झारखंड में बच्चे
झारखंड सामाजिक, मानव और आर्थिक विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने में उतार-चढ़ाव भरे सामाजिक-राजनीतिक वातावरण और विभिन्न व्यवस्थागत मुद्दों के रूप में कई चुनौतियों का सामना करता है।
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चुनौती
वर्ष 2000 में बड़े प्रदेश बिहार से अलग होकर बने झारखंड की आबादी 3.29 करोड़ (2011 की जनगणना) है, जो 33,000 गांवों में फैले लगभग 120,000 आवासों में रहते हैं। प्रदेश में लगभग 38 प्रतिशत लोग अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित जातियों के वंचित समुदायों के हैं। भारत का लगभग 40 प्रतिशत खनिज संसाधन झारखंड में है और इसका 28 प्रतिशत वन क्षेत्र है। प्रदेश ने वर्ष 2000 से पिछले 20 वर्षों में 11 सरकारें/मुख्यमंत्री और तीन बार राष्ट्रपति शासन देखा है।
प्रदेश में शिशु और पाँच साल से कम आयु की मृत्यु में पिछले कुछ वर्षों में लगातार गिरावट देखी गयी है। हालांकि, नवजात मृत्यु दर में गिरावट की दर आदिवासी समुदायों वाले जिलों में अधिक है। नवजात शिशुओं की देखभाल में जेंडर भेद दिखता है और विशेष नवजात देखभाल इकाइयों में लड़कों की तुलना में चुनिंदा लड़कियाँ ही भर्ती होती हैं। यद्यपि मातृ मृत्यु दर में गिरावट देखी गयी है, लेकिन यह अभी भी राष्ट्रीय औसत से अधिक है और पलामू और संथाल परगना क्षेत्रों में बहुत अधिक है।
झारखंड में लगभग हर दूसरा बच्चा नाटेपन का शिकार है (उम्र के अनुपात में कम लंबाई) से ग्रस्त है, और दस में से तीन बच्चे कमजोर होते हैं (लम्बाई के अनुपात में कम वजन)। संख्या के लिहाज से, प्रदेश में पाँच वर्ष से कम आयु के लगभग 20 लाख बच्चे विकास अवरुद्धता से ग्रस्त हैं, जो बिहार के बाद भारत में विकास अवरुद्धता का उच्चतम अनुपात है।
कई दुर्गम क्षेत्र और प्रशिक्षित कार्यबल का आभावकार्यबल , विशेष रूप से विशेषज्ञ डॉक्टरों की अनुपलब्धता, प्रदेश के लिए एक बड़ी चुनौती है। राज्य में लगभग हर तीसरी महिला कुपोषित है, और प्रजनन योग्य आयु की हर दस में से लगभग सात महिलाएँ खून की कमी से ग्रस्त हैं। 6-59 माह की आयु के लगभग 70 प्रतिशत बच्चे खून की कमी से पीड़ित हैं।
स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम)-एमआईएस के अनुसार – प्रदेश व्यापी ग्रामीण स्वच्छता का कवरेज अब 100 प्रतिशत है। बदलती रफ्तार के साथ, सबसे बड़ी चुनौती यह है कि समुदाय को कैसे जोड़ा जाये, मांग कैसे उत्पन्न की जाये और उन्हें स्वच्छता सीढ़ी पर एक कदम आगे बढ़ाने की सुविधा दी जाये और खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) स्थिति को कैसे बनाये रखा जाये। छोटे बच्चों के बीच और उनके जरिये उनके परिवारों में सुरक्षित स्वच्छता और स्वच्छता प्रथाओं को प्रोत्साहित करने के लिए विद्यालय/आंगनवाड़ी (पूर्व-विद्यालय) में डब्लूएएसएच एक प्रमुख अवसर है।
प्रदेश ने सेवाओं की पहुँच से संबंधित लक्ष्यों में पर प्रगति की है, प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर लड़कियां समानुपातिक नामांकन साझा करती हैं। हालांकि, प्रदेश कई चुनौतियों से लड़ रहा लड़ता है। लड़कियों और लड़कों दोनों के लिए स्कूल में टहराव और उच्च कक्षा में जाने की निम्न दर प्रमुख चुनौतियाँ हैं। सरकारी स्कूलों में जाने वाले बच्चों का एक बड़ा अनुपात पहली पीढ़ी का विद्यार्थी है और बेहद गरीब समुदायों से आता है। इनमें से कई बच्चे भाषाई रूप से विविधीकृत पृष्ठभूमि से भी आते हैं। उनकी शिक्षा की जरूरतों को पूरा करने के लिए, विद्यालयों को बच्चों की विविधता के प्रति संवेदनशील होना चाहिए।
बच्चों के अधिकारों और कल्याण को आगे बढ़ाना
झारखंड में यूनिसेफ प्राथमिकता वाले प्रमुख क्षेत्रों में बदलाव लाने के लिए सरकार, विधायी समितियों, पंचायत राज संस्थानों (पीआरआई), नागरिक समाज संगठनों, मीडिया, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य के साथ मिलकर काम करता है।
यूनिसेफ शुरुआती स्तनपान को बढ़ावा देने सहित प्रसव पूर्व देखभाल, संस्थागत प्रसव और नवजात देखभाल सेवाओं को मजबूत करने के लिए साझेदारी में कार्य करता है। यह फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं की क्षमता का निर्माण करने और गैर-सरकारी संगठनों, नागरिक समाज संगठनों, आदिवासी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों और पंचायती राज संस्थाओं के साथ साझेदारी में स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं की मांग को प्रोत्साहित करने के लिए सामाजिक और व्यवहार परिवर्तन संचार पहल को मजबूत करने में प्रदेश की मदद करता है।
प्रसव कक्षों और नवजात देखभाल इकाइयों में देखभाल और शिशुओं की अस्पताल से छुट्टी के बाद फॉलोअप की गुणवत्ता में सुधार करने के उद्देश्य से विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाई की ऑनलाइन निगरानी से मिले डेटा का उपयोग करने के लिए कार्यक्रम प्रबंधकों की क्षमताओं का निर्माण करने के लिए सहयोग दिया जाता है।
कार्यक्रम ग्रामीण स्वास्थ्य और पोषण दिवसों (वीएचएनडीएस) के जरिये माताओं और बच्चों को दिये गये एकीकृत पैकेज के हिस्से के रूप में टीकाकरण उपलब्ध कराने पर ध्यान केंद्रित करता है। यूनिसेफ कोल्ड चेन सिस्टम को मजबूत करने और विशेष रूप से भूभाग या नागरिक संघर्ष के कारण दुर्गम क्षेत्रों में उप-जिला स्तर की कोल्ड चेन पॉइंट का विस्तार करने में सरकार का सहयोग करता है।
आवश्यक पोषण हस्तक्षेपों की पहुँच को बढ़ाने और स्थानीय साझेदारों का उपयोग करके सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने और जनजातीय समुदायों के साथ काम करने के लिए प्रदेश की कोशिशों को मजबूत करने के लिए समर्थन दिया जाता है।
यूनिसेफ स्तनपान की प्रथाओं में सुधार करने के लिए मदर्स एबसॉल्यूट अफेक्शन (एमएए) कार्यक्रम को चरणबद्ध तरीके से रोल-आउट करने के लिए प्रदेश का समर्थन कर रहा है। यूनिसेफ खाद्य सुरक्षा में सुधार और छोटे बच्चों के पोषण में सुधार के लिए मजबूत टिकाऊ सरकारी समर्थन हासिल करने के उद्देश्य से बड़े पैमाने पर नेटवर्क, शैक्षणिक निकाय, विकास भागीदार और संयुक्त राष्ट्र की अन्य एजेंसियों को शामिल करने के लिए अपनी भागीदारी का विस्तार कर रहा है।
यूनिसेफ नवाचार का समर्थन करता है और परिवर्तन के चेहरे के रूप में बच्चों, महिलाओं और युवाओं के साथ समुदाय के नेतृत्व वाली निगरानी और कार्यान्वयन तंत्र विकसित कर रहा है। प्रदेश के दिशानिर्देशों, रोड मैप और नीतिगत दस्तावेजों को विकसित करने में तकनीकी सहायता हमारे काम का मुख्य हिस्सा है।
यूनिसेफ महवारी स्वच्छता प्रबंधन (एमएचएम) पर फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं के क्षमता निर्माण में योगदान करता रहा है। जहाँ विद्यालयों में और समुदाय में एमएचएम के लिए बुनियादी ढाँचे को मजबूत करने के प्रयास किये जा रहे हैं, वहीं जीवन कौशल पर बच्चों को सशक्त बनाकर सामाजिक वर्जनाओं को चुनौती दी जाती है।
शैक्षिक परिणामों पर ध्यान केंद्रित करने के साथ गुणवत्तापूर्ण पूर्व-प्राथमिक और प्रारंभिक शिक्षा तक पहुँच को मजबूत बनाने के लिए यूनिसेफ झारखंड में सरकार और नागरिक समाज संस्थानों के साथ भागीदार है। कार्यक्रम माध्यमिक शिक्षा की ओर पारगमन सुनिश्चित करने की दिशा में तैयार है। इसके लिए, यूनिसेफ सर्वाधिक वंचित बच्चों पर ध्यान केंद्रित करने के साथ शैक्षिक कार्यक्रमों की साक्ष्य-आधारित योजना और कार्यान्वयन के लिए प्रणालीगत क्षमता को मजबूत करने के लिए काम करता है। यूनिसेफ शिक्षण और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए शिक्षक शिक्षण संस्थानों के निर्माण और उन्हें मजबूत करने के लिए प्रदेश के साथ काम करता है। झारखंड 19 अलग-अलग भाषाओं के साथ 32 आदिवासी समुदायों का घर है।
यूनिसेफ ने प्रदेश की विविधता के प्रत्युत्तर में प्रदेश-विशिष्ट पाठ्यक्रम और बहुभाषी सामग्री के विकास को बढ़ावा दिया है। यह पूर्व-विद्यालय, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के बीच कड़ी को सुनिश्चित करने के लिए अंतर-खंडीय संमिलन को बढ़ावा देता है।
विद्यालय प्रशासन में किशोरों की भागीदारी के मंच के रूप में बाल कैबिनेट को मजबूत किया गया है जबकि एमएचएम के साथ ही साथ जीवन कौशल शिक्षा झारखंड में किशोरों को सशक्त बनाने के यूनिसेफ के प्रयासों का अभिन्न हिस्सा बने हुए हैं। नामांकन, उपस्थिति और टहराव की निगरानी में स्कूल प्रबंधन समिति (एसएमसी) की भागीदारी को सुनिश्चित करने के प्रयास भी किये जा रहे हैं। अभिभावकों और बच्चों, दोनों के लिए सामाजिक सुरक्षा प्रणाली को प्राथमिकता दी जाती है ताकि पहुँच, अवधारण और पारगमन की राह में वित्तीय और सामाजिक बाधाओं को कम किया जा सके।
यूनिसेफ बाल संरक्षण और संबद्ध कार्यबल को मजबूत करने के लिए सरकार से पैरवी करता है। कार्यक्रम मुख्य बाल संरक्षण कानून के बेहतर कार्यान्वयन के लिए लोकवित्त तंत्र को मजबूत करने के लिए भी काम करता है। झारखंड राज्य बाल संरक्षण सोसाइटी और झारखंड राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण के साथ साझेदारी के जरिये परिवार आधारित देखभाल कार्यक्रमों पर ध्यान केंद्रित करने के साथ वैकल्पिक देखभाल को मजबूत करने पर भी प्रदेश में ध्यान केंद्रित करता है।
जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड, बाल कल्याण समिति, स्पेशल जुवेनाइल पुलिस इकाई, जिला बाल संरक्षण इकाई और बाल देखभाल संस्थानों जैसी बाल संरक्षण की वैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली में सुधार के उद्देश्य से डेटा और साक्ष्य बनाने के लिए डेटा प्रबंधन प्रणाली को मजबूत करने के लिए यूनिसेफ प्रदेश का सहयोग कर रहा है।
सामाजिक और व्यवहार परिवर्तन संचार तथा व्यवस्था प्रणाली को मजबूत करने के दृष्टिकोण के जरिये, यूनिसेफ बाल विवाह, बाल श्रम और हिंसा से किशोरों की रक्षा के लिए समुदायों और विभिन्न कर्तव्य वाहकों के साथ जुटा है। विशेष रूप से मीडिया के साथ साझेदारी के जरिये, यूनिसेफ बाल विवाह के खिलाफ लोगों को जागरूक करता है कार्यक्रम बाल अधिकारों पर पुलिस बल को संवेदनशील बनाने के लिए काम करता है और ‘बाल-अनुकूल’ पुलिस स्टेशन बनाने में मदद करता है।