी बच्चों के लाभ के लिए बनाया गया है। ताकि, उनकी बेहतर सेवा और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। यह दृष्टिकोण न्याय तंत्र सहित बाल संरक्षण प्रणाली के सभी हिस्सों को बच्चों के सर्वोत्तम हित में काम करने के लिए मज़बूत बनाने को बढ़ावा देता है।

यूनिसेफ की भूमिका

यूनिसेफ उन पेशेवरों के साथ मिलकर काम करता है, ताकि अपराध के बाल पीड़ितों और गवाहों के लिए बाल-संवेदनशील प्रक्रियाएँ स्थापित की जा सकें और पेशेवरों को तदनुसार प्रशिक्षित किया जा सके।

ऐसी प्रक्रियाएँ, उदाहरण के लिए, बच्चे और कथित अपराधी के बीच संपर्क को रोकती हैं, बच्चे को प्रक्रिया में पूर्ण रूप से भाग लेने का अवसर देती हैं और यह सुनिश्चित करती हैं कि हर समय उसके साथ गरिमा और सहानुभूति के साथ व्यवहार किया जाए।

हम यह सुनिश्चित करने के लिए काम करते हैं कि सभी बच्चे (जिनमें विशेष और हाशिए पर रहने वाले) बच्चे भी शामिल हैं। अपने अधिकारों के बारे में और उल्लंघनों के लिए निवारण के रास्तों के बारे में जानकार हों और इन प्रक्रियाओं के दौरान उन्हें सहायता मिले।

यूनिसेफ पुलिस, अभियोजकों, न्यायाधीशों, वकीलों, सामाजिक सेवाओं और स्वास्थ्य पेशेवरों के प्रशिक्षण में सहयोग करता है ताकि न्याय प्रणाली के संपर्क में आने वाले बच्चों की प्रभावी ढंग से सुरक्षा की जा सके।

सर्वोच्च न्यायालय के साथ साझेदारी में, यूनिसेफ इंडिया ने न्याय प्रणाली में बच्चों के पुनर्वास की स्थिति की समीक्षा के लिए राज्य-स्तरीय परामर्शों की एक श्रृंखला का समर्थन किया। जिसमें यौन शोषण पीड़ितों और कानून से संघर्ष में रहने वाले बच्चों पर विशेष ध्यान दिया गया। इससे निगरानी और जवाबदेही तंत्र में नवाचार और सुधार हुए।