कहानी भाषा और अपनेपन की—जब कक्षाएं बोलती हैं आपकी भाषा
भाषा, अपनेपन और ओडिशा में यूनिसेफ की साझेदारी आदिवासी बच्चों की बुनियादी सीखने की क्षमता को कर रही मजबूत
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सवित्री पिंगवा सात साल की थी, जब उसने पहली बार महसूस किया कि कक्षा कैसी होती है। यह उलझन भरी चुप्पी नहीं थी। न ही उसके दिमाग पर पड़ने वाला ऐसे शब्दों का बोझ, जिनका कोई अर्थ न समझ आए। बल्कि खुशी थी, उन शब्दों को पहचानने की जो उसकी अपनी भाषा में थे। जब शिक्षक ने किताब की ओर इशारा करके पढ़ा, तो सावित्री तुरंत समझ गई, क्योंकि वह शब्द उसकी अपनी भाषा का था।
ओडिशा के क्योंझर जिले के घने जंगलों में बसे उनके गाँव कुंभितंगरी में कई बच्चे हो भाषा बोलते हैं। यही भाषा उनकी बातचीत से लेकर, जंगल की कहानियों और तीज-त्योहारों के गीतों की है। लेकिन, सवित्री के स्कूल में उनकी यह भाषा नहीं बोली जाती थी।
कई सालों तक सावित्री एक ऐसी कक्षा में बैठी रही जहाँ किताबें ओड़िया भाषा में थीं। एक ऐसी भाषा जो उसके लिए समझना बहुत ही मुश्किल था। वह शब्दों को पढ़ नहीं पाती थी, समझ नहीं पाती थी। उसमें अध्यापकों से हाथ उठाकर सवाल तक पूछने की हिम्मत नहीं थी। “क्यों?”, “कैसे?”, “आगे क्या?” जैसे सवाल उसके मन में ही रह जाते थे। स्कूल उसके लिए जिज्ञासा की जगह नहीं, बल्कि चुप रहने की जगह बन गया था।
सावित्री की विधवा माँ आरती अकेले अपनी बेटी की परवरिश कर रही है। वह चाहती थी कि सावित्री को वह शिक्षा मिले जो उसे कभी नहीं मिल पाई। लेकिन, हर सुबह जब वह अपनी बेटी को स्कूल जाते देखती तो उसकी आँखों में उत्साह या खुशी नहीं, बल्कि चिंता होती थी।
ओडिशा के कई आदिवासी इलाकों में यह कहानी हजारों बार दोहराई गई है। बच्चे स्कूल आते हैं और हो, देसिया, कुई, दिदायी, भुइयां, भुंजिया, गुताब, कोया, जुआंग, उरांव, बोंडा, साओरा, किसान, कुवी, बिंझाल, खड़िया, गोंडी और सदरी जैसी भाषाएँ बोलते हैं। वे जिज्ञासु और सवालों से भरे होते हैं, लेकिन जैसे ही वे किताब खोलते हैं और कक्षा में ओड़िया भाषा में पढ़ाई शुरू होती है, उन्हें कुछ समझ नहीं आता।
समस्या बच्चों में नहीं है। समस्या उस भाषा में है, जो उनके ज्ञान और पढ़ने-सीखने के बीच आती है। जब सीखने का वातावरण आपकी भाषा में नहीं होता, तो चाहे आप कितने भी बुद्धिमान क्यों न हों, आप सीखने की प्रक्रिया से बाहर हो जाते हैं।
कुम्भितांगरी के सरकारी प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक पद्मलोचन साहू ने यह स्थिति वर्षों तक देखी। उन्होंने बताया कि, “बच्चे डर के साथ स्कूल आते थे, उन्हें किताबें समझ नहीं आती थीं। वे कक्षा में बैठना तक नहीं चाहते थे। धीरे-धीरे बच्चों ने सीखने की कोशिश करनी ही बंद कर दी, यहां तक कि कई बच्चों ने तो स्कूल आना ही बंद कर दिया था।”
आंकड़े भी कम उपस्थिति, ड्रॉपआउट और कमजोर सीखने के परिणामों की कहानी को बयां करते थे। लेकिन हर संख्या के पीछे एक बच्चा था जो यह मानने लगा था कि वह उतना समझदार नहीं है, जबकि असल समस्या यह थी कि उसे ऐसी भाषा में पढ़ाया जा रहा था जिसे वह समझ ही नहीं सकता था।
फिर यूनिसेफ ने ओडिशा सरकार और जिला समग्र शिक्षा के साथ मिलकर मातृभाषा आधारित बहुभाषी शिक्षा (Mother Tongue Based Multilingual Education) को मजबूत करने के उद्देश्य के लिए साझेदारी की। इस पहल का मकसद बच्चों को उसी भाषा में सीखने का अवसर देना था, जिसमें वे बोलते और सोचते हैं। यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) की सिफारिशों के अनुरूप थी।
शुरुआत किताबों से हुई, लेकिन ये सामान्य किताबें नहीं थीं। ये ऐसी किताबें थीं जो एक ही पन्ने पर दो भाषाएँ बोलती थीं। बच्चे अपनी मातृभाषा—जैसे हो, संताली या कुड़मी—का शब्द देखते और उसके साथ उसका ओड़िया रूप भी।
उदाहरण के लिए, पेड़ को एक ही पन्ने पर “दारु” और “गच्छा” दोनों रूपों में लिखा जाता था। किताबों में लिपि ओड़िया ही रहती थी, जिससे सीखने का एक पुल बनता था। बच्चे लिखावट को पहचानते और अपनी भाषा में अर्थ को समझते की कोशिश करते। यह साक्षरता का ऐसा तरीका था जिसमें बच्चों को अपनी पहचान स्कूल के दरवाज़े पर छोड़ने की ज़रूरत नहीं थी।
पर बदलाव केवल शब्दों तक सीमित नहीं था। अब वो कहानियां भी बदल गईं जिन्हें बच्चे किताबों में पढ़ते थे, उन्हें अब वो शहरी कहानियां नहीं पढ़नी पड़ती थी, जिन्हें उन्होंने कभी देखा ही नहीं-जीया ही नहीं। अब बच्चे अपने गांव, जंगल, त्याहारों और उन जानवरों की कहानियां पढ़ते हैं, जिन्हें उन्होंने अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में देखा है, जीया है।
यूनिसेफ का सहयोग केवल किताबों तक सीमित नहीं रहा। शिक्षकों को बहुभाषी शिक्षण पद्धति का प्रशिक्षण दिया गया। वहां की सांस्कृतिक, लोककथाओं और परंपराओं को ध्यान में रखकर पाठ्यक्रम तैयार किया गया। 3 से 6 वर्ष के बच्चों के लिए “नुआ अरुणिमा” पुस्तिकाओं को 21 आदिवासी भाषाओं में अनुवादित किया गया, ताकि आंगनवाड़ी केंद्रों में छोटे बच्चों को भी मातृभाषा में सीखने का अवसर मिल सके। समुदाय के सदस्यों को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया गया, जिन्होंने पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक अनुभवों से सीखने की प्रक्रिया को समृद्ध बनाया। पाठ्यक्रम अब बच्चों के जीवन का आईना बन गया था।
सावित्री ने इस बदलाव को तुरंत महसूस किया। उसने एक द्विभाषी किताब उठाई और उसमें लिखे शब्दों को तुरंत पहचान लिया। उसने शब्दों को केवल पढ़ा नहीं बल्कि पहचाना, क्योंकि वे उसके अपने शब्द थे, जो वह घर में बोलती थी, और अब वही शब्द उसकी किताब में लिखे हुए थे।
पहली बार जब उसने किताब को अपने हाथ में उठाया तो उसके चेहरे पर उत्साह और खुशी के मिले-जुले भाव थे। फिर उसने किताब को दूसरी-तीसरी बार और बार-बार उठाया। धीरे-धीरे उसका डर खुशी में बदलते हुए देखना अपने आप में किसी करिश्मे से कम नहीं था। अब वह कक्षा में पूरी जिज्ञासा से शिक्षकों से सवाल पूछती है।
आरती भावुक होकर कहती है, “अब सावित्री खुशी से स्कूल जाती है और घर आकर मुझे भी पढ़ाती है। वह पूरे उत्साह से मुझे बताती है कि थाली गोल क्यों होती है, किसान बैलों के गले में घंटी क्यों बांधते हैं। मुझे अपनी बेटी से सीखना बहुत अच्छा लगता है।”
यह बदलाव अब धीरे-धीरे पूरे स्कूल में दिखाई देने लगा है। प्रधानाध्यापक साहू ने देखा कि बच्चे अब समय से पहले स्कूल आने लगे हैं, पढ़ाई में रुचि लेने लगे हैं और बिना किसी झिझक के खेलों से लेकर कंपीटिशन में भाग लेने लगे हैं। रंगीन तस्वीरों और परिचित कहानियों वाली किताबें बच्चों की पसंदीदा बन चुकी हैं। अब स्कूल में ड्रॉपआउट कम हुए और परिणाम बेहतर हुए हैं।
लेकिन सबसे बड़ा बदलाव बच्चों के आत्मविश्वास में आया है। अब ये वो छात्र नहीं हैं, जो शिक्षा के साथ संघर्ष कर रहे थे। अब ये ऐसे विद्यार्थी बन चुके हैं, जिनकी भाषा, संस्कृति और ज्ञान को महत्व दिया जा रहा है।
इस कार्यक्रम ने केवल कक्षा के अंदर का माहौल ही नहीं बदला, बल्कि स्कूल और समुदाय के बीच मजबूत संबंध भी बनाया।
हर महीने प्रधानाध्यापक साहू अभिभावकों के साथ बैठक करते हैं और उन्हें वे किताबें दिखाते हैं जिनसे बच्चे पढ़ते हैं। जब माता-पिता अपनी भाषा को किताबों में छपा हुआ देखते हैं और अपने गांव की कहानियाँ चित्रों में पहचानते हैं, तो उनका मन गदगद हो उठता है।
अब माता-पिता अपने बच्चों की पढ़ाई में मदद कर सकते हैं, क्योंकि पढ़ाई उनकी अपनी भाषा में भी है। शिक्षक घर-घर जाकर बहुभाषी शिक्षा के महत्व के बारे में बताते हैं, जिससे स्कूल और परिवार के बीच रिश्ता और मजबूत होता है।
लंबे समय से हशिये पर रहने वाले समुदायों में बच्चों को मातृभाषा में ज्ञान अर्जित करते देखना और पाठ्यक्रम का मातृभाषा में होना केवल व्यावहारिक नहीं, बल्कि सम्मानजनक भी है। यह संदेश देता है कि आपकी मातृभाषा जरूरी है, आपकी संस्कृति की अपनी पहचान और मूल्य है, और इस शिक्षा व्यवस्था में आपका भी उतना ही स्थान है, जितना किसी भी मुख्यधारा से जुड़े आम बच्चे का।
शिक्षा का विज्ञान भी यही कहता है—बच्चे अपनी मातृभाषा में सबसे बेहतर सीखते हैं, खासकर शुरुआती वर्षों में। इससे उनकी सोचने की क्षमता मजबूत होती है, साक्षरता और गणित की नींव मजबूत होती है, और बाद में उनके लिए नई भाषाएँ सीखना आसान हो जाता है।
ओडिशा सरकार का मातृभाषा आधारित बहुभाषी शिक्षा कार्यक्रम, यूनिसेफ के सहयोग से, नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और निपुण ओडिशा फाउंडेशनल लर्निंग मिशन के अनुरूप है। इसका उद्देश्य बच्चों को हमेशा मातृभाषा तक सीमित रखना नहीं है, बल्कि उसके आधार पर ओड़िया, अंग्रेज़ी और अन्य भाषाओं की ओर पुल बनाना है।
यह पहल नीतिगत समर्थन, शिक्षकों का प्रशिक्षण, सांस्कृतिक रूप से उपयुक्त शिक्षण सामग्री और समुदाय की भागीदारी के साथ व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ रही है। यूनिसेफ नीति दस्तावेज़ों और दिशा-निर्देशों के विकास में भी सहयोग कर रहा है, ताकि यह प्रयास लंबे समय तक टिकाऊ रहे।
कुम्भितांगरी में सावित्री अब आगे बढ़ रही है। अब वह किताबों से डरकर चुप रहने वाली बच्ची नहीं रही, बल्कि वह आत्मविश्वासी बन चुकी है और हर रोज कुछ नया सीखने के लिए उत्साहित रहती है। उसके सपने बड़े हो गए हैं, क्योंकि अब पढ़ना और सीखना उसे मुश्किल नहीं लगता।
उसकी कहानी अब पूरे ओडिशा में दोहराई जा रही है। जहाँ-जहाँ मातृभाषा आधारित बहुभाषी शिक्षा पहुँच रही है, वहाँ बच्चे यह समझ रहे हैं कि उनकी भाषा घर और दिल की भाषा है, यह कोई कमज़ोरी नहीं, बल्कि उनकी ताकत है।
इस पहल ने दर्शाया है कि जब शिक्षा बच्चे की अपनी मातृभाषा में होती है, तो डर आत्मविश्वास में बदल जाता है। खामोशी खुशी, उत्साह और भागीदारी में बदल जाती है और बच्चों का संघर्ष उपलब्धि में बदल जाता है।
सबसे अहम बात हमें यह पता चली है कि दुनिया में कहीं भी मुख्यधारा में रहने वाले अन्य बच्चों की तरह ही आदिवासी बच्चे भी पूर्ण रूप से सक्षम हैं। उन्हें बस ऐसी शिक्षा व्यवस्था की ज़रूरत थी, जिसमें उनकी शुरूआत वहीं से हो जहां से वो बोलना शुरू करते हैं। उनकी पहचान का सम्मान करें और उन्हें उड़ने के लिए पंख दें।
जब आरती आज अपनी बेटी को पढ़ते हुए देखती है, तो उसे सिर्फ अपनी बच्ची और उसकी किताबें नहीं दिखती, बल्कि उसे अपनी बेटी का उज्जवल भविष्य और अपार संभावनाएं दिखती हैं। जो कभी भाषा की दूरी की वजह से उससे छिन गया था, लेकिन आज वही शिक्षा उसे अपने सपनों पर पंख लगाकर उड़ने की ताकत दे रही है।
यूनिसेफ और ओडिशा सरकार की साझेदारी ने बच्चों के मन की इसी बात को समझते हुए उनकी मातृभाषा और सीखने की ललक का सम्मान किया है। बच्चे की मातृभाषा केवल आपसी संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह तो सोचने, महसूस करने और दुनिया को समझने का उनका अपना तरीका और नज़रिया है।
जब शिक्षा उस भाषा का सम्मान करती है, जब उसी आधार पर सीखने की नींव रखी जाती है, तब बच्चे केवल पढ़ना और लिखना नहीं सीखते, बल्कि वे खुद के सपनों पर विश्वास करना सीखते हैं।