वेस्टवाटर रिसाइक्लिंग से बदली दार्जिलिंग के बच्चों की थाली

जो पानी बहता था नाली में, उसी से लहलहाई क्यारी — बच्चों को मिला पौष्टिक भोजन

प्रज्ञान भारती और निरमा बोरा
A man inspects a rural water filtration and storage system, consisting of concrete tanks and a gravel filter bed, on a hillside surrounded by trees and farmland.
UNICEF/UNI973274/Biswas
20 अप्रैल 2026

दार्जिलिंग, भारत 42 वर्षीय दावा शेर्पा कभी अपने सूखे खेतों को देखते हुए बड़े सपने बुना करते थे। दार्जिलिंग की धुंध भरे पहाड़ी खेतों में टमाटर, फलियाँ और मिर्च से लहलहाते खेत उनका सपना था। जिससे न सिर्फ उनके परिवार का पेट भरें, बल्कि पास के आंगनवाड़ी केंद्र तक भी अपने हाथों से तोड़ी हुई सब्जियाँ पहुँचा सके। 

वे चाहते थे कि उनके बच्चे फल, दालें और दूध से भरपूर पौष्टिक खाना खाएं और खेतों में उगी हुई फसलें उनकी आमदनी का साधन का बनें। लेकिन, जलवायु परिवर्तन उनके सपनों के सामने एक कड़वी हकीकत की तरह खड़ा था। 

देर से आते मानसून, बेतरतीब बारिश और बढ़ते तापमान ने पहाड़ के बारहमासी झरनों को मौसमी नालों में बदल दिया। खेती करना लगभग मुश्किल हो गया और बच्चों के पोषण पर संकट के बादल छा गए। 

2013 से 2024 के बीच दार्जिलिंग में भूजल दोहन 6 प्रतिशत से बढ़कर 16.4 प्रतिशत तक पहुँच गया। जनवरी से जून तक लगातार कभी मूसलाधार बारिश, तो कभी पानी की भारी किल्लत से झूझना ही यहां के लोगों की जमीनी सच्चाई बन चुका था।

इसी मुश्किल दौर के बीच केंद्र सरकार की स्वच्छ भारत मिशन योजना से दावा जैसे किसानों को नई उम्मीद मिली और उनकी जिंदगी बदल गई। योजना के तहत ग्राम पंचायत प्रधान चाँदनी तमांग ने यूनिसेफ और ज़िला प्रशासन द्वारा आयोजित ग्रे वॉटर मैनेजमेंट (GWM) प्रशिक्षण में हिस्सा लिया था। प्रशिक्षण से मिले ज्ञान को लेकर वे अपने गाँव लौटीं और सरकारी समर्थन से जीडब्लयूएम (GWM) इकाई लागू करने की पहल की।

यह तकनीक बहुत ही सरल है। इसमें रसोई, बाथरूम और कपड़े धोने के बाद बचे हुए “बेकार” पानी को रेत, बजरी और चारकोल से बनी प्राकृतिक फ़िल्टर प्रणाली से साफ़ करके खेतों की सिंचाई के लिए पुर्नउपयोग में लाया जाता है।

A smiling man pours clean water from a pink cup into a bucket beside a yellow storage drum connected to a water pipe, in a green rural hillside setting.
UNICEF/UNI973277/Biswas Dawa took the first step to reuse household wastewater from kitchens and baths to irrigate his fields in a region grappling with shrinking water sources

दावा शेर्पा ने हिम्मत करते हुए आगे कदम बढ़ाये और वर्ष 2023 में अपनी ज़मीन पर पंचायत की पहली जीडब्लयूएम (GWM) इकाई लगवाई। इसे बनाने में सिर्फ 51,000 रूपये यानी (लगभग USD 553) का खर्च आया, जो स्वच्छ भारत मिशन और 15वें वित्त आयोग के संयुक्त फंड से जुटाया गया।

शुरुआत में पड़ोसियों ने मजाक उडाया, यहां तक कि कुछ ने तो तंज कसते हुए कहा कि, “बाथरूम के पानी से फ़सल अच्छी नहीं होगी।!” लेकिन दावा ने किसी की बातों की परवाह न करते हुए पंचायत प्रधान के समर्थन से उपचारित पानी को पुर्नउपयोग के लिए अपने खेतों तक पहुँचाया। 

आज सकारात्मक नतीजे सबके सामने हैं। यह इकाई 20 घरों से हर हफ़्ते 800 लीटर पानी को फिल्टर करके पुर्नउपयोग के योग्य बनाती है। जो ज़मीन कभी सूखकर बंजर हो चुकी थी, आज वहां हरी-भरी सब्जियाँ लहलहाती हैं। 

A smiling woman tills dark soil with a wooden hoe on a rural farm, with another farmer working in the background near bags of compost.
UNICEF/UNI973225/Biswas Arti Sherpa is a vulnerable farmer in the hills, where environmental changes are steadily eroding traditional sources of water and income.

“मैं बारिश पर निर्भर खेती करती हूँ, इसलिए मानसून के सिवाय बाकी समय खेती करना बहुत ही मुश्किल हो जाता है। 2018 के भूकंप के बाद से प्राकृतिक झरने सूखने लगे। अगर मुझे भी ये ग्रे वॉटर मिल जाए, तो मैं सर्दियों में भी फ़सल उगा सकती हूँ। इससे मेरी आमदनी भी बढ़ेगी और खेती पर भरोसा लौटेगा।”

आरती शेर्पा, पड़ोसी किसान

सामुदायिक भागीदारी में ज़बरदस्त वृद्धि होने से 2023 के बाद से आसपास के गाँवों में 11 ओर GWM इकाईयाँ लग चुकी हैं।

यह पहल खामोशी से अपने साथ एक बड़ा बदलाव लेकर आई है। बता दें कि उत्तर बंगाल में पानी लाने की ज़िम्मेदारी पीढी-दर-पीढ़ी किसी परंपरा के तरह महिलाओं पर ही रही है। लेकिन, GWM ने काम की साझेदारी महिला और पुरूषों दोनों में एक-समान रूप से बांट दिया। अब पुरुष जहां भारी जुताई करते हैं, वहीं महिलाएँ बीज बोने से लेकर सिंचाई और कटाई तक खेती के पूरे जीवनचक्र को संभालती हैं।

इसी मेहनत के दम पर ग्राम पंचायत को पंचायती राज मंत्रालय के SDG स्थानीयकरण कार्यक्रम के तहत राष्ट्रीय स्तर पर “मॉडल महिला एवं बाल-अनुकूल ग्राम पंचायत” का सम्मान भी मिल चुका है।

A group of five community members, mostly women, till and plant a farm field together beside a traditional two-storey village house on a hillside.
UNICEF/UNI973251/Biswas Women farmers harvest potatoes from a field in Chota Mangwa, Darjeeling, where agriculture remains closely tied to uncertain water availability

“पहले खाना उगाना मुश्किल था, बच्चों की थाली में पौष्टिक आहार नहीं था। अब उपचारित पानी से हम गमियों-सर्दियों-मानसून हर सीजन में सब्ज़ियाँ उगा पा रहे हैं। अब घर की उगी सब्जियों से ही बच्चों को थाली में पौष्टिक आहार मिलता है। ये सिर्फ सब्जियों की खेती नहीं, बल्कि हमारे बच्चों के भविष्य की उम्मीद है।”

दीप्ति राई, पड़ोसी किसान
Three men work together hoeing between rows of young maize seedlings on a lush green farm field, surrounded by dense forest.
UNICEF/UNI973233/Biswas Sujoy Tamang (right), 42, a farmer from Chota Mangwa in Darjeeling, stands on his field where water scarcity continues to limit agricultural productivity.

“मैंने इस तकनीक के उपयोग से दावा को अच्छी सब्जियां उगाते और बाजार से अच्छा पैसा कमाते हुये देखा। अब मैं भी अपनी जमीन पर ये इकाई लगवाकर इसका इस्तेमाल करूँगा। यह तकनीक आने वाले सालों में इस इलाके के लिए बहुत काम की साबित होगी।”

सुजोय तमांग, पड़ोसी किसान

दावा ही मेहनत का फल ये है कि सिर्फ 9 महीने में ही वे अपनी जमीन पर 5 क्विंटल टमाटर, 6 क्विंटल फलियाँ और 50 किलो मिर्च उगाते हैं। इससे वह एक सीज़न में लगभग 1 लाख रूपये यानी (USD 1085) कमा लेते हैं।

उनकी उगाई गई सब्जियां दार्जिलिंग, सिलीगुड़ी और कालिम्पोंग के बाज़ारों तक पहुँचती है, और साथ ही स्थानीय आंगनवाड़ी केंद्र में भी। जहाँ 0-6 साल के बच्चों को पूरक पौष्टिक आहार मिलता है।

A young toddler in a green vest holds a spoon and eats from a steel bowl of rice and egg, supported by a caregiver in a navy sweatshirt.
UNICEF/UNI973185/Biswas Ishant Chhetri, 2 years 9 months, eats his meal at the ICDS center in Chota Mangwa, Darjeeling

“पौष्टिक खाना इस बात पर निर्भर करता है कि हम क्या उगाते हैं। लेकिन, इस एरिया में पानी हमेशा से एक चुनौती रहा है। अगर उपचारित ग्रे वॉटर से किचन गार्डन में सब्ज़ियाँ उगाई जाएं, तो आंगनवाड़ी में बच्चों के खाने में विविधता आएगी। हम माएं चाहती हैं कि हमारे बच्चे सिर्फ भरपेट (पेट भरकर नहीं), बल्कि पौष्टिक खाना खाकर बड़े हों।”

2 वर्षीय ईशान छेत्री की माँ, श्रीजना
A group of young mothers and their toddlers sit together on the floor of a community centre, sharing nutritious meals of rice and egg from steel plates.
UNICEF/UNI973172/Biswas Children gather with their mothers at the ICDS centre in Chota Mangwa, Darjeeling, sharing a joyful moment of play and meals as they laugh and eat together.

पानी की बढ़ती किल्लत के इस दौर में दार्जिलिंग की यह कहानी एक मिसाल है। दावा खुद इस बदलाव के उदाहरण बने हैं। वेक्टर बोर्न डिज़ीज़ कंट्रोल कमेटी के सदस्य के रूप में वे GWM इकाई का रोज़ाना प्रबंधन करते हैं और गाँव के युवाओं सहित अन्य लोगों को पानी के पुर्नउपयोग का महत्व समझाते हैं।

पंचायत प्रधान चाँदनी तमांग ने इस इकाई के रखरखाव का खर्च पंचायत के सालाना बजट में शामिल करने की योजना बनाई है। साथ ही वे ब्लॉक प्रशासन के साथ मिलकर यह भी देखेंगे कि आंगनवाड़ी में मिलने वाले इस स्थानीय पैष्टिक आहार का बच्चों की सेहत पर क्या असर पड़ रहा है।

Five officials stand together outside the Gram Panchayat Pradhan Office in Taklinh-1, Darjeeling district, West Bengal, with the central figure dressed in traditional Tibetan attire.
UNICEF/UNI973192/Biswas Ms Chandni Tamang, Sarpanch of Takling‑I Gram Panchayat in Darjeeling (centre), poses for a picture with Gram Panchayat workers who have played a key role in leading the community’s response to water scarcity in the Himalayan hills.

“हर बूँद में हरे जीवन, उम्मीद भरे दिलों और खिलते बच्चों को सींचने की ताकत है, फिर चाहे वो पानी रिसाइकिल किया हुआ ही क्यों न हो।”

कम लागत में, बिना किसी बड़ी तकनीक के, सिर्फ एक सामुदायिक सोच और इच्छाशक्ति से नाली में बहने वाले पानी से खेतों में क्यारियां लहलहा उठी। दावा की सफलता यह साबित करती है कि संकट में भी हल मुमकिन है, बशर्ते समुदाय एकजुट हो, और पानी की किसी बूँद को बेकार न समझा जाए।

वॉश विशेषज्ञ और वॉश सलाहकार