लड़कियों की ख़ामोशी से निकलती आत्मविश्वास की राह

ओडिशा के दुतिमेंडी में यूनीसेफ़ के तकनीकी सहयोग से अपनाई (MHM) कोना पहल से लड़कियों की स्कूल में भागीदारी बढ़ी और बाल विवाह के मामलों में कमी आई

सोनिया सरकार, यूनिसेफ इंडिया
“At Dutimendi Panchayat High School in Kandhamal, Odisha, increased girls’ enrolment and a decline in child marriage follow the introduction of a Menstrual Hygiene Management Corner, established with technical support from UNICEF.”
UNICEF/UNI891771/Parashar
08 जनवरी 2026

ओडिशा के पूर्वी घाटों में बसे, घने जंगलों से घिरे आदिवासी ज़िले कंधमाल की घुमावदार पगडंडियाँ जब हमें दुतिमेंडी और दुतिपाड़ा स्कूलों तक ले जाती हैं, तो हवा में एक शांत उत्सव की अनुभूति होती है। जो जगहें कभी खामोश थीं, वहाँ अब धीरे-धीरे बदलाव की कहानी लिखी जा रही है।

कन्धमाल में बदलाव किसी बड़े अभियान या घोषणा से नहीं आया। यह बदलाव स्कूलों के उन छोटे-छोटे कोनों से शुरू हुआ है, जहाँ लड़कियों को माहवारी के दौरान गरिमा और निजता मिली है - और वहीं से शिक्षा जारी रखने तथा बाल विवाह से बाहर निकलने का रास्ता भी खुलता है।

आज लड़कियाँ बिना झिझक, बिना डर और पूरे आत्मविश्वास के स्कूल आ रही हैं। इसके साथ ही, बाल विवाह की दर में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है।

इस परिवर्तन की नींव रखी - स्कूलों में शौचालय उपलब्ध कराने वाले स्वच्छ भारत मिशन ने। फिर प्रदेश सरकार की प्रमुख किशोर सशक्तिकरण पहल ‘अदविका’ (ADVIKA) ने इस प्रयास को आगे बढ़ाया। यूनीसेफ़ और UNFPA के सहयोग से चल रहा यह कार्यक्रम, अब ओडिशा के सभी 30 ज़िलों में 25 लाख से अधिक किशोर-किशोरियों तक पहुँच चुका है।

स्वास्थ्य, शिक्षा, अधिकार और मासिक धर्म स्वच्छता को जोड़ते हुए यह पहल हर युवा के लिए सशक्तिकरण की एक मजबूत कहानी गढ़ रही है।

स्कूलों में सुरक्षित स्थान

इस आदिवासी क्षेत्र में पीढ़ियों तक माहवारी पर धीमी आवाज़ में बात की जाती थी। यह चुप्पी अक्सर बच्चियों की स्कूल से गैरहाज़िरी या कम उम्र में शादी का कारण बनती थी। कई लड़कियाँ माहवारी के दौरान स्कूल छोड़ देती थीं। यौवन की शुरुआत को समुदाय में उत्सव के रूप में मनाया जाता था, लेकिन यही आयोजन अक्सर विवाह की चर्चा की शुरुआत बन जाते थे।

दुतिमेंडी पंचायत हाई स्कूल की कक्षा 9 की छात्रा पायल को आज भी याद है कि उनके लिए पहले माहवारी का क्या मतलब होता था।

वो बताती हैं, “पहले माहवारी होने पर मैं स्कूल नहीं जाती थी। मुझे शर्म महसूस होती थी। अब स्कूल में माहवारी प्रबन्धन (MHM) कोना हमारे लिए निजी जगह है, कपड़े बदलने के लिए शौचालय है और पैड मिलते हैं।”

लड़कियों के शौचालय के पास बना यह MHM कोना साफ़-सुथरा और निजी स्थान है। यहाँ सैनिटरी पैड, पानी, सुरक्षित निस्तारण के लिए डिब्बे और ओड़िया तथा स्थानीय आदिवासी भाषाओं में जानकारी देने वाले पोस्टर उपलब्ध हैं।

यह सुविधा, यूनीसेफ़ के तकनीकी सहयोग से, स्कूल की दैनिक व्यवस्था का हिस्सा बन चुकी है।

यूनीसेफ़ ओडिशा की WASH विशेषज्ञ शिप्रा सक्सेना ने बताया कि, “लड़कियों को जो निजता और गरिमा मिली है, वही इस पहल की सबसे बड़ी सफलता है। वे अब आत्मविश्वास के साथ स्कूल आ रही हैं। यह जगह उनकी अपनी जगह बन गई है।”

शिक्षकों से हुई शुरुआत

दुतिपाड़ा सरकारी हाई स्कूल में प्रधानाध्यापिका अम्बिका प्रधान और शिक्षिका खुंटिया ने बदलाव की शुरुआत निर्माण से नहीं, बल्कि बातचीत से की।

अम्बिका प्रधान कहती हैं, “केवल कोना बनाना पर्याप्त नहीं था। लड़कियों को यह महसूस होना भी ज़रूरी था कि यह जगह सुरक्षित है।”

खुंटिया बताती हैं कि, “पहले लड़कियाँ, माहवारी के समय घर पर रहती थीं। अब वे स्कूल आती हैं, कक्षाओं में भाग लेती हैं और जो सीखती हैं, उसे दूसरों के साथ भी साझा करती हैं।”

A young girl in a vibrant purple traditional outfit with lace details, gold necklace, and bangles sits outdoors on a concrete surface in a rural Indian village setting. She gently holds a black goat kid across her lap while feeding green leaves to another black goat standing beside her.
UNICEF/UNI891790/Parashar

स्कूलों में उपस्थिति बढ़ने का असर

इस पहल का सीधा असर स्कूल उपस्थिति पर पड़ा है। जब लड़कियाँ नियमित रूप से स्कूल में बनी रहती हैं, तो न केवल ड्रॉपआउट कम होते हैं। और जब लड़कियाँ पढ़ाई जारी रखती हैं, तो कम उम्र में शादी की संभावना भी घट जाती है।

दुबागड़ा गाँव की 14 वर्षीय साईस्मृति इस बदलाव की एक स्पष्ट मिसाल है। पारम्परिक रूप से, जब किसी लड़की को पहली बार माहवारी होती थी, तो परिवार ‘बड़ा झिआ हेला’ नामक रस्म करता था—जो यह संकेत होता था कि अब शादी की बात शुरू की जा सकती है।

साईस्मृति कहती है कि, “अदविका कार्यक्रम से मुझे अपने अधिकारों के बारे में मालूम हुआ। इससे मुझे बाल विवाह के लिए ‘नहीं’ कहने की हिम्मत मिली। मैंने अपने परिवार से साफ कहा कि मैं पहले अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती हूँ।”

उसकी माँ मेरुबासी बेहरा गर्व से बताती हैं कि, “पहले यह रस्म शादी की तैयारी मानी जाती थी। अब इसका मतलब है कि लड़की आगे की शिक्षा के लिए तैयार है।

बदलाव का एकजुट मॉडल

कन्धमाल के ज़िला शिक्षा कार्यालय ने, यूनीसेफ़ के साथ मिलकर यह सुनिश्चित किया कि ये प्रयास केवल बुनियादी ढाँचे तक सीमित नहीं रहें, बल्कि माता-पिता की सोच और व्यवहार में भी बदलाव लाएँ। 

यूनिसेफ ने इन कोनों को समावेशी और टिकाऊ बनाने में मदद की है। इसके तहत शिक्षकों को प्रशिक्षित करके, पीयर एजुकेटर्स को जोड़कर, बच्चों की राय के अनुसार सुविधाएँ विकसित करके, और स्कूल स्वास्थ्य व जीवन-कौशल शिक्षा में मासिक धर्म स्वच्छता को शामिल करके स्कूल स्वास्थ्य व जीवन-कौशल शिक्षा से जोड़ा गया।

यूनीसेफ़ ओडिशा के फ़िल्ड कार्यालय प्रमुख विलियम जे हैनलन कहते हैं कि, “माहवारी स्वास्थ्य, शिक्षा और बाल संरक्षण को एक साथ जोड़कर हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि ओडिशा की हर लड़की आत्मविश्वास के साथ बड़ी हो सके और अपनी पूरी क्षमता को हासिल कर सके।”

राज्यभर में अदविका कार्यक्रम के तहत एक लाख से अधिक सहकर्मी नेता तैयार किए गए हैं और 14 हज़ार गाँवों को बाल-विवाह मुक्त घोषित किया जा चुका है।

कोनों से समुदाय तक

दुतिमेंडी और दुतिपाड़ा के स्कूलों के जो कोने कभी ख़ामोश थे, वे अब बातचीत और सीखने के केन्द्र बन गए हैं। लड़कियाँ हँसते हुए साबुन डिस्पेंसर भरती हैं, शिक्षक स्वच्छता और अधिकारों पर चर्चा करते हैं, और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हर हफ्ते किशोरियों से मिलने आती हैं।

कन्धमाल में अब माहवारी स्वास्थ्य और बाल विवाह दो अलग-अलग विषय नहीं रहे। ये दोनों लड़कियों की शिक्षा, आत्मनिर्भरता और भविष्य को लेकर होने वाली बातचीत का हिस्सा बन चुके हैं।

जब पहाड़ियों के पीछे सूरज ढलता है, तो पायल और साईस्मृति, शाम होने पर, अपने स्कूल बैग कन्धे पर टाँगे घर लौटती हैं - इस भरोसे के साथ कि अब उनका भविष्य उनके अपने हाथों में है।