कई पीढ़यों के लिए माहवारी स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाली एक युवा स्टार बनी मनीषा
मिलिए उत्तर प्रदेश की मासिक धर्म स्वास्थ्य चैंपियन मनीषा पॉल से
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मिर्जापुर, भारत: 20 वर्षीय मनीषा पॉल जब चौथी कक्षा की छात्रा थी तब वह पहली बार माहवारी शब्द से रूबरू हुई थी। यूनिसेफ द्वारा उसके गांव मिर्जापुर में जॉनसन एंड जॉनसन के सहयोग से आयोजित किये गये मासिक धर्म संबंधी प्रशिक्षण सत्र में मनीषा ने हिस्सा लिया। मनीषा बताती हैं कि "जब मैं पहली बार प्रशिक्षण सत्र में गई थी, तब मुझे मासिक धर्म के बारे में कुछ भी नहीं पता था।" उस समय मुझे माहवारी हुई भी नहीं थी और शिविर में भाग लेने वाली ज्यादात्तर लड़कियों को इसकी कोई जानकारी नहीं थी।"
प्रशिक्षण शिविर में मनीषा सबसे होशियार लड़कियों में से एक थी, वह महावारी के दौरान दी जाने वाली स्वास्थ्य संबंधी जानकारी को जल्दी से समझ लेती और अपनी हमउम्र दूसरी लड़कियों को अपने लहजे में समझाती। एक मुखर और एक अच्छी वक्ता होने के कारण मनीषा जल्द ही स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की चहेती बन गई। वह जल्द ही अपने गांव में मासिक धर्म स्वास्थ्य स्वच्छता को बढ़ावा देने वाली यंग स्टार के रूप में उभरी।
एक सौम्य मुस्कान के साथ मनीषा ने अपने गांव में लोगों को मासिक धर्म के बारे में शिक्षित करना अपना मिशन बना लिया। मनीषा ने अपने गांव की लड़कियों को मासिक धर्म के लिए तैयार करने में मदद करने के लिए हर महीने प्रशिक्षण कार्यशालाएँ चलानी शुरू कीं। “गाँव की कुछ लड़कियाँ पहली बार माहवारी आने पर घबरा जाती थीं, लेकिन हमारी मदद और समर्थन से उन्हें ऐसे हालातों से सहजता से निपटने में मदद मिली।”
जब मनीषा को मासिक धर्म शुरू हुआ, तो वह उस दिन के लिए पूरी तरह से तैयार थी। उत्साह से भरी हुई मनीषा ने सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल किया, जो उसने पहले से ही अपने लिए खरीदा लिया था। उसे किसी से सलाह लेने या किसी की मदद लेने की ज़रूरत नहीं थी। लेकिन, जल्द ही उसे गांव में मासिक धर्म के दौरान होने वाली समस्याओं का सामना करना पड़ा। मनीषा को शौच के लिए खेत में जाना पड़ता था, अपने खुले आंगन में नहाना पड़ता था और अपने सैनिटरी कचरे को खुले में फेंकना पड़ता था।
मनीषा ने बताया कि, "मुझे अपना कचरा खुले में फेंकने में शर्म आती थी। कई बार तो पड़ोसियों से भी झगड़ा हो जाता था कि यह किसका कचरा है।"
मनीषा के लिए यह बहुत शर्म की बात थी। लेकिन अपने स्वभाव के अनुसार मनीषा ने घर में ही अपने परिजनों से बेहतर साफ-सफाई की मांग की।
मनीषा ने बताया कि, "मैंने अपने पिता से लड़ाई की और उन्हें हमारे घर में शौचालय बनवाने के लिए राजी किया। पहले तो उन्होंने मेरी बात को गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन मैंने उन्हें घर में शौचालय होने की अहमियत और स्वच्छता संबंधी महत्व के बारे में समझाया। आखिरकार वो मेरी जिद्द के सामने झुक गये और उन्होंने शौचालय बनवा दिया।" मनीषा ने अपने पारिवारिक खेतों में शौचालय के कचरे के निपटान के लिए एक गड्ढा भी खोदा, ताकि वह अपने मासिक धर्म के कचरे को इधर-उधर न फेंके।
महिलाओं के जीवन में बदलाव लाने के लिए उत्साहित मनीषा ने सबसे पहले बदलाव की शुरूआत अपने घर से ही की।
मनीषा की माँ उसे शुरूआत में मासिक धर्म के दिनों में प्रार्थना करने से रोकती थीं, मनीषा ने उन्हें समझाकर अपना व्यवहार बदलने के लिए राजी किया। वह बताती हैं कि, "अब मेरी माँ न केवल मुझे मासिक धर्म के दौरान प्रार्थना करने देती हैं, बल्कि वह खुद भी मासिक धर्म के दौरान प्रार्थना करती हैं।"
मनीषा के बड़े भाई जो मुंबई में ट्रक ड्राइवर का काम करते थे, उनकी शादी के बाद उसकी पत्नी यानी मनीषा की भाभी भी उनके साथ रहने लगी। अपने पति से दूर एक नए गांव में मनीषा अपनी भाभी के लिए अच्छी दोस्त साबित हुईं। उम्र में बड़ी और शादीशुदा होने के बावजूद मनीषा की भाभी को मासिक धर्म के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं थी।
मनीषा ने बताया कि, “जब मेरी भाभी छोटी थी, तब उन्हें किसी ने माहवारी और इससे जुड़ी स्वच्छता व स्वास्थ्य को लेकर किसी ने जानकारी नहीं दी। इसलिए उन्हें नहीं पता था कि क्या स्वस्थ और सामान्य है और क्या नहीं। एक बार जब वह यहाँ आईं, तो मैंने उनके साथ मासिक धर्म से जुड़ी जानकारी साझा करनी शुरू की, जो मुझे अपने प्रशिक्षण में बताई गई थी।” एक बार मनीषा की भाभी ने उसे बताया कि उसका मासिक धर्म 15 दिनों से अधिक चलता है। मनीषा के लिए यह हैरानी की बात थी, क्योंकि यह सामान्य स्थिति नहीं थी। उसने अपनी भाभी को आयरन की कमी के बारे में सचेत किया और उन्हें स्थानीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता के संपर्क में रखा।
मनीषा ने अपनी भाभी को मोतियों से बने कंगन के ज़रिए अपने मासिक धर्म चक्र पर नज़र रखना सिखाया। यह तकनीक उन्होंने अपने गांव में यूनिसेफ द्वारा दिए गए कई प्रशिक्षणों में से एक में सीखी थी। यूनिसेफ उत्तर प्रदेश में मनीषा के गांव जैसी जगहों पर लड़कियों के साथ 7 साल से ज़्यादा समय से काम कर रहा है। मनीषा जैसी लड़कियाँ अपने गांव और परिवारों में छोटी लड़कियों को सुरक्षित और स्वच्छ मासिक धर्म के बारे में शिक्षित करती हैं। वे गांव के प्राथमिक विद्यालय में जाकर लड़कियों को जागरूक करने के लिए सेमिनार और प्रशिक्षण सत्र आयोजित करती हैं, जहां बच्चियों के मन से खेल-खेल में मासिक धर्म के बारे में मिथकों और गलत धारणाओं को दूर किया जाता है।