शर्म ना करो, अब चुप्पी तोड़ो, माहवारी पर झिझक छोड़ो

अभी भी हजारों लाखों महिलाएं रिस्क पर हैं, चुप्पी तोड़ो बात करो

By Nisha Dhull, Communication Officer (Hindi)
UNICEF India Staff Taking the RedDotChallenge
UNICEF
16 जुलाई 2025

 तीन साल पहले जब मैं एक प्रतिष्ठित संस्थान में कार्यरत थी, तब माहवारी के दिनों में मेरे इंचार्ज ने मुझे छुट्टी देने में आनाकानी की। नतीजन मैं दर्द के मारे ऑफिस के ही फर्श पर बेहोश होकर गिर पड़ी। अगले दिन मैंने जब अधिकारी से इस बारे में बात की और छुट्टी मांगनी चाही, तो उन्होंने कहा कि वह ऐसे टॉपिक पर बात नहीं करना चाहते। मुझे सुनने को मिला कि बराबरी की तनख्वाह चाहिए तो काम भी बराबरी का करना पड़ेगा।  

“खैर, जब तक मैं वहां कार्यरत रही मुझे महीने-दर-महीने उस असहनीय बदन दर्द, जकड़न के साथ ही काम करना पड़ा, कभी काम में रियायत या छुट्टी नहीं मिली और ना ही इसके बारे में बात हुई। इन दिनों शरीर में ज्यादा ताकत नहीं रहती है, लेकिन लगभग 40-45 डिग्री तापमान में भी... पीरियड्स पेन, मूड स्विंग, डिहाइड्रेशन, पसीने से होने वाले रैशेज, डिस्कंफर्ट, लो बीपी में भी फिल्ड वर्क के लिए चिलचिलाती दोपहर की धूप में भी भागना सामान्य बात थी। घंटों ऑफिस में बैठकर काम करने की उम्मीद की जाती थी, लेकिन यह सब मेरे लिए आसान नहीं था।" 

ये कहानी सिर्फ मेरी ही नहीं बल्कि देश भर की अनगिनत निशाओं की है, जिन्हें हर महीने ‘ऐसे ही काम करना पड़ता है…!’ 

थक हारकर मैं हर महीने एक ही बात सोचती हूँ,"आखिर क्यों नहीं समझते लोग माहवारी और इससे जुड़ी हुई समस्याओं को? काश हम महिलाएं 'पीरियड्स के दौरान काम को 'ना' कह सकें या बाद में करने की अनुमति मिलें", "अगर पीरियड्स को लोग समझें तो ये सभी महिलाओं, लड़कियों के लिए बेहतर होगा।"  

Menstrual Hygiene day
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21वीं सदी में भी पीरियड्स के बारे में गलत धारणाएं 

माहवारी प्रकृति का वरदान है, यही महिला को मातृत्व का सुख देता है, लेकिन अभी भी हम इसके बारे में बात नहीं करते। जब किसी लड़की को पहली बार माहवारी होती है, तो वह 'वयस्क' हो जाती हैं। हर लड़की को माहवारी होती है, यह जीवन को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी भी है। लेकिन अभी भी इसको समाज में हेय समझा जाता है, अभी भी भारत में कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जहां पर माहवारी के दौरान लड़कियां, महिलाएं शादी के रीति-रिवाजों में शामिल नहीं हो पाती, हवन-पूजा, विधि-विधान से लेकर किसी शुभ काम में उन्हें शामिल नहीं किया जाता। 

महावारी के दौरान महिलाओं और लड़कियों को अशुद्ध समझा जाता है, और चार-पांच दिनों के लिए उन्हें घर अथवा स्कूल से अलग-थलग कर दिया जाता है। वे पीने के पानी के लिए, न ही मटके को छू सकती हैं और न ही रसोईघर में जा सकती हैं। गर्मी हो या सर्दी उस दर्द में भी उन्हें सोने के लिए उन्हें घर में अलग थलग जगह दे दी जाती है या फिर सख्त जमीन पर एक मामूली सी चटाई नसीब होती है, जिसमें सर्दियों में ना ठंड रूक पाती है और गर्मियों में भी परेशानी होती है। 

विडंबना यह है कि 21वीं सदी में भी माहवारी को संकोच, शर्म और डर का विषय माना जाता है। सेनेटरी पैड कभी मेडिकल स्टोर से काले पॉलीथिन में डिलीवर होते नजर आते हैं तो, कहीं दूर-दराज के गांव में लड़कियों और महिलाओं को माहवारी के दौरान इस्तेमाल किया गया कपड़ा या पैड फेंकने में परेशानी होती है। 

आलम ये है कि आज भी कई घरों में लड़कियां माहवारी के दिनों में अपने पिता, भाई, पति या बेटे के सामने छुपकर, शर्माते हुए नजरें चुराती नजर आती हैं। उन्हें डर रहता है कि घर के पुरुषों को कहीं पता ना चल जाए। इसके जिम्मेदार समाज में महावारी को लेकर प्रचलित अवधारणाएं है जिसने पुरुष को कभी अपनी मां, बहन, बीवी या बेटी को होने वाली इस प्राकृतिक प्रक्रिया को समझने ही नहीं दिया।  

मासिक धर्म की शुरुआत लड़कियों के लिए मानसिक, शारीरिक तनाव के साथ-साथ सामाजिक दबाव भी लाती है, जो समाज की रूढ़िवादी सोच व परंपराएं उन्हें अपनी चिंताओं और स्थिति के बारे में सवाल पूछने और बोलने से रोकती हैं। जहां वह स्कूल जाने से कतराने लगती हैं। 

दोस्तों के साथ खेल के मैदान में बीतने वाला उनका पसंदीदा समय अब क्लास रूम या घर के कमरे में सिमट कर रह जाता है और यही सब एक समय के बाद मानसिक तनाव बन जाता है। माहवारी जीवन का बहुत ही आवश्यक पहलू है, उसके बावजूद सामाजिक कुरूतियों के कारण इसे नारी जीवन का अभिशाप समझा जाता है। क्योंकि कितनी ही लड़कियां स्कूल में शौचालय नहीं होने के कारण या गंदे शौचायल होने के कारण पढ़ाई तक छोड़ देती हैं।  

आज के आधुनिक समय में महावारी से जुड़ी भ्रांतियों को पूरी तरह खत्म करने की जरूरत है। एक लड़की के जीवन में होने वाले इन खास बदलावों में न सिर्फ घर की औरतें, बल्कि मर्दों को भी बराबरी का सहयोग करना चाहिए। हर घर में महावारी के दौरान महिलाओं व लड़कियों के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए, ताकि महावारी में होने वाली समस्याओं पर पिता और भाई के साथ भी खुलकर बात की जा सके। माहवारी के दिनों में महिलाओं को प्रर्याप्त सैनिटरी प्रोडक्ट उपलब्ध कराये जाने चाहिए। इस बारे में सरकार के कई अभियान चल रहे हैं, जिन्हें यूनिसेफ द्वारा सपोर्ट किया जाता हैं। 

आइये इस मेंस्ट्रुअल हाइजीन डे पर पीरियड्स के बारे में बात करें। क्योंकि, घर हो या ऑफिस अब जरूरत है चुप्पी तोड़ते हुए खुलकर बात करने की। क्योंकि मानव जीवन को आगे बढ़ाने के लिए प्रकृति का वरदान है। 

 

मैं आप सबसे बात कर रही हूं, पूरे समाज से बात कर रही हूं, आइये आज से एक नई शुरूआत करें और माहवारी के बारे में अपने जीवनसाथी, बेटे-बेटियों, घर, ऑफिस, महिला मित्रों से सहज होकर बात करें, ताकि महावारी के दौरान किसी भी समस्या का सामना ना करना पड़े और जीवन के कार्य सामान्य रूप से जारी रहें।