खामोशी से शक्ति तक, शर्म से आत्मविश्वास तक: बिहार की युवा महिलाएँ बदल रही हैं तस्वीर

चुनौतियों को ताक़त में बदलकर बिहार की युवा महिला नेता बना रही हैं बदलाव की नई राह

Priyanka Kumari – SBC officer & Gender Focal
From Silence to Strength & Shame to Self- confidence: Budding Female leaders leading the change in Bihar
Priyanka Kumari
24 नवंबर 2025

बॉलीवुड की मशहूर फिल्म अमर अकबर एंथनी में तीन भाई बचपन में बिछुड़ जाते हैं और बड़े होकर मिलते हैं। लेकिन सभी उतने भाग्यशाली नहीं होते। पूजा (21 वर्ष) का बचपन बहुत कठिन था। उनके पिता के निधन के बाद, सौतेली दादी ने उन्हें प्रताड़ित किया, और मां के दोबारा शादी करने के बाद स्थिति और खराब हो गई। सिर्फ 8 साल की उम्र में पूजा और उनकी 11 साल की बहन घर छोड़कर निकल गईं, लेकिन पटना जंक्शन पर ट्रेन से उतरते समय दोनों बिछड़ गईं।

छोटी बच्ची की यात्रा

यहीं से पूजा की अकेली और बेघर जिंदगी शुरू हुई। कई उतार-चढ़ाव आए। कभी अच्छे लोग मिले, लेकिन मदद लंबे समय तक नहीं चली। हर 3-4 महीने में उन्हें नए (अक्सर खराब) अनुभवों का सामना करना पड़ा। अंत में वे बिहार सरकार के सोशल वेलफेयर विभाग द्वारा संचालित चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशन (CCI) पहुँचीं, जहां जाकर उनकी जिंदगी थोड़ा स्थिर हुई।

पूजा बताती हैं, “मुझे याद नहीं कि मैंने कभी पेट भरकर खाना खाया था। CCI में पहली बार मैंने सुरक्षित महसूस किया और भरपेट भोजन और सुकून की नींद मिली।”

संस्थान और यूनिसेफ का समर्थन

पढ़ाई में रुचि होने के कारण, सीसीआई (CCI) के सहयोग से उन्होंने 10वीं की परीक्षा पास की। इस दौरान यूनिसेफ द्वारा समर्थित कई कौशल विकास कार्यक्रमों में हिस्सा लिया—सिलाई, कंप्यूटर, वित्तीय साक्षरता, आत्मविश्वास और स्वच्छता की ट्रेनिंग ने उनकी पर्सनैलिटी को मजबूत किया।

18 वर्ष तक सीसीआई (CCI) में रहने के बाद, सोशल वेलफेयर विभाग की मदद से उन्हें नौकरी मिली, और वे आर्थिक रूप से सक्षम हुईं। अपने पहले वेतन का बड़ा हिस्सा उन्होंने 10+2 में दाखिले पर खर्च किया और उसे सफलतापूर्वक पूरा किया। यूनिसेफ की तकनीकी सहायता से संचालित आफ्टरकेयर कार्यक्रम ने उनके पूरे सफर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

Puja is taking an awareness session on the importance of legal documents and how those can be prepared for after-care children.
Implementing partner for UNICEF Puja is taking an awareness session on the importance of legal documents and how those can be prepared for after-care children.

यूनिसेफ ने 2019 में बिहार सरकार को आफ्टरकेयर कार्यक्रम शुरू करने में तकनीकी सहायता दी। पिछले 6 वर्षों में इस कार्यक्रम ने आफ्टरकेयर सेवाओं को बहुत मजबूत बनाया है, जिससे पूजा जैसी कई लड़कियों को लंबे समय तक असरदार और टिकाऊ लाभ मिले हैं।

फिलहाल पूजा राज्य आफ्टरकेयर सेल से मिलने वाले स्टाइपेंड की मदद से अपना स्नातक कर रही है। उन्हें यूनिसेफ के साझेदार संगठन उदयन केयर द्वारा समर्थित LIFT (लर्निंग इन फेलोशिप टुगेदर) फेलोशिप भी मिली है। इस फेलोशिप के तहत वह DCPU (जिला बाल संरक्षण इकाई), चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (CWC), CCIs और केयर लीवर्स के साथ मिलकर काम करती है, ताकि केयर से बाहर आने वाले हर युवा को जरूरी कानूनी दस्तावेज—जैसे जन्म प्रमाणपत्र, आधार कार्ड, बैंक खाता आदि—समय पर मिल सकें।

जीवन का एक मिशन

आत्मविश्वास बढ़ाने वाले सत्रों से लेकर उदयन केयर से LIFT फेलोशिप दिलाने तक, समाज कल्याण विभाग और UNICEF ने मुझे और मेरी तरह कई लड़कियों को लगातार समर्थन दिया है। यह उन बच्चों के लिए बड़ी मदद है जिन्हें उनके अपने परिवार ने छोड़ दिया, और अब यह समर्थन उन्हें अपनी ज़िंदगी बनाने में मदद कर रहा है। अपने अनुभवों और UNICEF से मिली सीख के आधार पर, मैं भी पूरी क्षमता के साथ सभी केयर लीवर्स का समर्थन करूंगी।

 

पूजा ने उम्मीद से भरी आंखों से कहा, “मैं बिहार केयर लीवर्स अलायंस की कोर ग्रुप सदस्य हूं, जिसने मुझे एक मजबूत मंच दिया है जहाँ मैं अपनी चुनौतियाँ साझा कर सकती हूं, मार्गदर्शन ले सकती हूं और अपनी तरह दूसरों की मदद कर सकती हूं। मेरे जीवन का मिशन है जितने बच्चों की मदद कर सकूं, ताकि कोई भी बच्चा वैसा डरा हुआ और असहाय महसूस न करे जैसा मैंने सालों पहले किया था। बहुत समय बीत गया है, और मुझे नहीं पता मेरी दीदी कहाँ है, लेकिन हर बार जब मैं किसी लड़की की मदद करती हूँ, मुझे लगता है कि शायद कहीं कोई मेरी दीदी की भी मदद कर रहा होगा। और मुझे उम्मीद है कि मैं एक दिन उनसे मिल पाऊँगी।” 

Puja
Priyanka Kumari

कृतिका कुमारी (14 वर्ष) बिहार के पूर्णिया जिले के एक दूरदराज़ गांव में अपने स्कूल और मोहल्ले की उभरती हुई युवा नेता हैं। वह अपने दोस्तों, सहपाठियों और गांव की महिलाओं को मासिक धर्म स्वच्छता (MHM) के बारे में सलाह देती हैं। बिहार में मासिक धर्म से जुड़ी सामाजिक मान्यताएँ काफी सख्त रही हैं, और इस विषय पर बातचीत आम तौर पर घर की महिलाओं के बीच बंद कमरों में ही होती है।

Kritika
Implementing partner for UNICEF

“जब मुझे पहली बार पीरियड आया (13 साल की उम्र में), मेरी दीदी ने मुझे इसके बारे में समझाया और एक सैनिटरी पैड दिया। मेरी तरह कई लड़कियों को इसके बारे में तब तक पता नहीं होता जब तक वे खुद इसका अनुभव नहीं करतीं, और पहली बार यह उनके लिए बहुत घबराहट का कारण बन जाता है। मेरी एक दोस्त को हाल ही में स्कूल में ही पहला पीरियड आया और वह जोर-जोर से रोने लगी। वह कह रही थी कि बिना चोट लगे उसे खून कैसे आ सकता है, और पेट में होने वाले दर्द भी उसके लिए बहुत तेज़ थे,” कृतिका याद करती हैं।

वर्तमान स्थिति

क्योंकि पीरियड्स को निजी बात माना जाता है और अक्सर इसे लेकर शर्म या झिझक होती है, इसलिए पीरियड की तैयारी या मासिक स्वच्छता (MHM) पर खुलकर बात ही नहीं होती। यही कारण है कि युवतियों का यौन और प्रजनन स्वास्थ्य बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन जाता है।

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (NFHS-5) के अनुसार, बिहार में 15-24 साल की उम्र की सिर्फ 56% ग्रामीण और 74.7% शहरी महिलाएँ ही पीरियड्स के दौरान स्वच्छ और सुरक्षित तरीकों का इस्तेमाल करती हैं। राज्य में अभी भी बहुत सी लड़कियों के लिए MHM एक दूर का सपना है।

यूनिसेफ का तकनीकी सहयोग

मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन (MHM) यूनिसेफ़ के WASH in Schools Programme का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसका उद्देश्य है कि लड़कियाँ अपने पीरियड्स को गरिमा और आत्मविश्वास के साथ संभाल सकें। शिक्षा विभाग, यूनिसेफ के तकनीकी सहयोग से, स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए कई पहलें कर रहा है।

इन पहलों में नोडल शिक्षकों का प्रशिक्षण और क्षमता वृद्धि, मीना मंच के सदस्यों को MHM के बारे में जागरूक करना, और स्कूलों में सुविधाजनक माहौल बनाना शामिल है—जैसे MHM-फ्रेंडली टॉयलेट, साबुन बैंक, सैनिटरी पैड बैंक और सहेली कक्ष (लड़कियों के आराम हेतु कमरा)। इसके अलावा, किशोरी लड़कियों को बदलाव की एजेंट के रूप में तैयार किया जा रहा है ताकि वे मासिक धर्म से जुड़े टैबू और कलंक को तोड़ सकें।

यूनिसेफ ने 152 शिक्षकों को मास्टर ट्रेनर के रूप में तैयार किया है, जिन्होंने आगे चलकर बिहार के उच्च माध्यमिक स्कूलों में लगभग 5,726 नोडल शिक्षकों को प्रशिक्षित किया। इसके अलावा, प्राथमिकता वाले जिले पूर्णिया में विशेष रूप से काम करते हुए UNICEF ने सीधे 200 स्कूलों तक पहुंच बनाई, जिससे 10,000 से अधिक बच्चों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा। इन्हीं बच्चों में से एक है कृतिका, जो इस पहल से लाभान्वित होकर बदलाव की एक सशक्त प्रतिनिधि बनकर उभरी है।

Kritika (holding pads) during a community meeting with adolescent girls and women in her village
Implementing partner for UNICEF Kritika (holding pads) during a community meeting with adolescent girls and women in her village

व्यवहार परिवर्तन की शुरुआत

“कृतिका कहती हैं, “मैंने अपनी मां और बुआ को पुराने कपड़ों का इस्तेमाल करते देखा था। स्कूल की काउंसलिंग से सीखकर, मैंने गांव की महिलाओं से बैठकर इन्हें समझाना शुरू किया—कि पुराने तरीकों से संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।”

“और मैंने उन्हें इन पुराने तरीकों के खतरों के बारे में भी बताया — कैसे ये आदतें फंगल इन्फेक्शन और यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTIs) जैसी दर्दनाक समस्याओं का कारण बन सकती हैं। समय के साथ, मैं महिलाओं और लड़कियों के व्यवहार में थोड़ा बदलाव देख रही हूँ, वे अब अपने पीरियड्स को बेहतर तरीके से संभाल रही हैं,” युवा MHM चैंपियन ने बताया।

पुजा और कृतिका ऐसी उभरती हुई युवा नेता हैं, जिन्होंने न केवल अपनी व्यक्तिगत चुनौतियों को पार किया, बल्कि अपने जैसी कई और लड़कियों को प्रेरित किया है कि वे रूढ़ियों को तोड़ें, बड़े सपने देखें और अपनी असली क्षमता को अपनाएँ।