ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं के वितरण में महिलाएँ सबसे आगे
भारत में 15-18 वर्ष की आयु के किशोरों के स्कूल छोड़ने की बढ़ती संख्या से निपटने का पायलट प्रोजेक्ट है स्नेहा
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"महिलाएं ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं के वितरण में सबसे आगे हैं...." यही शब्द मन में आए!
ये वही शब्द थे जो मेरे कॉलेज की कक्षाओं की वैश्विक स्वास्थ्य पाठ्यपुस्तकों और मेरे इनबॉक्स में हार्वर्ड हेल्थ पब्लिशिंग लेखों पर छपे थे।
वैश्विक स्वास्थ्य में पढ़ाई कर रहे अधिकांश छात्र वंचित क्षेत्रों में महिला नेतृत्व के महत्व को समझते हैं, लेकिन वास्तविक समय में इसे देखना एक बिल्कुल अलग ही अनुभव है।
स्नेहा भारत में 15-18 वर्ष की आयु के किशोरों की बढ़ती ड्रॉपआउट संख्या से निपटने का एक पायलट प्रोजेक्ट है। 28 अगस्त को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक स्नेहा (किशोरों के लिए सुरक्षा, पोषण, सशक्तिकरण और स्वास्थ्य) ग्राम संगठन सहायकों (वीओए) का मंडल स्तरीय प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू हुआ।
उस सुबह मैं अपने सीनियर के साथ प्रशिक्षण शिविर में गई। मुझे वहां प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए पुरूष के नेतृत्व की उम्मीद थी, हालांकि इसकी बजाय वहां मुझे दो महिलाएं मिली जो इस शिविर का नेतृत्व कर रही थी।
मैं इस अवसर पर उत्साहित थी, उनके भाषण सुनने के लिए आगे की पंक्ति में बैठना चाहती थी, लेकिन कोई कुर्सी खाली न होने की वजह से मैं चुपचाप पीछे की ओर जाकर खड़ी हो गई। वीओए मेरी तरफ ध्यान से देख रहे थे। मैं मुंह पर काला मास्क लगाए, पीले कुर्ते और स्वेटपैंट में सबसे अलग दिख रही थी, जबकि सब पुरूष वहां पर इस्त्री किए हुए स्लैक्स और महिलाएं खूबसूरत साड़ियों में थी।
मधुरिमा उठीं और लोगों के सामने भाषण देने लगी, उनके हाथ में माइक था। मेरे बॉस की तरह वह भी आंगनवाड़ी केंद्र में सुपरवाइजर हैं।
उनके भाषण शुरू करने से पहले एक पल का मौन छाया। मैं पिछली लाइन में सबसे पीछे बैठकर ध्यान से सब सुन रही थी। मेरी गोद में एक पत्रिका, हाथ में कलम रखी हुई थी। एक पल के लिए मैंने लिखना बंद कर दिया, तब मुझे एहसास हुआ कि जो शब्द मेरे मन में सबसे पहले आए थे उन्हें मैं वास्तव में होते हुए देख रही हूं। वह शब्द पढ़ने से ज्यादा देखने-सुनने में ज्यादा अद्भुत हैं।
सभी ट्रेनी उत्सुकता के साथ अपने फोन दूर रखकर सुपरवाइजर को सुन रहे थे। मेरी बगल में एक ओर महिला सुपरवाइजर बैठी हुई थी और सामने एक लड़की बैठी हुई थी, जिसकी गोद में किताबें थी वह हाथ में कलम लिए सावधानी से नोट्स ले रही थी। कमरे में एक अन्य महिला ने अभी आपने क्या बोला?, यह पूछने के लिए फोन उठाया, ताकि वह इसे दोबारा बोलने पर अपनी नोटबुक में दर्ज कर सके।
स्वास्थ्य प्रशासन की नौकरियों में पुरुष प्रधानता वाली रूढ़िवादिता की गहरी जड़ों को महिलाओं की यह लीडरशिप कुछ हद तक दूर करने की कोशिश करती है। महिलाओं की लीडरशिप से ज्यादा ये बात जरुरी थी कि हॉल में ज्यादात्तर ट्रेनी लड़कियां ही थी। वहीं पुरूष ट्रेनी भी अपनी पत्नियों को लीडर की भूमिका के साथ-साथ एक मां की भूमिका भी सफलतापूर्वक अदा करते हुए देख रहे थे और उनका साथ दे रहे थे।
मधुरिमा अपने भाषण के जरिए ट्रेनियों को अपमानित नहीं किया, बल्कि वह तो प्रशासनिक पदों और फील्ड में रहने वाले कार्यकर्ताओं के बीच की दूरी को कम कर रही थी। वह जैसे जैसे अपनी बात सबके सामने रख रही थी ट्रेनियों व लीडर्स के बीच में आपसी सम्मान और सहयोग को बढ़ावा मिला। उसके द्वारा दी गई सभी जानकारी प्रेरणादायक थी।
उन्होंने फील्ड वर्कर्स को ज्यादा से ज्यादा सवाल पूछने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि, “आप सवाल पुछने से मत घबराएं, आप जो भी कहेंगे वह सही या गलत नहीं होगा, क्योंकि आप नहीं जानते जब आप ग्राउंड पर जाएंगे तो वहां क्या देखने को मिलेगा।”
उसने पुरे सेमिनार को बहुत ही इंट्रेस्टिंग बना दिया, हर बात को उदाहरण देकर समझा रही थी और बीच-बीच में हंसी-मजाक का दौर भी चल रहा था। एक घंटा कब बीत गया पता ही नहीं चला।
भारत यात्रा के दौरान बार-बार मेरा ध्यान इसी चीज पर रहता था कि पॉल्यूशन की वजह से मास्क लगाकर रखूं, पंखे काम कर रहे हैं या नहीं, कहीं मुझे मच्छरों ने तो नहीं काट लिया। लेकिन इस पुरे सेमिनार के दौरान मेरा ध्यान ना तो मेरा ध्यान छत के पंखे की तरफ गया, न ही मास्क की और न ही मच्छरों को देखने की फुर्सत मिली। हालांकि यह मेरी नॉर्मल आदतों में शुमार थी।
उनका भाषण लगभग आधा हो चुका था और उन्होंने किशोरों के लिए पोषण शिक्षा का अहमियत बताई। उन्होंने कहा, "हमें घर में ही खाने को टेस्टी बनाना होगा, क्योंकि हमारे अपने बच्चों को घर का खाना पसंद नहीं आएगा तो वे फास्ट फूड सेंटरों में ही जाएंगे।"
सभी ट्रेनियों ने हंसते हुए उनकी बातों से सहमति जताई। यहां उपस्थित ज्यादात्तर ट्रेनियों के अपने बच्चे थे। हालांकि इस दुविधा से सभी माता-पिता को गुजरना पड़ता है, इसीलिए इस बार पर ध्यान दिया जाना जरुरी है।
उन्होंने ड्रॉप आउट होने के कारणों का जिक्र किया। बच्चों में खराब परिणाम रहने का कारण आत्मविश्वास और प्रोत्साहन की कमी होता है। भाषण के अंत में उन्होंने बच्चों, किशोरों, महिलाओं की सहायता के लिए एक सूची पेश की।
उनके भाषण समाप्ति पर सभी मौन थे, उन्होंने अपनी बातें सुनने के लिए सभी को धन्यवाद किया और हल्का सिर झुकाकर सबका अभिवादन स्वीकार किया।
इसके साथ ही पूरा कमरा तालियों की गूंज भर गया।
जब मैं यह लेख लिख रही थी, तो साथ-साथ मधुरिमा से क्रॉस चेक भी करवा रही थी, ताकि तेलुगु में दिया गया उनका भाषण मैं अंग्रेजी में सटीक तरीके से लिख सकूं।
उसने मुझसे अंग्रेजी में बताया कि,“यहां महिलाएं सशक्त नहीं हैं। उनका सामाजिककरण किया जाता है और उन्हें घरेलू कामकाज की ज़रूरतों के अनुसार तैयार किया जाता है, लेकिन वे और भी बहुत कुछ करने में सक्षम हैं।”
उस दिन मैंने लोगों के आपस में जुड़ने का स्तर और मानवता देखी। उन्होंने मुझे कतार में सबसे पीछे बैठे होने के बावजूद भी उतनी ही अहमियत दी, जितनी आगे की पंक्तियों में बैठे ट्रेनियों को मिल रही थी। सेमिनार में मैंने आंगनवाड़ी केंद्र सुपरवाइजर के तौर पर मधुरिमा की क्षमता देखी, क्षमता जो सबको सूचना देती है, सशक्त बनाती है और लीडरशिप करती है। इस सेमिनार के बाद मैं अपने दादा-दादी के घर गई।
लेखक के बारे में
ऋचा कोंडापल्ली कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो में द्वितीय वर्ष की छात्रा हैं और वैश्विक स्वास्थ्य और प्री-मेड ट्रैक पर अध्ययन कर रही हैं। वह मानसिक स्वास्थ्य और प्रीडायबिटीज शिक्षा और नैदानिक और गैर-नैदानिक सेटिंग्स में वकालत, फिल्म निर्माण और पत्रकारिता के माध्यम से मीडिया और स्वास्थ्य के बीच अंतरसंबंध की खोज, और चिकित्सा शिक्षा और व्यापक चिकित्सा प्रणाली में अमानवीय प्रथाओं के लिए समाधान लागू करने में रुचि रखती है।